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जब कानूनी प्रक्रियाएँ अनौपचारिक रूप से कॉपी-पेस्ट की जाती हैं: भारत में तलाक संबंधी मामले

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12/02/2024
युगांक गोयल

जब औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना कठिन हो और विवाद के समाधान के पारंपरिक मानदंड पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हों तो विवादों का समाधान कैसे किया जाता है? मैं इसे कुछ विशेष प्रकार के प्रकरणों से स्पष्ट करना चाहूँगा; लोग औपचारिक अदालत जैसा ढाँचा अपनाते हुए, लगभग आधिकारिक प्रक्रियाओं की नकल करते हुए, विवाद को अनौपचारिक रूप से सुलझा लेते हैं. लोग विवाद के समाधान की प्रक्रियाएँ स्थापित करते हैं जो कॉस्मेटिक रूप में औपचारिक प्रणाली के समान होती हैं और ऐसा व्यवहार करती हैं जैसे कि पूरी प्रक्रिया कानूनी हो.

कानूनी बहुलवाद के विद्वानों ने दुनिया भर के कई उत्तर-औपनिवेशिक समुदायों में विवादों के समाधान के लिए अनौपचारिक सामाजिक मानदंडों की अवधारणा को स्पष्ट किया है. इस अध्ययन में यह बात छूट गई है कि कानून वह रूपरेखा कैसे प्रदान करता है जिसका उपयोग उनके समुदायों में पहले से कोई अनौपचारिक सामाजिक मानदंड मौजूद न होने पर लोगों द्वारा अनौपचारिक विवादों के समाधान के लिए अपने स्वयं के संस्करणों को अपनाने के लिए भी किया जा सकता है. इस बात को पकड़ने से यह समझने में एक उपयोगी प्रवेश बिंदु मिलता है कि लोग "कानून की कल्पना" कैसे करते हैं, जैसा कि कानूनी चेतना से संबंधित साहित्य में इसे व्यक्त किया गया है.  तलाक की न्यायिक संस्था का यह एक उपयोगी उदाहरण है.

साझेदारी से पलायन बनाम साझेदारी कानूनों से पलायन
भारत में तलाक संबंधी मामलों पर विचार करें. वैवाहिक कानून विवाहों को टूटने से रोकने के लिए बनाए गए हैं. यही कारण है कि भारत में तलाक की प्रक्रिया पर भारी लागत आती है. साथ ही आपसी अलगाव होने पर पति-पत्नी पर भारी भावनात्मक और वित्तीय बोझ भी पड़ता है. साथ ही, लोग कानूनी तौर पर अदालत से बाहर समझौता भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि अदालत से तलाक की डिक्री के बिना अलगाव कानून की नजर में अमान्य है.  ऐतिहासिक रूप से भारत में हिंदुओं की आबादी 80 प्रतिशत है और हिंदुओं में तलाक के संबंध में कोई धार्मिक नियम भी नहीं है और समुदाय विशेष के लोग अपनी प्रथाओं के अनुसार ज़रूरत पड़ने पर अलगाव का प्रबंधन करते थे. 1955 में ही हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के तहत तलाक को औपचारिक रूप दिया गया.

छोटे स्तर की ग्रामीण बस्तियों में, यदि कोई विवाहित जोड़ा अलग होना चाहता है, तो वे आसानी से अलग हो सकते हैं और गाँव में सभी को अलग होने के बारे में बता सकते हैं. जब तक उनका जीवन उनके समुदायों के इर्द-गिर्द घूमता रहा, तब तक औपचारिक अदालत द्वारा "सार्वभौमिक" डिक्री की कोई आवश्यकता नहीं थी. हालाँकि, अधिनियम के पारित होने के बाद, तलाक के लिए उन्हें अपने गाँवों से दूर शहर की अदालत तक जाना पड़ता था और तलाक की बोझिल कार्यवाही से गुज़रना पड़ता था. इस कार्यवाही में महीनों ही नहीं कभी-कभी तो साल भर का समय लग जाता था. और यह प्रक्रिया उनकी समझ से भी बाहर हो सकती थी. ज़ाहिर है, ऐसी प्रक्रिया अपनाने के लिए उन्हें कोई प्रोत्साहन भी नहीं मिलता था.

