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अर्थव्यवस्था

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

किसान के नाम पर

मेखला कृष्णमूर्ति

भारत के कृषि विपणन और वितरण प्रणाली में थोक बाज़ारों या मंडियों की विशेष भूमिका है.इस प्रकार भारतीय कृषि के भविष्य के बारे में होने वाले महत्वपूर्ण वाद-विवाद में महत्वपूर्ण तत्व हैं, खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की और खाद्य संबंधी मुद्रास्फीति के प्रबंधन की चुनौतियाँ और राष्ट्र के खाद्यमार्गों के विशाखन के चरित्र और नियंत्रण पर उठते प्रश्न. राज्य के विपणन संबंधी विभिन्न अधिनियमों के अंतर्गत स्थापित और स्थानीय रूप में गठित कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) के प्रबंधन के अंतर्गत मंडी ही किसानों और उनकी उपज के पहले खरीदारों के बीच “पहला महत्वपूर्ण लेन-देन” होता है.

आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन

ऋषिका चौहान
रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को एक बेहद अहम काम करना है. दोनों प्रधानमंत्रियों को भारत-नेपाल संबंधों (पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल द्वारा पुनर्जीवित संबंधों) की निरंतरता को बनाये रखना है और दहल के पूर्ववर्ती खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान उपजी कटुता को भी कम करना है. हालाँकि ओली के कार्यकाल के दौरान

पर्यावरण के लिए अनुकूल रोड नैटवर्क बनाने के लिए सुनियोजित योजना

शशांक श्रीनिवासन
भारत को ज़रूरत है सड़कों की. देश भर में माल-असबाब और लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए हमारे लिए रोड नैटवर्क बेहद आवश्यक है और इसकी मदद से ग्रामीण इलाके भी पूरे देश से जुड़ जाएँगे. रेल मार्ग और भारत की सड़कें सारे देश में एकता स्थापित करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि भारत में कितनी सड़कें होनी चाहिए?

विमुद्रीकरणः साफ़ तौर पर विध्वंस की राजनीति

अक्षय मंगला
8 नवंबर, 2016 को टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी घोषणा की, जिससे सभी स्तब्ध रह गए. इसी दिन मध्यरात्रि से ₹500 और ₹1,000 के मूल्य-वर्ग के नोट अवैध हो जाएँगे. इस समय जो नकदी प्रचलन में है, वह एक अनुमान के अनुसार कुल नकदी का लगभग 86

कारोबार में अल्पसंख्यकः भारत अमरीका के सप्लायर विविधता के कार्यक्रमों से क्या सीख सकता है ?

नरेन करुणाकरन

अमरीकियों के पास लगभग 28 मिलियन छोटे कारोबार हैं. इनमें से 8 मिलियन कारोबार अल्पसंख्यकों के पास हैं और अल्पसंख्यकों के इन कारोबारों से उत्पन्न 64 प्रतिशत नई नौकरियाँ ऐसी हैं, जिनकी शुरुआत 1993 और 2011 के बीच हुई थी. लगभग आधे अमरीकी कामगार इन नौकरियों पर ही लगे हुए हैं. राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की कामयाबी इन्हीं छोटे कारोबारों के कार्य-परिणामों पर ही निर्भर करती है. यह बात तो निःसंकोच मानी जा सकती है कि कई दशकों से सतत चलने वाले सप्लायर डाइवर्सिटी ईको सिस्टम में न तो कोई कटौती हो सकती है और न ही उसके विशेष दर्जे को कोई आघात पहुँच सकता है.

राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) क्या है ?

मेखला कृष्णमूर्ति

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

काम करने के अधिकार को सबल बनाने के लिएः भारत का दसवर्षीय राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम

रॉब जेकिन्स
फ़रवरी,2016 में भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम को लागू हुए दस साल पूरे हो गए. नरेगा क्रांतिकारी होने के साथ-साथ सीमित भी है. जहाँ इससे एक ओर प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सार्वजनिक निर्माण की परियोजनाओं पर साल में सौ दिन का रोज़गार मिलता है, वहीं दूसरी ओर श्रम भी बहुत ज़्यादा करना पड़ता है और मज़दूरी भी बहुत कम

सामाजिक पदक्रम में हैसियत, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य और देश का विकास

डियाने कॉफ़े
स्वस्थ माताएँ स्वस्थ बच्चों को जन्म देती हैं और ये बच्चे ही बड़े होकर उपयोगी काम करते हैं| इसके विपरीत जो महिलाएँ गर्भावस्था की शुरुआत में ही बहुत दुबली-पतली रहती हैं और गर्भावस्था के दौरान भी जिनका वजन जितना बढ़ना चाहिए उतना नहीं बढ़ता, उनके नवजात बच्चों का वजन भी कम रहने की सम्भावना बनी रहती है| जन्म के समय बच्चों का कम वजन का होना नवजात बच्चों की मृत्यु, जो कि जन्म के एक महीने के अन्दर होती है, की एक मुख्या वजह है| नवजात शिशु मृत्यु-दर भारत में कुल शिशु मृत्यु दर का 70