Penn Calendar Penn A-Z School of Arts and Sciences University of Pennsylvania

समाज और संस्कृति

दक्षिण एशिया में देखभाल की बढ़ती अर्थव्यवस्था

फ्रांसिस कुरियाकोज़ और दीपा ऐय्यर
सन् 2018 में “शानदार काम के भविष्य के लिए देखभाल के काम और उससे जुड़े रोज़गार” विषय पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद देखभाल के कामों पर नीति-विषयक बहस छिड़ गई. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने पाया कि देखभाल के कामों में बहुत से ऐसे कौशल भी शामिल हैं, जिन्हें न तो

राष्ट्र की विविधता के साथ संघर्ष में जूझती भारतीय पुलिस

शकेब अयाज़

सन् 1843 में भारत में जिस पुलिस-व्यवस्था का आरंभ हुआ था, वह अब भी काफ़ी हद तक ब्रिटिश काल के भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 पर ही चलती है और भारत के वर्ग, जाति, लिंग और धार्मिक विविधताओं के साथ संघर्ष में जूझ रही है. भारत में पुलिस व्यवस्था से संबंधित 2018 की रिपोर्ट के अनुसार इसके संभावित कारण प्रशिक्षण, संवेदीकरण की कमी और / या  पुलिसकर्मियों में निहित पक्षपात हो सकते हैं.

पलायन का दूसरा पहलूः कश्मीरी सिखों का मामला

खुशदीप कौर मल्होत्रा
20 मार्च, 2000 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा की पूर्व संध्या पर दक्षिण कश्मीर के चिट्टी सिंहपोरा गाँव में सशस्त्र विद्रोहियों ने पैंतीस सिख पुरुषों की नृशंसा हत्या कर दी थी. कश्मीर घाटी में कई पीढ़ियों से मुस्लिम भाइयों के साथ सद्भावना के साथ रहने वाले “सबसे कम आबादी वाले अल्पसंख्यक” सिख समुदाय के साथ यह पहली हिंसक वारदात थी. यह वारदात उस इलाके में हुई थी जो जम्मू और कश्मीर के तीन अलग-अलग क्षेत्रों में से एक था, जिन्हें उग्रवाद का बड़ा खामियाजा

नीतियों में अंतर और सार्वभौमिक नेत्र-स्वास्थ्य का पवित्र संकल्प

तुलसीराज रवीला
सन् 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य राष्ट्रों ने स्थायी विकास के लक्ष्य (SDG) निर्धारित करते समय सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) का संकल्प भी किया था. सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) की प्रक्रिया को तीन तत्वों से परिभाषित किया जाता है: सभी व्यक्तियों और समुदायों को स्वास्थ्य सेवा सुलभ कराना, व्यापक देखभाल और वित्तीय सुरक्षा. चूँकि पहुँच ही स्वास्थ्य सेवा का मूल आधार है लोगों को स्वास्थ्य सेवा सुलभ कराना, इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (PHC) को मुख्य रणनीति के तौर पर मान्यता प्रदान की

भारत की हरित क्रांति के अंतर्विरोध

मार्शल एम. बाउटन
भारत में हरित क्रांति के सूत्रपात के पाँच से अधिक दशक बीत गये हैं, लेकिन भूख के विरुद्ध हमारा युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है. हमें हरित क्रांति की प्रेरणा तब मिली थी, जब साठ के दशक के मध्य में अच्छी फसल नहीं हुई थी और अकाल के हालात पैदा हो गए थे, लेकिन इसका असली उद्देश्य था, भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना और अगर सटीक रूप में कहा जाए तो इसका मुख्य उद्देश्य भारत को खाद्यान्न के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना था. अब हम यह देख सकते हैं कि उस समय अपनाई गई नीतियों में अब तक कोई बड़ा

