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संक्रमण के दौर में भारत (India in Transition)

निवेदिता राजू
16/12/2019
रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 मार्च,2019 का अपना संबोधन इस घोषणा के साथ आरंभ किया था कि “भारत अब वैश्विक महाशक्ति बन गया है.” उनका यह बयान इस धारणा पर आधारित था कि उपग्रह-विरोधी हथियारों का यह परीक्षण (ASAT) अंतरिक्ष किराये पर लेने वाले एक राष्ट्र के रूप में भारत की स्थिति को स्थापित करने के लिए यह “अनिवार्य” था, लेकिन किफ़ायती दरों पर नवोन्मेषकारी टैक्नोलॉजी के निर्माण की अनूठी क्षमता के कारण भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई दशकों
नंदिनी देव
02/12/2019
अगस्त, 2019 में भारत की संसद ने कारोबारी जगत् के अग्रणी नेताओं को चेतावनी दी थी कि वे अगर 2013 में कॉर्पोरेट जगत् के लिए अपेक्षित सामाजिक दायित्व (CSR) संबंधी प्रावधानों का पालन करने में असफल रहे तो उन्हें तीन साल तक का कारावास का दंड दिया जा सकता है. अगर कोई कंपनी अपने वार्षिक लाभ में से 2 प्रतिशत अंश परोपकार के लिए खर्च नहीं करती है तो सरकार कारागार के दंड के अलावा उसके खाते में से उतनी ही राशि निकालकर सरकारी निधि के लिए सूचीबद्ध किसी
क्रिस ऑगडेन
18/11/2019
हाल ही के दशकों में भारत धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय सोपान पर ऊपर चढ़ता जा रहा है और इसके कारण विश्व की एक प्रमुख महाशक्ति के रूप में इसका वैश्विक प्रभाव भी नज़र आने लगा है. पिछले चार दशकों में चीन एक जबर्दस्त ताकत के रूप में उभरकर सामने आया है और इसके साथ-साथ भारत ने भी काफ़ी ऊँचाइयाँ हासिल कर ली हैं. इसके कारण विश्व की आर्थिक शक्ति का केंद्र यूरोप और उत्तर अमरीका से हटकर एशिया की ओर स्थानांतरित होने लगा है. साथ ही साथ एशिया की इन दोनों
ब्रतोती रॉय
04/11/2019
मार्च 2019 में चिपको आंदोलन की 46 वीं सालगिरह मनायी गयी थी. आम तौर पर इसे भारत में पर्यावरण संबंधी न्याय का पहला आंदोलन माना जाता है, लेकिन अगर हम इतिहास पर नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि भारत में पर्यावरण संबंधी न्याय के आंदोलनों का इतिहास इससे कहीं अधिक पुराना है. 1859-63 के दौरान नील की खेती की विरुद्ध बंगाल के किसानों द्वारा किये गए ज़मीनी विद्रोह को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आरंभिक विद्रोह माना जा सकता है और इस विद्रोह में पारिस्थितिकी (ecology) के
विवेक एन.डी
21/10/2019

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मूलभूत सिद्धांतों में स्वास्थ्य की परिभाषा करते हुए स्पष्ट किया गया है कि “स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की समग्र स्थिति है और यह किसी बीमारी या अशक्तता का अभाव नहीं है.” इस परिभाषा में आगे यह भी कहा गया है कि “जाति, धर्म, राजनीतिक विश्वास, आर्थिक या सामाजिक परिस्थिति के भेदभाव के बिना स्वास्थ्य का अधिकतम आनंद लेना हर मनुष्य का बुनियादी अधिकार है”.

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फ्रांसिस कुरियाकोज़ और दीपा ऐय्यर
07/10/2019
सन् 2018 में “शानदार काम के भविष्य के लिए देखभाल के काम और उससे जुड़े रोज़गार” विषय पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद देखभाल के कामों पर नीति-विषयक बहस छिड़ गई. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने पाया कि देखभाल के कामों में बहुत से ऐसे कौशल भी शामिल हैं, जिन्हें न तो
रूपकज्योति बोरा
23/09/2019
ओसाका में G20 शिखर वार्ता के आयोजन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने दूसरे कार्यकाल में पहली बार जापान के प्रधानमंत्री आबे से विचार-विमर्श करने का अवसर मिला है. इस वर्ष के आरंभ में हुए आम चुनाव में निर्णायक बहुमत से जीतकर सत्ता पर एक बार फिर काबिज होने के बाद मोदी को और उनकी सरकार को विदेशी मामलों में अधिक लचीलेपन से आगे बढ़ने का अवसर मिला है. इसके अलावा, डॉ. एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाकर उन्होंने यह स्पष्ट संकेत भी दे दिया है कि
शकेब अयाज़
09/09/2019

सन् 1843 में भारत में जिस पुलिस-व्यवस्था का आरंभ हुआ था, वह अब भी काफ़ी हद तक ब्रिटिश काल के भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 पर ही चलती है और भारत के वर्ग, जाति, लिंग और धार्मिक विविधताओं के साथ संघर्ष में जूझ रही है. भारत में पुलिस व्यवस्था से संबंधित 2018 की रिपोर्ट के अनुसार इसके संभावित कारण प्रशिक्षण, संवेदीकरण की कमी और / या  पुलिसकर्मियों में निहित पक्षपात हो सकते हैं.

चयनिका सक्सेना
26/08/2019
पिछले अठारह वर्षों में अफ़गानिस्तान की स्थिति उतनी ही अस्थिर रही है जितनी तीन दशक पहले थी. सन् 2017 में जब चरमपंथियों को रोकने के लिए नंगरहार में तथाकथित "मदर-ऑफ़-ऑल-बम" गिराया गया था, तब से लेकर अब तक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. या फिर सन् 2001 में जब 25 हितधारकों ने मिलकर “अफ़गानी लोगों के देश में भयानक संघर्ष को खत्म करने और राष्ट्रीय समझौते और स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करने और
खुशदीप कौर मल्होत्रा
12/08/2019
20 मार्च, 2000 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा की पूर्व संध्या पर दक्षिण कश्मीर के चिट्टी सिंहपोरा गाँव में सशस्त्र विद्रोहियों ने पैंतीस सिख पुरुषों की नृशंसा हत्या कर दी थी. कश्मीर घाटी में कई पीढ़ियों से मुस्लिम भाइयों के साथ सद्भावना के साथ रहने वाले “सबसे कम आबादी वाले अल्पसंख्यक” सिख समुदाय के साथ यह पहली हिंसक वारदात थी. यह वारदात उस इलाके में हुई थी जो जम्मू और कश्मीर के तीन अलग-अलग क्षेत्रों में से एक था, जिन्हें उग्रवाद का बड़ा खामियाजा