कानून-संगत दिखने वाली प्रक्रिया
कानून ने अब यह अनिवार्य कर दिया है कि एकमात्र स्वीकार्य तलाक वह है जो अदालत द्वारा प्रमाणित हो. ऐसे हालात में जो जोड़े अदालती प्रक्रियाओं से बचना चाहते हैं वे तलाक या औपचारिक अलगाव कैसे कर सकते हैं? वे कल्पना कर सकते हैं कि कानून ने कैसे अपना काम किया होगा और अलगाव को लागू करते समय एक औपचारिक संस्थागत तंत्र की झलक प्रदान करने के लिए समान कानूनी कलाकृतियों का कॉस्मेटिक रूप से उपयोग किया होगा. इसे हम " कानून-संगत दिखने वाली प्रक्रिया " कहते हैं, एक ऐसी घटना जिसके तहत लोग मौजूदा समस्या को हल करने के लिए औपचारिक कानूनों का अनुकरण करके उनसे बच निकलते हैं. नकल प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाती है. हालाँकि कभी-कभी इसका उपयोग वकीलों द्वारा निर्दोष ग्राहकों को धोखा देने के लिए किया जा सकता है, ऐसी प्रक्रियाएँ अक्सर पार्टियों को स्पष्ट रूप से यह जाने बिना की जाती हैं कि जो कुछ हुआ वह केवल कानून-संगत दिखने वाली एक प्रक्रिया थी और "वास्तविक कानून" नहीं था.

भारत के चार राज्यों में वकीलों के प्राथमिक सर्वेक्षण और तीन मामलों में तलाक की कार्यवाही के प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से, मैंने तलाक के मामलों में कानून-संगत दिखने वाली प्रक्रिया को व्यापक तौर पर  देखा है, जिसमें जोड़ों और वकीलों ने हलफनामे, नोटरीकृत न्यायिक स्टांप पेपर और न्यायिक कलाकृतियों का उपयोग किया था. इनमें नाटकीय रूप से सटीक कानूनी प्रदर्शन में अनौपचारिक अलगाव संबंधी समझौतों का मसौदा तैयार किया गया था. इनमें वकीलों के चैम्बरों में कानून-संगत दिखने वाली प्रक्रिया संबंधी मामले देखे जा सकते हैं. लेकिन इन्हें साफ़ तौर पर देखने के लिए कानून, Lawrato, iPleaders, Advocateखोज या विधिकार्य जैसी कानूनी वैबसाइट पर जा सकते हैं, जिनमें  हजारों वकील स्पष्ट तौर पर कानूनी सलाह देते हैं. अदालत से बाहर तलाक कैसे लिया जाए, इस सवाल का जवाब देते हुए, इनमें से कुछ वकील अन्य बातों के अलावा, "अलगाव के समझौते" के ज़रिए न्यायिक प्रक्रियाओं के "काम" करने का कोई तरीका भी सुझाते हैं, जिसके बारे में उनका दावा है कि इनका स्वरूप कानूनी होगा. वे सामग्री और मानक-फ़ॉर्म टैम्पलेट की भी सिफ़ारिश करते हैं.  इनमें कई पृष्ठों  पर हजारों व्यूज़ हैं.

