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समाज और संस्कृति

टाइल साम्राज्यवाद

दीप्ता सतीश
पश्चिमी घाट में “प्राकृतिक आवास-स्थलों” के रूप में खास तरह के भूखंड निर्मित हो गए हैं, जैसे, पहाड़ी और घाटी, चोटी और पठार, ढलान और मैदान. सन् 2012 में यूनेस्को द्वारा इस घाट को विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित करने के बाद इन विशेषताओं के कारण ही यह घाट विकास और पर्यावरण के झगड़े का केंद्र बन गया है और यह संघर्ष अब बढ़ता ही जा रहा है. भूखंडों की इस

पर्यावरण के लिए अनुकूल रोड नैटवर्क बनाने के लिए सुनियोजित योजना

शशांक श्रीनिवासन
भारत को ज़रूरत है सड़कों की. देश भर में माल-असबाब और लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए हमारे लिए रोड नैटवर्क बेहद आवश्यक है और इसकी मदद से ग्रामीण इलाके भी पूरे देश से जुड़ जाएँगे. रेल मार्ग और भारत की सड़कें सारे देश में एकता स्थापित करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि भारत में कितनी सड़कें होनी चाहिए?

भारत में राजनीति किस प्रकार सड़क व्यवस्था को प्रभावित करती है

अंजली थॉमस बॉलकेन
भारत सरकार हर साल नागरिकों को पानी, साफ़-सफ़ाई, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे से संबंधित कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भारी मात्रा में संसाधन जुटाती रही है. हालाँकि इन सभी प्रयासों से आम आदमी के जीवन-स्तर को सुधारने में बहुत हद तक मदद मिलने

अनुसूचित जनजाति का दर्जाः स्पष्टीकरण की आवश्यकता

क्रिस्टिना- आयोना ड्रैगोमीर
भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त करने वाले समुदायों को कुछ संरक्षण प्रदान किये जाते हैं, लेकिन यह बात हमेशा ही विवादग्रस्त रही है कि किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान किया जाए. अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने का अर्थ है कि इन समुदायों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व के

उड़ान-योजनाओं में अवरोधः भारतीय ड्रोन उद्योग के विनियमों में व्याप्त उदासीनता

अनंत पद्मनाभन
लगभग एक साल पहले नागरिक विमानन के भारतीय महानिदेशालय (DGCA) ने ड्रोन के दिशा-निर्देशों का प्रारूप जारी किया था. भारत में अपेक्षाकृत नया उद्योग होने के कारण इन विनियमों के महत्व को देखते हुए अनेक उद्योग निकायों और स्टार्टअप्स ने इस पर अपना फ़ीडबैक दिया था और समयबद्ध कार्रवाई करने का आग्रह किया था. इस बात पर

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग 2)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के अनौपचारिक नेताओं से संबंधित इस द्विभागीय श्रृंखला के भाग एक में हमने चर्चा की थी कि किस प्रकार झुग्गी-झोपड़ियों के निवासी अपनी बस्ती के नेता बन जाते हैं और वे किस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. इस अंक में हमने उन्हीं बस्तियों की झुग्गी-झोपड़ियों के 629 वास्तविक नेताओं के नमूनों के आधार पर 2016 के ग्रीष्म में आयोजित अपने दूसरे सर्वेक्षण के निष्कर्ष निकाले हैं. व्यवस्थित रूप में और बहुत बड़े स्तर की बात तो छोड़ दें, झुग्गी-

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग1)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
शहरों में भूसांख्यिकीय परिवर्तन के साथ-साथ शासन और विकास की भारी चुनौतियाँ भी सामने आती रही हैं. इनमें सबसे गंभीर चुनौती तो यही है कि अंधाधुंध निर्माण-कार्यों, भारी गरीबी, भूमि-अधिकारों की असुरक्षा और बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं की कमी के कारण झुग्गी-झोपड़ी की बस्तियों का तेज़ी से विस्तार होने लगा है. भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 65 मिलियन लोग देश-भर में फैली शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. ये भारी

शहरी मध्यम वर्ग की राजनीतिः भारत की तीसरी लोकतांत्रिक लहर ?

पौलोमी चक्रबर्ती
पिछले दशक में शहरी मध्यम वर्ग की सक्रियता में निरंतर वृद्धि होती रही है. भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐतिहासिक आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है. इसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी (‘आप’ पार्टी ) का जन्म हुआ था. इसलिए इसे भारत की पहली श्रेणी-आधारित महत्वपूर्ण शहरी राजनैतिक पार्टी माना जा सकता है. हाल ही के इतिहास पर अगर हम नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि 2014 के आम चुनाव में बड़े शहरों के अलावा अन्य शहरों में भी मध्यम वर्ग का मतदान पहली बार गरीब वर्ग से कहीं अधिक हुआ था.

उत्पादन नहीं, खपतः भारतीय ऊर्जा नियोजन की पुनर्कल्पना

राधिका खोसला
ऊर्जा भारत की विकास योजनाओं का केंद्रबिंदु है. यही कारण है कि अधिकांश मामलों में कोयले, गैस, परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा आदि के उत्पादन और उपलब्धता में वृद्धि हुई है. ऊर्जा की वर्तमान योजनाओं के प्रमुख बिंदुओं में इस प्रवृत्ति की झलक मिलती हैः इसमें कोयले (2020 तक 1.5 बिलियन टन के घरेलू उत्पादन के लक्ष्य के साथ) पर विशेष ध्यान दिया गया है और नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि हुई है (2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन की आकांक्षा के साथ), परंतु सप्लाई के प्रति उन्मुख समाधान के ऊर्जा नियोजन की यह दृष्टि ऊर्जा की लंबे समय से चली आ रही

लड़कियों द्वारा गँवाये गये स्कूली पढ़ाई के साल: असम विद्रोह का मामला

प्रकाश सिंह
भारतीय लड़कियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गर्भ में आते ही लड़कों के मुकाबले उनके जन्म लेने की संभावनाएँ भी बहुत कम हो जाती हैं. “खोई हुई लड़कियों” की उपस्थिति अल्ट्रासाउंड टैक्नोलॉजी की पहुँच की ज़द में आ जाती है. साथ ही लड़कियों को स्तनपान भी बहुत कम समय के लिए कराया जाता है और उन पर शिशुपालन संबंधी निवेश भी बहुत कम होता है. उम्र के साथ बढ़ते हुए लड़कों के मुकाबले उन्हें शिक्षा के अवसर भी कम ही मिलते हैं. सूखे या युद्ध के समय भारी आर्थिक आघात के बाद तो इसका दुष्प्रभाव और भी भयानक