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ऐलिज़ाबेथ चटर्जी
12/03/2018
क्या कारण है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में बिजली अधिक जाती है ? हाल ही में भारत ने यद्यपि पीढ़ीगत क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन पर्याप्त भुगतान और निवेश न हो पाने और निराशाजनक प्रदर्शन के दुश्चक्र में फँस जाने के कारण कई सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी भी नहीं पहुँच पा रहा है. इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं: सन् 2010 में विश्व बैंक की अनुमानित लागत के अनुसार बिजली की कमी की लागत भारत
वेदा वैद्यनाथन
26/02/2018
पिछले कुछ दशकों में भारत की अफ्रीका नीति बहुत हद तक निराशा और अनिच्छा से प्रकट की गई प्रतिक्रियाओं के बीच झूलती रही है. कई मंचों पर तो इस महाद्वीप की ओर रणनीतिक उदासीनता भी दिखाई पड़ी है. नई दिल्ली की विदेश नीति के व्यापक ढाँचे में अफ्रीका महाद्वीप के देशों को अब तक कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन अब स्थिति में बदलाव आने लगा है. भारत के नेता अफ्रीकी देशों की यात्रा भी बहुत कम करते थे और बहुत कम ही ऐसा होता था कि नई दिल्ली
नम्रता राजू
12/02/2018
ज़रा कल्पना कीजिए कि आप एक बिल्कुल नये किस्म के काम के लिए विदेश जा रहे हैं और वहाँ जाकर आपको पता चलता है कि $4,700 डॉलर में आपको किसी नियोक्ता के हाथों बेच दिया गया है. यह असंभव-सा लगता है, लेकिन भारत की 39 वर्षीय हैदराबादी महिला की यह असली कहानी है. यह वही महिला है जो पिछले साल सुर्खियों में छाई हुई थी. सलमा को धोखे से कपटी भर्ती एजेंटों द्वारा उसके नियोक्ता को बेच दिया गया था. सलमा ने जब उससे
मार्क शाइडर
29/01/2018
क्या भारत के ग्रामीण मतदाता इतने समझदार हैं कि वे भारत के स्थानीय चुनावों की जटिलता को समझ सकें ? सन् 1992 में 73 वें संशोधन के पारित होने के बाद ग्रामीण पंचायत अर्थात् ग्रामीण भारत के निम्नतम शासकीय पायदान को संवैधानिक अधिकार मिल गया कि ग्राम पंचायत और सरपंच का चुनाव नियमित रूप में कराया जाए. इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय शासन के लाखों चुनावी पदों का सृजन हो गया. इससे ग्रामीण नेताओं का, खास तौर पर सरपंचों का सशक्तीकरण हो गया और
रोहित चंद्र
15/01/2018
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के
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संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु
01/01/2018

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

योगेश जोशी
18/12/2017
नवंबर के आरंभ में एक रूसी समाचार वैबसाइट ने दावा किया था कि भारतीय नौसेना ने अमरीका की तकनीकी टीम को सन् 2012 में भारत को पट्टे पर दी गई एक रूसी अकूला-क्लास की परमाणु पनडुब्बी के निरीक्षण की अनुमति दी थी. हालाँकि यह रिपोर्ट बाद में झूठी पाई गई, फिर भी रणनीतिक हलकों में इससे कई सवाल पैदा हो गए. इसके दो कारण थे. इसका पहला कारण तो यही था कि इस दावे के कारण परमाणु पनडुब्बी के मामले में भारत-रूसी सहयोग की बात
गौतम मेहता
04/12/2017
2 जुलाई, 2015 को नई दिल्ली में एक असाधारण इफ़्तार पार्टी हुई, जिसने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया. भारत के राजनेता रमज़ान के मुबारक महीने के दौरान रोज़ा तोड़ने के लिए मुस्लिम भाइयों के लिए इफ़्तार पार्टियों का नियमित रूप में आयोजन करते रहे हैं, लेकिन 2014 में प्रधान मंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने न तो इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया और न ही किसी इफ़्तार पार्टी में भाग लिया. यह इफ़्तार पार्टी इसलिए अनूठी थी, क्योंकि इसका
हेमा स्वामिनाथन
20/11/2017
भारत में कृषि क्षेत्र में महिलाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। ग्रामीण परिवर्तन की मौजूदा स्थिति के कारण ही कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका उजागर हो पाई है। सामान्यतः, इस विषय पर चर्चा बहुत ही स्वभाविक प्रवृत्तियों पर ही केंद्रित रहती है; जैसे, स्व-नियोजित रूप में कृषि-क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का अनुपात, सहायता-राशि का भुगतान न होना या श्रमिकों को मज़दूरी न मिलना। जो मुद्दा उपेक्षित रह जाता है, वह भी महिलाओं की भूमिकाओं में महत्वपूर्ण और दिलचस्प बदलाव
जी यन-जूङ्
06/11/2017

हाल ही में, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ती राजनीतिक सरगर्मियों से दोनों देशों के बीच एशिया में आपसी सुरक्षा-हितों को साझा करने की एक नई शुरुआत हुई है. अभी दो महीने पहले ही, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने अपने प्रशासन के सौवें दिन पूरे होने पर विशेष समारोह का आयोजन किया था, जिसे व्यापक जनसमर्थन मिला. अब द.कोरिया के कूटनीतिक गलियारे में भारत को आमंत्रित करके वह एक साहसिक कदम उठाने जा रहे हैं.