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समाज और संस्कृति

क्या सार्वजनिक सेवाओं में सुधार लाने से ग्राहकवाद में कमी आ सकती है?

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14/08/2017
ओलिवर हीथ और लुईस टिलिन
भारत सरकार के भारत के आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात पर खेद प्रकट किया गया है कि भारतीय राज्य “प्रतियोगी सर्विस डिलीवरी” के बजाय “प्रतियोगी लोकप्रियता” (अर्थात् माल और सेवाएँ देने) में अधिक दिलचस्पी

कनेक्टेड दुनिया में कंप्यूटर शिक्षाः ऑन लाइन होने वाले छात्रों के लिए बढ़ता जोखिम

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03/07/2017
कैथरीन ज़िस्कोव्स्की
वर्ष 2015 की ग्रीष्म ऋतु में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को “डिजिटल दृष्टि से एक सशक्त समाज और ज्ञानपरक अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने” के अपने डिजिटल इंडिया के कार्यक्रम के लोकार्पण के अवसर पर उद्घाटन भाषण दिया था. अपने उद्घाटन भाषण में मोदी ने

भारतीय मतदाता उम्मीदवार चुनने के लिए त्वचा के रंग का उपयोग कैसे करते हैं

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17/07/2017
अमित आहुजा
भारत के लोग त्वचा के रंग पर बहुत ज़ोर देते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि माँ-बाप का ध्यान अपने नवजात शिशु की दो बातों पर रहता हैः शिशु लड़का है या लड़की और उसका रंग कैसा है, गोरा या काला. सन् 2014 में भारतीयों ने ₹ 3,695 करोड़ ($550 मिलियन) गोरा करने वाले उत्पादों पर खर्च

टाइल साम्राज्यवाद

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05/06/2017
दीप्ता सतीश
पश्चिमी घाट में “प्राकृतिक आवास-स्थलों” के रूप में खास तरह के भूखंड निर्मित हो गए हैं, जैसे, पहाड़ी और घाटी, चोटी और पठार, ढलान और मैदान. सन् 2012 में यूनेस्को द्वारा इस घाट को विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित करने के बाद इन विशेषताओं के कारण ही यह घाट विकास और पर्यावरण के झगड़े का केंद्र बन गया है और यह संघर्ष अब बढ़ता ही जा रहा है. भूखंडों की इस

पर्यावरण के लिए अनुकूल रोड नैटवर्क बनाने के लिए सुनियोजित योजना

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10/04/2017
शशांक श्रीनिवासन
भारत को ज़रूरत है सड़कों की. देश भर में माल-असबाब और लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए हमारे लिए रोड नैटवर्क बेहद आवश्यक है और इसकी मदद से ग्रामीण इलाके भी पूरे देश से जुड़ जाएँगे. रेल मार्ग और भारत की सड़कें सारे देश में एकता स्थापित करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि भारत में कितनी सड़कें होनी चाहिए?

भारत में राजनीति किस प्रकार सड़क व्यवस्था को प्रभावित करती है

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27/03/2017
अंजली थॉमस बॉलकेन
भारत सरकार हर साल नागरिकों को पानी, साफ़-सफ़ाई, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे से संबंधित कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भारी मात्रा में संसाधन जुटाती रही है. हालाँकि इन सभी प्रयासों से आम आदमी के जीवन-स्तर को सुधारने में बहुत हद तक मदद मिलने

अनुसूचित जनजाति का दर्जाः स्पष्टीकरण की आवश्यकता

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13/03/2017
क्रिस्टिना- आयोना ड्रैगोमीर
भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त करने वाले समुदायों को कुछ संरक्षण प्रदान किये जाते हैं, लेकिन यह बात हमेशा ही विवादग्रस्त रही है कि किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान किया जाए. अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने का अर्थ है कि इन समुदायों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व के

उड़ान-योजनाओं में अवरोधः भारतीय ड्रोन उद्योग के विनियमों में व्याप्त उदासीनता

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27/02/2017
अनंत पद्मनाभन
लगभग एक साल पहले नागरिक विमानन के भारतीय महानिदेशालय (DGCA) ने ड्रोन के दिशा-निर्देशों का प्रारूप जारी किया था. भारत में अपेक्षाकृत नया उद्योग होने के कारण इन विनियमों के महत्व को देखते हुए अनेक उद्योग निकायों और स्टार्टअप्स ने इस पर अपना फ़ीडबैक दिया था और समयबद्ध कार्रवाई करने का आग्रह किया था. इस बात पर

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग 2)

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24/10/2016
ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के अनौपचारिक नेताओं से संबंधित इस द्विभागीय श्रृंखला के भाग एक में हमने चर्चा की थी कि किस प्रकार झुग्गी-झोपड़ियों के निवासी अपनी बस्ती के नेता बन जाते हैं और वे किस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. इस अंक में हमने उन्हीं बस्तियों की झुग्गी-झोपड़ियों के 629 वास्तविक नेताओं के नमूनों के आधार पर 2016 के ग्रीष्म में आयोजित अपने दूसरे सर्वेक्षण के निष्कर्ष निकाले हैं. व्यवस्थित रूप में और बहुत बड़े स्तर की बात तो छोड़ दें, झुग्गी-

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग1)

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10/10/2016
ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
शहरों में भूसांख्यिकीय परिवर्तन के साथ-साथ शासन और विकास की भारी चुनौतियाँ भी सामने आती रही हैं. इनमें सबसे गंभीर चुनौती तो यही है कि अंधाधुंध निर्माण-कार्यों, भारी गरीबी, भूमि-अधिकारों की असुरक्षा और बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं की कमी के कारण झुग्गी-झोपड़ी की बस्तियों का तेज़ी से विस्तार होने लगा है. भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 65 मिलियन लोग देश-भर में फैली शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. ये भारी