ग्रामीण भारत में, कानून-संगत दिखने वाली प्रक्रिया वाले मामले पंचायती तलाक में दिखाई देते हैं. जिसमें ग्राम परिषदें नियमित रूप से गवाहों और ग्रामीणों के सामने अदालत जैसी कार्यवाही आयोजित करके अनौपचारिक तलाक के आदेश देती हैं, जिससे अधिनियम की औपचारिकता का आभास मिलता है.  कुछ निर्णयों में कानून-संगत दिखने वाले ये  मामले  स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं जो अंततः औपचारिक अदालती मामलों में समाप्त होते हैं.  ऐसे ही एक मामले में, जहाँ एक औपचारिक अदालत ने इस प्रथागत तलाक को रद्द कर दिया था, हम इस निर्णय से इसका विवरण प्राप्त कर सकते हैं: अनौपचारिक तलाक का निर्णय "मध्यस्थों के सामने " और  मध्यस्थों के निर्देशों के अनुसार किया गया था. " मृतक गोविंदराज ने प्रतिवादी को 7,000/-रुपये का भुगतान किया और 24.7.1978 को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय, पांडालगुडी में गोविंदराज और प्रतिवादी द्वारा एक तलाकनामा लिखा गया और उस पर हस्ताक्षर किए गए.अनौपचारिक निर्णय में राज्य प्राधिकरण, अर्थात् उप-रजिस्ट्रार कार्यालय की उपस्थिति को देखें. दस्तावेज़ीकरण और लेखन जैसी कानूनी कार्यवाही किसी आधिकारिक घटना का आभास देती हैं.

नोट करें कि HMA के तहत तलाक के प्रथागत रूपों की अनुमति है, लेकिन आपको यह साबित करना होगा कि यह अनौपचारिक वैवाहिक विघटन वास्तव में एक सामुदायिक रिवाज़ है. अधिनियम में "कस्टम" शब्द की एक विशिष्ट परिभाषा है, जो उन लोगों पर एक उच्च प्रतिबंध लगाती है जो यह साबित करना चाहते हैं कि उनकी यह कार्रवाई इस लेबल के अंतर्गत आती है. उदाहरण के लिए, 2019 के एक मामले में फ़र्गतिनामा, या 2007 के एक मामले में छुट्टा-चुट्टी - दोनों दस्तावेज़ और प्रक्रियाएँ जिन्हें पार्टियों द्वारा "रीति-रिवाज" घोषित किया गया था - अदालत द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं थीं. 2016 के एक अन्य निर्णय में, न्यायाधीशों को तलाक के पारंपरिक रूप के रूप में लिये गए किसी विशेष पंचायती तलाक का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं मिला, हालाँकि मंच अच्छी तरह से व्यवस्थित था, जिसमें पंचायत के नौ में से पांच सदस्यों ने भाग लिया था और अपने हस्ताक्षर किए थे. 1980 से 2019 तक अपने खोजपूर्ण अध्ययन में हमने पाया है कि अदालतों ने बार-बार पंचायती तलाक को अमान्य घोषित किया है, फिर भी वे 1980 से लेकर हाल ही में 2019 तक के मामलों में सामने आए हैं, जिससे कानूनी धारणाओं की प्रेरणा और भी मजबूत हो गई है.

कानून-संगत दिखने वाले इन मामलों पर  कानून द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की प्रकृति को देखते हुए तलाक के मामले  कानून-संगत दिखने वाले इन मामलों  का अध्ययन करने के लिए उपयोगी होते हैं. भारत में, आधिकारिक तौर पर "तलाकशुदा" लोगों की तुलना में तीन गुना लोग वे हैं जो "अलग " रहते  हैं. ये हालात जोड़ों पर अदालती कार्यवाही की गहरी चिंता को दर्शाते हैं. कानून जैसे दिखने वाले ऐसे प्रयास अकेले भारतीयों के नहीं हैं. वास्तव में, कई कट्टर कैथोलिक देशों ने हाल ही में कानूनी तलाक को मान्यता दी थी. चिली में तो 2004 में ही तलाक को मान्यता मिली है. चिलीवासी उससे पहले क्या कर रहे थे? पता चला है कि वे कानूनी हथकंडों का भी इस्तेमाल कर रहे थे.  उदाहरण के लिए, दीवानी निरसन (civil annulment) से पता चलता है कि विवाह हुआ ही नहीं है या पति द्वारा गायब होने का नाटक करना और पत्नियाँ अखबारों में विज्ञापन देकर यह दिखाने के लिए कानूनी तंत्र का इस्तेमाल करती हैं कि पति ने उन्हें छोड़ दिया है या मर गया है, ऐसे कुछ तौर-तरीके प्रचलित हैं. इसी तरह, बांग्लादेश में, हिंदुओं के बीच तलाक कानून न होने कारण जोड़े अक्सर हलफनामे पर शपथ लेकर या लिखित समझौते पर हस्ताक्षर करके अलग हो जाते हैं.

