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समाज और संस्कृति

उत्पादन नहीं, खपतः भारतीय ऊर्जा नियोजन की पुनर्कल्पना

राधिका खोसला
ऊर्जा भारत की विकास योजनाओं का केंद्रबिंदु है. यही कारण है कि अधिकांश मामलों में कोयले, गैस, परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा आदि के उत्पादन और उपलब्धता में वृद्धि हुई है. ऊर्जा की वर्तमान योजनाओं के प्रमुख बिंदुओं में इस प्रवृत्ति की झलक मिलती हैः इसमें कोयले (2020 तक 1.5 बिलियन टन के घरेलू उत्पादन के लक्ष्य के साथ) पर विशेष ध्यान दिया गया है और नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि हुई है (2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन की आकांक्षा के साथ), परंतु सप्लाई के प्रति उन्मुख समाधान के ऊर्जा नियोजन की यह दृष्टि ऊर्जा की लंबे समय से चली आ रही

लड़कियों द्वारा गँवाये गये स्कूली पढ़ाई के साल: असम विद्रोह का मामला

प्रकाश सिंह
भारतीय लड़कियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गर्भ में आते ही लड़कों के मुकाबले उनके जन्म लेने की संभावनाएँ भी बहुत कम हो जाती हैं. “खोई हुई लड़कियों” की उपस्थिति अल्ट्रासाउंड टैक्नोलॉजी की पहुँच की ज़द में आ जाती है. साथ ही लड़कियों को स्तनपान भी बहुत कम समय के लिए कराया जाता है और उन पर शिशुपालन संबंधी निवेश भी बहुत कम होता है. उम्र के साथ बढ़ते हुए लड़कों के मुकाबले उन्हें शिक्षा के अवसर भी कम ही मिलते हैं. सूखे या युद्ध के समय भारी आर्थिक आघात के बाद तो इसका दुष्प्रभाव और भी भयानक

अंतर्वर्गीय असमानता और मतदान का व्यवहारः भारत के साक्ष्य

पवित्र सूर्यनारायण

भारतीय राजनीति के अंतर्गत राजनैतिक व्यवहार में वर्गीय पहचान पर बहुत जोर दिया गया है. फिर भी भारत एक ऐसा देश है जिसमें व्यक्तियों की भाषा, धर्म और (सवर्ण जाति, पिछड़ी जाति और अनुसूचित जातियों के नाम से) राजनैतिक छत्र के अंतर्गत समाहित जातियों और ‘बिरादरी’ या ‘जाति’ के रूप में बेहद स्थानीकृत उप-जातियों/ रिश्तेदारों के वर्गों के अंतर्गत भी अनेक वर्गीय पहचानें हैं. यदि व्यक्तियों की इतनी अधिक पहचानें हैं तो चुनाव के समय मतदाताओं के लिए किस पहचान का सबसे अधिक महत्व है और क्यों ?   

भारत के शहरी मध्यम वर्ग में जाति और विवाह

अमित आहुजा

आँकड़ों के अनुसार केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं. इससे अक्सर मोटे तौर पर यही निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि वैवाहिक संबंधों का आधार जातिगत है. परंपरागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है. यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की खातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है, लेकिन भारत के शहरी मध्यम वर्ग में युवा लोग शादी के लिए अपने जीवन साथी की तलाश अपनी जाति तक ही सीमित नहीं रखते.

राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) क्या है ?

मेखला कृष्णमूर्ति

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

मुल्ला मंसूर के मारे जाने के कारण अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान के कम होते विकल्प

अजय शुक्ला
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की

नागरिक, पंचायत और सरकार: ग्राम पंचायतें दोराहे पर

गैब्रिएल क्रक्स-विसनर

उस बात को लगभग पच्चीस साल हो गए जब विकेंद्रीकरण पर विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग भारत में शुरू हुआ था. संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार 200,000से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई, उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं का दायित्व सौंपा गया और ऐतिहासिक रूप से वंचितमहिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. बहुत से लोग मानते हैं कि ये पंचायतें लोकतांत्रिक और नौकरशाही के जाल में फँसे कागज़ी शेर हैं. यही कारण है कि नागरिकों से भी उनकी यहीअपेक्षा है कि इन पंचायतों की अनदेखी की जाए.

भारत की कथाः अपने समाज की कहानी सुनाने की कला

सामंत सुब्रमणियन

अप्रैल के मध्य में नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक एच.वाई.शारदा प्रसाद स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक व्याख्यान दिया था, जिसका विषय था, “ऐतिहासिक जीवनी की कला और शिल्प”.  गुहा ने अपने व्याख्यान में विस्तार से इस प्रकार के लेखन के मूल्य को रेखांकित करते हुए अच्छी जीवनी की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला था. साथ ही उन्होंने एक सवाल भी उठाया था, जो उनके लेखन में भी उभरकर सामने आता है. खास तौर पर  द लिबरल ऐंड अदर एस्सेज़के अंतिम अध्याय में आपने इसका उल्लेख किया है.

भूटान में भारत का पनबिजली निवेशः पर्यावरण पर प्रभाव और सिविल सोसायटी की भूमिका

सुप्रिया रॉय चौधुरी और शशांक श्रीनिवास
भारत अन्य उदीयमान शक्तियों से साथ वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाने में जुटा हुआ है और इसके लिए ज़रूरी है कि वह भारी मात्रा में बिजली की पूर्ति की प्रतिस्पर्धा में प्रभावी रूप में भाग ले. यह तभी संभव हो सकता है

बहिष्कार और भेदभाव से लड़ने का उपाय है, चुनावी कोटा

फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.