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मेखला कृष्णमूर्ति
05/07/2016

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

अजय शुक्ला
20/06/2016
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की
गैब्रिएल क्रक्स-विसनर
06/06/2016

उस बात को लगभग पच्चीस साल हो गए जब विकेंद्रीकरण पर विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग भारत में शुरू हुआ था. संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार 200,000से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई, उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं का दायित्व सौंपा गया और ऐतिहासिक रूप से वंचितमहिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. बहुत से लोग मानते हैं कि ये पंचायतें लोकतांत्रिक और नौकरशाही के जाल में फँसे कागज़ी शेर हैं. यही कारण है कि नागरिकों से भी उनकी यहीअपेक्षा है कि इन पंचायतों की अनदेखी की जाए.

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सुमति चंद्रशेखरन और स्मृति परशीरा
23/05/2016

दिसंबर, 2015 में भारत सरकार ने अपने नये मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को सार्वजनिक कर दिया. यह व्यक्तिगत स्तर पर किये गये समझौते के करार का एक टैम्पलेट है, जिसके माध्यम से किसी एक देश की किसी फ़र्म द्वारा दूसरे देश की फ़र्म में किये गये निजी निवेश को शासित किया जाता है.

सामंत सुब्रमणियन
09/05/2016

अप्रैल के मध्य में नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक एच.वाई.शारदा प्रसाद स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक व्याख्यान दिया था, जिसका विषय था, “ऐतिहासिक जीवनी की कला और शिल्प”.  गुहा ने अपने व्याख्यान में विस्तार से इस प्रकार के लेखन के मूल्य को रेखांकित करते हुए अच्छी जीवनी की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला था. साथ ही उन्होंने एक सवाल भी उठाया था, जो उनके लेखन में भी उभरकर सामने आता है. खास तौर पर  द लिबरल ऐंड अदर एस्सेज़के अंतिम अध्याय में आपने इसका उल्लेख किया है.

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सुप्रिया रॉय चौधुरी और शशांक श्रीनिवास
25/04/2016
भारत अन्य उदीयमान शक्तियों से साथ वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाने में जुटा हुआ है और इसके लिए ज़रूरी है कि वह भारी मात्रा में बिजली की पूर्ति की प्रतिस्पर्धा में प्रभावी रूप में भाग ले. यह तभी संभव हो सकता है
फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस
11/04/2016

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.

साइमन चॉचर्ड
28/03/2016
भारत में राज्यों के विधायकों की सबसे बड़ी दिक्कत है, विधायक के रूप में उनकी पदधारिता का कार्यकाल. एक बार विधायक होने पर दुबारा से विधायक चुना जाना मुश्किल हो जाता है. यह इस हद तक भ्रामक होता है कि इन पदधारियों को अपने इस राजनीतिक पद पर बने रहने का पर्याप्त लाभ उठाते हुए ही अगले चुनावों के दौरान भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देनी होती है. उदाहरण के तौर पर उनकी यह अपेक्षा तो रहती ही है कि व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं की मदद करने के कारण
सहाना उडुपा
14/03/2016

सारे विश्व में और निश्चित रूप से भारत में भी इंटरनैट से संबद्ध मीडिया के कारण राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में नई आशा का संचार हुआ है और सार्वजनिक बहस और राजनीतिक सक्रियता के नये अखाड़े खुल गए हैं. हाल ही के अनुमान दर्शाते हैं कि भारत में लगभग 350 मिलियन इंटरनैट के उपयोक्ता हैं और पहुँच और संख्याबल की दृष्टि से देखें तो हम केवल चीन और अमरीका के ही आसपास हैं. 

रॉब जेकिन्स
29/02/2016
फ़रवरी,2016 में भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम को लागू हुए दस साल पूरे हो गए. नरेगा क्रांतिकारी होने के साथ-साथ सीमित भी है. जहाँ इससे एक ओर प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सार्वजनिक निर्माण की परियोजनाओं पर साल में सौ दिन का रोज़गार मिलता है, वहीं दूसरी ओर श्रम भी बहुत ज़्यादा करना पड़ता है और मज़दूरी भी बहुत कम