दिखावटी कानूनी कार्यवाही कितनी व्यापक होती है?
दिखावटी कानूनी कार्यवाही केवल तलाक तक ही सीमित नहीं होती. लगता है कि इनका उपयोग भूमि के एक प्रकार के एकीकरण (जिसे उत्तर भारत में चकबंदी कहा जाता है) के लिए भी किया जाता है. दो किसानों के उदाहरण पर विचार करते हैं. इनमें से प्रत्येक के पास गाँव में ज़मीन के दो टुकड़े हैं. ये टुकड़े गाँव की उनकी बाकी जोत से अलग हैं. दोनों किसानों की जोत एक-दूसरे से संबंधित हैं. वे अपने संबंधित खेतों का विस्तार करने के लिए अपनी जोत का आदान-प्रदान कर सकते हैं. संबंधित क़ानून समेकन की एक निश्चित प्रक्रिया का आदेश देता है, लेकिन यह प्रक्रिया कठिन और समय लेने वाली होती है.  इन प्रक्रियाओं से घबराकर किसान सीधे पंचायत के पास चले जाते हैं, जो कानूनी दिखने वाला आदेश पारित करके आवेदक के नाम पर उसका हक हस्तांतरित कर देते हैं और उनकी संबंधित भूमि को समेकित कर देते हैं, बावजूद इसके कि इस प्रक्रिया की कोई कानूनी वैधता नहीं है. पट्टेधारी किसान भी भूमिधारक किसानों के साथ भूमि पट्टे पर लेते समय कुछ  (गैर-न्यायोचित) कागजी कार्रवाई भी करते हैं, इस प्रक्रिया में एक प्रकार की औपचारिकता निभाते हैं, हालाँकि अपने स्वरूप में यह केवल दिखावटी होती है.

जहाँ एक ओर कानूनविद और समाज के विद्वान् अनौपचारिक विवाद के समाधान के तरीकों को समझने के लिए ढाँचा विकसित करने में सक्षम हैं, कानूनी-से दिखने वाले ये मामले इस तरह की जाँच से बच जाते हैं. ये कानून क्रूर या बोझिल हो सकते हैं. लेकिन लोग सरल हो सकते हैं. उनकी यह प्रक्रिया अनौपचारिक नहीं हो सकती. लेन-देन की सारी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि यह औपचारिक लगे. कानूनी कार्यवाही के कॉस्मेटिक्स भी उतने ही मजबूत हो सकते हैं जितने उनके कथ्य. समाज कानून का "उपयोग" जैसे भी करता है, इससे समाज की री समझ का पता चलता है. इसलिए कानूनी दिखने वाले ये तरीके भी उतने ही अनूठे होते हैं जितना कि अनूठा कानून होता है. दरअसल, कल्पित कानून के अनुकरणीय अनुप्रयोग कानूनी चेतना के महत्व को रेखांकित करते हैं और कानूनी बहुलवाद के ढाँचे का विस्तार करते हैं. यदि कानून का निर्माण एक काल्पनिक समाज को ध्यान में रखकर किया जाता है, तो समाज एक काल्पनिक कानून को ध्यान में रखकर भी विकसित हो सकता है.

युगांक गोयल फ्लेम युनिवर्सिटी, पुणे में सार्वजनिक नीति के ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं और सेंटर फॉर नॉलेज अल्टरनेटिव्स के संस्थापक हैं, जिनके नेतृत्व  में पूरे भारत में जिला-स्तरीय आंकड़ों और संस्कृतियों का बड़े पैमाने पर दस्तावेज़ीकरण किया जा रहा है.

 

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (हिंदी), रेल मंत्रालय, भारत सरकार

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