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इस्कैंडर रहमान
04/05/2015

पिछले दशक के दौरान आधुनिक सैन्य शक्ति के लगातार बढ़ते हुए और बहुत ही महत्वपूर्ण अंग के रूप में विशेष ऑपरेशन बलों (SOF) का उदय हुआ है. पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में खास तौर पर छोटे, चुने हुए और प्रच्छन्न ऑपरेटर इकाइयों का उदय बुरी तरह युद्ध में उलझे क्षेत्रों में अत्यंत  प्रभावी, कुशल और सुनिश्चित साधनों के रूप में शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है.

मंजीत एस. परदेसी
20/04/2015

सिंगापुर के रक्षामंत्री नग इंग हेनने पिछले महीने दिये गये अपने एक बयान में यह इच्छा व्यक्त की थी कि भारत को दक्षिण चीन सागर में एक बड़ी भूमिका अदा करनी चाहिए. हाल ही के वर्षों में इसी तरह के बयान विएतनाम और फिलीपींस के नेताओं ने भी दिये हैं. दक्षिण पूर्वेशिया के नेताओं द्वारा उस क्षेत्र के सुरक्षा मामलों में भारत की भागीदारी के लिए उसे दिये गये निमंत्रणका मतलब है दक्षिण पूर्वेशिया में महाशक्ति के रूप में भारत का उदय और फिर एशिया में महाशक्ति के रूप में भारत का उदय.

संजय चक्रवर्ती
06/04/2015

ढोंग-पाखंड,भुलक्कड़पन, अवसरवाद और अज्ञान के विषैले मिश्रण और पैटर्नलिज़्म अर्थात् बाप-दादा की जायदाद समझने के कारण भूमि अधिग्रहण कानून खिचड़ी बन कर रह गया है. भाजपा के लिए कांग्रेस के बनाये इस कानून को पारित करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना मुश्किल होता जा रहा है और अब उन्होंने मिले-जुले संकेत भेजने भी शुरू कर दिये हैं- हो सकता है कि वे इसे पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला लें, या हो सकता है कि संशोधनों के साथ तत्संबंधी अध्यादेश फिर से जारी कर दें या फिर राज्यों को इतनी छूट दे दी जाए कि वे कानून की जिस धारा को चाहें उसका पालन करें और जिसे नापसंद करते हों उसकी अनदेखी कर दें.

लीज़ा ब्रोकमैन
23/03/2015

दो दशक पूर्व मुंबई में पाइप से सप्लाई होने वाले म्युनिसिपैलिटी के पानी की व्यवस्था संबंधी नियमों में नाटकीय परिवर्तन आया था. इस परिवर्तन के कारण ही शहर के लोकप्रिय पड़ोसी इलाकों और झोपड़पट्टी के निवासियों को म्युनिसिपल पानी की पात्रता दिलाने के लिए इन नियमों को झोपड़पट्टी पुनर्वास की आवासीय योजनाओं में शामिल कर लिया गया है. ढाँचागत योजना और सर्विस डिलीवरी के (कम से कम सिद्धांत रूप में तो ) स्थानिक और जलप्रेरित तर्कों के द्वारा पहले नियमित पानी की सप्लाई को झोपड़पट्टी पुनर्विकास योजना में पात्रता से जोड़ने के परिणाम भयावह हो चुके हैं.

ऐर्न्ट माइकल
09/03/2015

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रमुख अध्यक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था. यह एक ऐसा महत्वपू्र्ण संकेत हो सकता था जिससे कि दक्षिण एशिया में खास तौर पर द्विपक्षीय स्तर पर क्षेत्रीय सहयोग की नई शुरूआत हो सके. सन् 1985 से भारत ने चार क्षेत्रीय पहल करने में संस्थापक सदस्य की भूमिका का निर्वाह किया था, लेकिन इनमें से किसी भी पहल का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.

कार्तिक नचियप्पन
23/02/2015

राष्ट्रपति ओबामा ने हाल ही में अपनी भारत यात्रा के अंतिम दिन प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक रेडियो प्रसारण की रिकॉर्डिंग की थी. अपने इस रेडियो प्रसारण में ओबामा ने इच्छा व्यक्त की थी कि वह राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त करने के बाद भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर काम करना चाहेंगे. इस संदर्भ में उन्होंने मोटापे का खास तौर पर उल्लेख किया, क्योंकि यह एक ऐसी चुनौती है जो दुनिया-भर में तेज़ी से फैल रही है.

राधिका खोसला
09/02/2015

जलवायु परिवर्तन के संबंध में दिसंबर 2015 में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्रसंघ की शिखर वार्ता के संभावित परिणामों को लेकर सारी दुनिया में और भारत में भी अनेक अनुमान लगाये जा रहे हैं. उसकी तैयारी के लिए प्रत्येक देश को इस वर्ष के अंत तक शिखर वार्ता से काफ़ी पहले INDC अर्थात् राष्ट्रीय तौर पर अपेक्षित निर्धारित योगदानपर अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा. अमरीका-भारत के वर्तमान संबंधों के महत्व को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के संबंध में भारत की प्रतिक्रिया को इसमें प्राथमिकता मिल सकती है.

शिबानी घोष
26/01/2015

भारत में पर्यावरण को व्यवस्थित करने का काम लगातार बेहद मुश्किल और पेचीदा होता जा रहा है. वायु, जल और वन का आच्छादन कुछ ऐसे महत्वपूर्ण संकेतक हैं जिनमें पर्यावरण की गुणवत्ता में तेज़ी से गिरावट आ रही है. साथ ही “विकास के एजेंडा” को सुगम बनाने के लिए विनियामक लचीलेपन की भी ज़रूरत महसूस की जा रही है.  अनेक हितधारकों ने अक्सर विनियामक और संस्थागत सुधारों की बात उठाई है, हालाँकि इसमें उनके व्यापक और अलग-अलग हित भी हो सकते हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामकों की असफलता का एक अंतर्निहित कारण सरकार की तदर्थ नीतियाँ भी हो सकती हैं.

स्वप्ना कोना नायुडु
12/01/2015

सन् 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद भारत में रूसी हितों की वृद्धि होती रही है. सन् 1955 में ही ख्रुश्चेव और बुल्गानिन ने तीसरी वैश्विक नीति की शुरुआत की जिसके कारण ये दोनों नेता भारत आए और नेहरू भी मास्को पहुँचे. इसी वर्ष में एशियाई और अफ्रीकी देशों का इंडोनेशिया में बांडुंग सम्मेलन हुआ, जिसे रूसी समाचार पत्रों ने “इस युग की एक विशेष घटना”  बताया.  भारतीय पक्ष इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था कि स्टालिन के उत्तराधिकारियों ने उसके “भारत के धूमिल चित्र” को नकार दिया है. शीत युद्ध के दौरान, इन संबंधों में गिरावट आने के बजाय निरंतरता ही बनी रही.

अभिरूप मुखोपाध्याय
29/12/2014

क्या नरेगा पर संकट गहरा रहा है या यह मरणासन्न स्थिति में अंतिम साँसें गिन रहा है? वर्ष 2010-11 में इसका बजट 401बिलियन रुपये था, जो 2013-2014 में घटकर 330 बिलियन रुपये रह गया. हाल ही में कामगारों के लिए घोषित अधिक मज़दूरी के कारण नरेगा पर मामूली-सा असर पड़ा है. सरकारी अधिकारियों (और अनेक अर्थशास्त्रियों) को लगता है कि नरेगा में अब कामगारों की सामान्यतः रुचि नहीं रह गई है.