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समाज और संस्कृति

भारत की कथाः अपने समाज की कहानी सुनाने की कला

सामंत सुब्रमणियन

अप्रैल के मध्य में नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक एच.वाई.शारदा प्रसाद स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक व्याख्यान दिया था, जिसका विषय था, “ऐतिहासिक जीवनी की कला और शिल्प”.  गुहा ने अपने व्याख्यान में विस्तार से इस प्रकार के लेखन के मूल्य को रेखांकित करते हुए अच्छी जीवनी की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला था. साथ ही उन्होंने एक सवाल भी उठाया था, जो उनके लेखन में भी उभरकर सामने आता है. खास तौर पर  द लिबरल ऐंड अदर एस्सेज़के अंतिम अध्याय में आपने इसका उल्लेख किया है.

भूटान में भारत का पनबिजली निवेशः पर्यावरण पर प्रभाव और सिविल सोसायटी की भूमिका

सुप्रिया रॉय चौधुरी और शशांक श्रीनिवास
भारत अन्य उदीयमान शक्तियों से साथ वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाने में जुटा हुआ है और इसके लिए ज़रूरी है कि वह भारी मात्रा में बिजली की पूर्ति की प्रतिस्पर्धा में प्रभावी रूप में भाग ले. यह तभी संभव हो सकता है

बहिष्कार और भेदभाव से लड़ने का उपाय है, चुनावी कोटा

फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.

स्टेरॉइड्स पर मध्यम वर्गः शहरी भारत में डिजिटल मीडिया की राजनीति

सहाना उडुपा

सारे विश्व में और निश्चित रूप से भारत में भी इंटरनैट से संबद्ध मीडिया के कारण राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में नई आशा का संचार हुआ है और सार्वजनिक बहस और राजनीतिक सक्रियता के नये अखाड़े खुल गए हैं. हाल ही के अनुमान दर्शाते हैं कि भारत में लगभग 350 मिलियन इंटरनैट के उपयोक्ता हैं और पहुँच और संख्याबल की दृष्टि से देखें तो हम केवल चीन और अमरीका के ही आसपास हैं. 

काम करने के अधिकार को सबल बनाने के लिएः भारत का दसवर्षीय राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम

रॉब जेकिन्स
फ़रवरी,2016 में भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम को लागू हुए दस साल पूरे हो गए. नरेगा क्रांतिकारी होने के साथ-साथ सीमित भी है. जहाँ इससे एक ओर प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सार्वजनिक निर्माण की परियोजनाओं पर साल में सौ दिन का रोज़गार मिलता है, वहीं दूसरी ओर श्रम भी बहुत ज़्यादा करना पड़ता है और मज़दूरी भी बहुत कम

आरक्षण पर पुनर्विचारः पंचायती राज में आवर्ती कोटे के अनभिप्रेत परिणाम

रम्या पार्थसारथी
पिछले सप्ताह लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भारत में जाति-आधारित आरक्षण की व्यापक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर टिप्पणी की थी. सुप्रसिद्ध कानूनविद और समाज सुधारक डॉ. बी.आर.अम्बेडकर को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था, ‘अम्बेडकर जी ने कहा था कि दस साल के लिए आरक्षण दें और दस साल के बाद पुनर्विचार करें. उन्हें तब तक उस स्तर पर ले आएँ, लेकिन हमने कुछ नहीं किया.”

भारत में व्यावसायिक बनाम परोपकारी स्थानापन्न मातृत्व (सरोगेसी)

निष्ठा लाम्बा
अक्तूबर के मध्य में भारत के उच्चतम न्यायालय ने व्यावसायिक स्तर पर सरोगेसी प्रथा को लेकर कुछ सवाल उठाये थे.उसके बाद उसी महीने में इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप केंद्र सरकार ने भारत में सरोगेसी के लिए विदेशी जोड़ों पर प्रतिबंध लगा दिेए, लेकिन केवल बाँझ भारतीय जोड़ों को ही इसमें छूट दी गई है. थाईलैंड और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में व्यावसायिक स्तर पर सरोगेसी पर हाल ही में लगाये गये प्रतिबंध को देखते हुए इन

क्या स्थानीय नेता गरीबों को प्राथमिकता देते हैं ? भारत की वितरण-परक प्राथमिकताएँ

मार्क शेंदर
सन् 1985 में भारत में गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपने प्रसिद्ध उद्गार प्रकट करते हुए कहा था: “सरकार द्वारा आम आदमी के कल्याण पर खर्च किये गये एक रुपये में से सिर्फ़ सत्रह पैसे ही आम आदमी तक पहुँचते हैं.” इस तरह के मूल्यांकन से प्रेरित होकर सन् 1993 में 73 वाँ संशोधन पारित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर सीमित रूप में ही

सार्वजनिक भागीदारी से जैव-विविधता का प्रबंधनः क्या भारत की भूमिका बेहतर हो सकती है ?

गज़ाला शहाबुद्दीन
भारत में जैव-विविधता के संरक्षण के लिए अपनाये गये और कानूनी तौर पर स्थापित संरक्षित क्षेत्र ऐतिहासिक रूप में जैव-विविधता के संरक्षण के सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधन रहे हैं. संरक्षित क्षेत्रों (PAs) के अंतर्गत मुख्यतः राष्ट्रीय पार्क और वन्यजीवन अभयारण्य आते हैं, लेकिन हाल ही में सामुदायिक रिज़र्व और संरक्षण रिज़र्व को भी इनमें शामिल कर लिया गया है. इस समय, भारत भर में लगभग 703 संरक्षित क्षेत्र (PAs) हैं, जो देश के भूमि-क्षेत्र के लगभग 5 प्रतिशत इलाके में फैले हुए हैं. ज़मीन और पानी की बढ़ती हुई माँग और

भारत में सिविल सैक्टर और ड्रोन

शशांक श्रीनिवासन

मानव-रहित हवाई वाहनों की मदद से कुछ ऐसे रोबोट उड़ाये जा रहे हैं जिनसे मानव-सहित उड़ानों के कुछ लाभ तो मिलते हैं लेकिन, इनमें न तो कोई जोखिम उठाना पड़ता है और न ही किसी प्रकार की परेशानी नहीं झेलनी पड़ती है. ड्रोन नाम से प्रचलित ये रोबोट पिछले दो दशकों से इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान में हुई प्रगति के कारण काफ़ी चर्चा में आ गए हैं. सन् 1973 में योम कुप्पूर में और सन् 1982 में लेबनान के युद्ध में जब से इनकी क्षमता प्रमाणित हुई है, कई सैन्यबलों ने इनकी मदद से निगरानी का काम शुरू कर दिया है और ड्रोन का उपयोग हथियार के रूप में भी किया जाने लगा है.