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अर्थव्यवस्था

सत्ता, सुदूर परिधि पर बसे राज्य और भारतीय संघ

उद्दीपना गोस्वामी
मैंने दिल्ली में एक दशक से अधिक समय बिताया है, यही कारण है कि भारत की राजधानी में हुई ताज़ा हिंसक घटनाओं ने मुझे मर्माहत कर दिया है, लेकिन मुझे इससे कोई हैरानी नहीं हुई। हो सकता है कि इसकी वजह यही हो कि मैं भारत के उस अशांत पूर्वोत्तर राज्य से हूँ, जहाँ हिंसा का तांडव नृत्य दैनंदिन जीवन का एक हिस्सा है। या हो सकता है कि मुझे यह एहसास इसलिए भी है कि आज जो कुछ हो रहा है, वह भारत के बीचों-बीच हो रहा है। मुझे लगता है कि भारत के सुदूर परिधि पर

भारत की विकास-दर में आई गिरावट के कारण

दुव्वरी सुब्बाराव
तीन साल पहले, भारतीय अर्थव्यवस्था की त्रैमासिक विकास दर लगभग 9 प्रतिशत हो गई थी. लेकिन अब यह दर घटकर आधी रह गई है और पिछली तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर 2019) में 4.7 प्रतिशत रह गई. अधिकतर अनुमानों के अनुसार मार्च 2020 को समाप्त होने वाले राजकोषीय वर्ष में विकास दर 5 प्रतिशत हो जाएगी और अगले वर्ष, 2020-21 में यह दर बढ़कर 6 प्रतिशत हो जाएगी. सारे देश के लिए यह गिरावट हैरान कर देने वाली थी. हाल ही में अभी तक हम शान से कहा करते थे कि हमारी

अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को संयम बरतना होगा.

देवेश कपूर
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में दुबारा वापसी की तो कई बातें उनके पक्ष में थीं, नया जनादेश, संसद में पूर्ण बहुमत, पराजित विपक्ष और मतदाताओं के बीच उनकी अपार व्यक्तिगत लोकप्रियता, जिसके सामने सभी नेता बौने दिखाई पड़ने लगे. लेकिन उसी समय उनकी नई सरकार के सामने तीन प्रमुख चुनौतियाँ थीं. पहली चुनौती थी कमज़ोर अर्थव्यवस्था, जिसके

भारत में कॉर्पोरेट जगत् का सामाजिक दायित्व

नंदिनी देव
अगस्त, 2019 में भारत की संसद ने कारोबारी जगत् के अग्रणी नेताओं को चेतावनी दी थी कि वे अगर 2013 में कॉर्पोरेट जगत् के लिए अपेक्षित सामाजिक दायित्व (CSR) संबंधी प्रावधानों का पालन करने में असफल रहे तो उन्हें तीन साल तक का कारावास का दंड दिया जा सकता है. अगर कोई कंपनी अपने वार्षिक लाभ में से 2 प्रतिशत अंश परोपकार के लिए खर्च नहीं करती है तो सरकार कारागार के दंड के अलावा उसके खाते में से उतनी ही राशि निकालकर सरकारी निधि के लिए सूचीबद्ध किसी

भारत की हरित क्रांति के अंतर्विरोध

मार्शल एम. बाउटन
भारत में हरित क्रांति के सूत्रपात के पाँच से अधिक दशक बीत गये हैं, लेकिन भूख के विरुद्ध हमारा युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है. हमें हरित क्रांति की प्रेरणा तब मिली थी, जब साठ के दशक के मध्य में अच्छी फसल नहीं हुई थी और अकाल के हालात पैदा हो गए थे, लेकिन इसका असली उद्देश्य था, भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना और अगर सटीक रूप में कहा जाए तो इसका मुख्य उद्देश्य भारत को खाद्यान्न के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था. अब हम यह देख सकते हैं कि उस समय अपनाई गई नीतियों में अब तक कोई बड़ा

कौन भारत का पेट भरेगा? खाद्य और कृषि नीतियों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था और इसका तात्पर्य

अशोक गुलाटी
आज भारत की आबादी 1.35 अरब हो गई है. संयुक्त राष्ट्र के वर्ष 2017 के जनसंख्या-अनुमान के अनुसार वर्ष 2024 तक भारत की कुल आबादी चीन की कुल आबादी से भी अधिक हो जाएगी और वर्ष 2030 तक यह आँकड़ा 1.5 अरब तक पहुँच जाएगा और भारत इस भूमंडल का सबसे अधिक आबादी वाला देश हो जाएगा. लगभग दो-तिहाई भारतीयों की आयु 35 वर्ष से कम है. पिछले दो दशकों से भारत की सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) लगभग 7 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है और इसी