भारत में उभरती वयस्क पीढ़ी के निर्णय लेने की प्रक्रिया

दीया मित्रा

1980-99 के बीच जन्मे इस सहस्राब्दी के बच्चों (Millennials) को लगातार मैं पीढ़ी (Generation Me) के रूप में वर्णित किया जाता है. उनका न तो सही तौर पर प्रतिनिधित्व होता है और न ही उन्हें सराहा जाता है और उन्हें स्टीरियोटाइप बना दिया जाता है. उन्हें अक्सर गैर-ज़िम्मेदार और आलसी किस्म के युवाओं के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन हाल ही में सहस्राब्दी की पीढ़ी (Millennials) के रूप में वर्णित इन युवाओं पर मीडिया का काफ़ी ध्यान आकर्षित हुआ है.

आंतरिक प्रवासन के विरुद्ध संघर्ष

रिखिल आर. भावनानी & बेथानी लेसिना
पश्चिम में ब्रैक्सिट और अमरीका में डोनल्ड ट्रम्प और हंगरी के विक्टर ऑर्बन जैसे दक्षिणपंथी लोकप्रिय नेताओं के उदय का मुख्य कारण वैश्वीकरण को माना जाता है. खास तौर पर बहुत-से लोग तो यह तर्क भी देते हैं कि विशेष प्रकार के वैश्वीकरण से उत्पन्न अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन पर लगाम न लगने के कारण ही “भूमिपुत्र

सुधार, प्रतिनिधित्व और प्रतिरोधः भारत में संपत्ति के अधिकारों के प्रवर्तन की राजनीति

रशेल ब्रूले
महिलाओं में राजनीतिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए विश्व भर में सबसे अधिक क्रांतिकारी कदम है, सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए कोटा निर्धारित करना. विशेषकर आर्थिक क्षेत्रों में कोटे का साक्ष्य और प्रतियोगिता दोनों का ही स्रोत भारत में मिलता है. भूमि के उत्तरदायित्व के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र में महिलाओं के सशक्तीकरण का लाभ अंततः उन्हें कितना मिला? पिछले दो दशकों में विश्व भर में विधायिका और राजनीतिक दलों में महिला सांसदों का औसत

भारत का नागरिक ड्रोन उद्योगः ड्रोन विनियमन के लिए सिविल सोसायटी की व्यापक भूमिका आवश्यक

शशांक श्रीनिवासन
7 अक्तूबर, 2014 को लगता है कि मानवरहित हवाई वाहन (अर्थात् UAVs; जिसे आम भाषा में ड्रोन कहा जाता है) के निर्माण और संचालन के क्षेत्र में भारत के विश्व-नेता बनने की आकांक्षाओं पर रातों-रात तुषारापात हो गया. भारत में नागरिक उड्डयन के विनियामक महानिदेशक, नागरिक उड्डयन (DGCA) ने एक संक्षिप्त सार्वजनिक सूचना जारी करके हर प्रकार की गैर-सरकारी संस्था या व्यक्ति को किसी भी प्रयोजन के लिए संरक्षा और सुरक्षा के कारणों से UAVs अर्थात् ड्रोन को उड़ाने पर

अनजान बने रहने में ही आनंद हैः भारत में असमानता का सच

संजय चक्रवर्ती
बार-बार होने वाले धमाकों की तरह मीडिया और ट्विटर खाताधारकों के बीच छोटा-मोटा वाक् युद्ध ही छिड़ गया है कि भारत में कितनी असमानता है और यह किस हद तक बढ़ती जा रही है. इस बार इस बहस की शुरुआत हुई जेम्स क्रैबट्री की पुस्तक द बिलियनर राज के प्रकाशन से. पिछले साल भी इसी तरह की घटना हुई थी जब ल्यूक चांसेल और थॉमस पिकेटी का एक आलेख “भारतीय आय में असमानता, 1922-2015 : ब्रिटिश राज से बिलियनर राज तक ?” प्रकाशित हुआ था. दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि भारत में