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सूज़न ऑस्टरमैन व अमित आहुजा
16/07/2018
विकासशील देशों में संस्थाओं के विद्वत्तापूर्ण और लोकप्रिय लेखों में दो ही बातें मुख्यतः हावी रहती हैं, संस्थागत वर्चस्व और पतन, तो भी भारतीय चुनाव आयोग (EC) सत्यनिष्ठा की भावना से काम करता है और सक्षम होकर उसने अपने अधिकारों का विस्तार भी कर लिया है. भारतीय
देवेश कपूर
29/06/2018
भारत की स्वाधीनता से पहले अमेरिका में भारत का जितना अध्ययन होता था, उसके मुकाबले अब यह अध्ययन कुछ कम हो गया है. सन् 1939 में महान् संस्कृतविद डब्ल्यू नॉर्मन ब्राउन ने विचार व्यक्त किये थे कि “किसी दैविक वरदान के बिना भी यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि [बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में] सशक्त भारत, संभवतः स्वाधीन होकर विश्व की बिरादरी में शामिल हो जाएगा और संभवतः एक प्रमुख और महत्वपूर्ण प्राच्यदेश होगा. और निश्चय ही बौद्धिक रूप में संपन्न और उत्पादक
रविंदर कौर
18/06/2018

भारतीयइतिहासकारों ने भारत में भारतीय महिलाओं और लैंगिक संबंधों की साम्राज्यवादी व्याख्याओं में निहित दृष्टि को विश्लेषित करने के लिए बहुत मेहनत की है. कन्याओं की भ्रूण हत्याओं की बात यदि छोड़ भी दी जाए तो भी ब्रिटिश इतिहासकारों ने पर्दा प्रथा,सती-प्रथा, बाल-विवाह और दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का उल्लेख करते हुए भारतीय महिलाओं को “नीचे पायदान”पर रखने का प्रयास किया है.

अदनान नसीमुल्लाह
04/06/2018
आज से चार साल पहले नरेंद्र मोदी के चुनाव के कारण भारत की अर्थव्यवस्था के अनेक प्रेक्षकों में जबर्दस्त आशा का संचार हुआ था. अंततः लोगों को लगा था कि एक ऐसा शख़्स जिसने गुजरात में आर्थिक चमत्कार करके दिखाये थे, भारत की बागडोर सँभालने के बाद उसी अनुशासन से घरेलू और विदेशी निवेश में चार चाँद लगा देगा और बाज़ार की पूरी क्षमता का उपयोग करते हुए भारत में आर्थिक कायाकल्प ले आएगा, लेकिन चार साल के बाद मोदी
रश्मि शर्मा
21/05/2018
2014 के आम चुनाव के बाद ऐसा लगा कि एक महत्वाकांक्षी भारत उभर रहा है। एक नये भारत की कल्पना की जाने लगी है। एक ऐसा भारत, जो मैन्युफ़ैक्चरिंग का हब होगा और जिसके शहर और गाँव स्वच्छ होंगे, जहाँ किसान की आमदनी दुगुनी हो गई होगी, सबका अपना घर होगा और बैंक में सबका अपना खाता होगा। इस नज़रिये में छुपी पर स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं, एक मान्यता थी कि एक प्रभावी प्रशासन तंत्र इस कल्पना को वास्तविकता में बदलेगा। परंतु अब, किसानों के बढ़ते आंदोलन
तनुश्री भान
07/05/2018
वर्ष 2018 की शुरुआत उस समय एक ऐसी निराशाजनक घटना से हुई जब केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) में पानी की सप्लाई ठप्प होने की खबर ने पूरी दुनिया के समाचार जगत् को झकझोर कर रख दिया. संपूर्णघटना क्रम में एक और भी तथ्य था, जिसपर मीडिया ने अधिक ध्यान नहीं दिया कि कच्ची बस्तियों में रहने वाले शहर के एक चौथाई लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं और “डे-ज़ीरो” अर्थात पानी न होने की
रुमेला सेन
23/04/2018
आखिर क्रांतिकारी सशस्त्र गुट को छोड़कर उसी राजनैतिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए कैसे लौट आते हैं, जिसे पहले वे उखाड़ फेंकने की बात करते थे? इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि पुरुष और स्त्रियाँ विद्रोह क्यों करते हैं? लेकिन इस बारे में हमारी जानकारी बहुत कम है कि विद्रोह का रास्ता छोड़कर वे सामान्य जीवन में क्यों और कैसे लौट आते हैं. परंतु नेपाल से लेकर कोलंबिया तक नीति-निर्माता अभी भी
रोहन संधु
09/04/2018
एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में भारत में लगभग 15 मिलियन गैर सरकारी संगठन (NGOs) हैं. यदि हाल ही में स्थापित सामाजिक उद्यमों की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाए तो गैर सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में किये गये नवाचारों का स्थान तेज़ी से फैलते कुटीर उद्योगों के नैटवर्क लेते जा रहे हैं. ये हस्तक्षेप अक्सर चक्र का आविष्कार फिर से कर रहे हैं और जो प्रयोग सफल हो भी जाते हैं, वे भी भारत में शिक्षण के संकट को दूर
शरीन जोशी
26/03/2018

गंगा भारत की सबसे अधिक पवित्र नदी है, जिसे करोड़ों लोग देवी की तरह पूजते हैं. गंगा भारत की 47 प्रतिशत ज़मीन की सिंचाई करती है और 500 मिलियन लोगों का पेट भरती है. इतनी महत्वपूर्ण नदी होने के बावजूद यह दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक है. तेज़ी से आबादी बढ़ने, शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण इसके पानी में घरेलू और औद्योगिक प्रदूषकों का स्तर बहुत बढ़ गया है.

ऐलिज़ाबेथ चटर्जी
12/03/2018
क्या कारण है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में बिजली अधिक जाती है ? हाल ही में भारत ने यद्यपि पीढ़ीगत क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन पर्याप्त भुगतान और निवेश न हो पाने और निराशाजनक प्रदर्शन के दुश्चक्र में फँस जाने के कारण कई सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी भी नहीं पहुँच पा रहा है. इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं: सन् 2010 में विश्व बैंक की अनुमानित लागत के अनुसार बिजली की कमी की लागत भारत