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अर्थव्यवस्था

स्वचालन (ऑटोमेशन) और भारत में काम-धंधों का भविष्य

फ्रांसिस कुरियाकोज़ व दीपा ऐयर
हम कृत्रिम बुद्धि (AI) के ऐसे युग में रहते हैं जिसने हमें प्रोसेसिंग की ज़बर्दस्त शक्ति, भंडारण की क्षमता और सूचना तक पहुँचने की शक्ति प्रदान की है. इसी प्रौद्योगिकी के बढ़ते विकास के पहले चरण में हमें चरखा, दूसरे चरण में बिजली और औद्योगिक क्रांति के तीसरे चरण में कंप्यूटर की सौगात मिली. सन् 2016 में विश्व

मैट्रो रेल परियोजनाओं के संबंध में भारत के प्रबल आकर्षण पर चेतावनी का संकेत

मीनाक्षी सिन्हा

कोलकाता में पहली मैट्रो परियोजना के बाद भारत को लगभग दो दशक का समय लगा जब दूसरी मैट्रो रेल परियोजना सन् 2002 में दिल्ली में शुरू हुई. लेकिन उसके बाद भारत के विभिन्न शहरों में मैट्रो रेल परियोजनाओं की झड़ी लग गई. पिछले एक दशक में भारत के तेरह से अधिक शहरों में मैट्रो रेल प्रणालियों को मंजूरी प्रदान की गई और कई राज्य ऐसे हैं जो केंद्र सरकार से अभी-भी मैट्रो रेल परियोजनाओं की मंजूरी मिलने की बाट जोह रहे हैं.

भारत के आंतरिक जल विवाद

स्कॉट मूर
लगभग पंद्रह साल पहले भारत के केंद्रीय जल आयोग ने चेतावनी दी थी कि विश्व के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश में “जलीय राजनीति, संघवाद के मूलभूत ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर तुली हुई है”. वास्तव में सिंधु और ब्रह्मपुत्र सहित सभी नदियों के साथ-साथ उपमहाद्वीप की सभी प्रमुख नदियाँ भी किसी न किसी स्तर पर विवादास्पद ही हैं. वस्तुतः जहाँ अनेक देशों की सीमाओं से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग अधिकाधिक चर्चा में रहते हैं, वहीं भारत की आंतरिक नदियों के

संघनीतिः भारतीय विशेषताओं वाली लोक-लुभावन योजनाएँ

गौतम मेहता
सन् 2018 में डेवोस में विश्व आर्थिक मंच पर एकत्रित विश्व भर के विशिष्ट कारोबारियों को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वैश्वीकरण की तो खुलकर प्रशंसा की, लेकिन व्यापारिक संरक्षणवाद की आलोचना की थी. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के “कट्टरवादी उदारीकरण” की चर्चा करते हुए सन् 2006 में श्री मोदी ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि आज विश्व में “भारत की अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए सबसे अधिक

भारत में फ़ील्ड प्रशासनः चरमराती नींव

रश्मि शर्मा
2014 के आम चुनाव के बाद ऐसा लगा कि एक महत्वाकांक्षी भारत उभर रहा है। एक नये भारत की कल्पना की जाने लगी है। एक ऐसा भारत, जो मैन्युफ़ैक्चरिंग का हब होगा और जिसके शहर और गाँव स्वच्छ होंगे, जहाँ किसान की आमदनी दुगुनी हो गई होगी, सबका अपना घर होगा और बैंक में सबका अपना खाता होगा। इस नज़रिये में छुपी पर स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं, एक मान्यता थी कि एक प्रभावी प्रशासन तंत्र इस कल्पना को वास्तविकता में बदलेगा। परंतु अब, किसानों के बढ़ते आंदोलन

पूरे भारत में बिजली की कमी का संकट

ऐलिज़ाबेथ चटर्जी
क्या कारण है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में बिजली अधिक जाती है ? हाल ही में भारत ने यद्यपि पीढ़ीगत क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन पर्याप्त भुगतान और निवेश न हो पाने और निराशाजनक प्रदर्शन के दुश्चक्र में फँस जाने के कारण कई सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी भी नहीं पहुँच पा रहा है. इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं: सन् 2010 में विश्व बैंक की अनुमानित लागत के अनुसार बिजली की कमी की लागत भारत

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

किसान के नाम पर

मेखला कृष्णमूर्ति

भारत के कृषि विपणन और वितरण प्रणाली में थोक बाज़ारों या मंडियों की विशेष भूमिका है.इस प्रकार भारतीय कृषि के भविष्य के बारे में होने वाले महत्वपूर्ण वाद-विवाद में महत्वपूर्ण तत्व हैं, खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की और खाद्य संबंधी मुद्रास्फीति के प्रबंधन की चुनौतियाँ और राष्ट्र के खाद्यमार्गों के विशाखन के चरित्र और नियंत्रण पर उठते प्रश्न. राज्य के विपणन संबंधी विभिन्न अधिनियमों के अंतर्गत स्थापित और स्थानीय रूप में गठित कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) के प्रबंधन के अंतर्गत मंडी ही किसानों और उनकी उपज के पहले खरीदारों के बीच “पहला महत्वपूर्ण लेन-देन” होता है.

आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन

ऋषिका चौहान
रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को एक बेहद अहम काम करना है. दोनों प्रधानमंत्रियों को भारत-नेपाल संबंधों (पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल द्वारा पुनर्जीवित संबंधों) की निरंतरता को बनाये रखना है और दहल के पूर्ववर्ती खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान उपजी कटुता को भी कम करना है. हालाँकि ओली के कार्यकाल के दौरान