Penn Calendar Penn A-Z School of Arts and Sciences University of Pennsylvania

समाज और संस्कृति

नया भूमि अधिग्रहण कानून कैसे बनाया जाए

संजय चक्रवर्ती

ढोंग-पाखंड,भुलक्कड़पन, अवसरवाद और अज्ञान के विषैले मिश्रण और पैटर्नलिज़्म अर्थात् बाप-दादा की जायदाद समझने के कारण भूमि अधिग्रहण कानून खिचड़ी बन कर रह गया है. भाजपा के लिए कांग्रेस के बनाये इस कानून को पारित करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना मुश्किल होता जा रहा है और अब उन्होंने मिले-जुले संकेत भेजने भी शुरू कर दिये हैं- हो सकता है कि वे इसे पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला लें, या हो सकता है कि संशोधनों के साथ तत्संबंधी अध्यादेश फिर से जारी कर दें या फिर राज्यों को इतनी छूट दे दी जाए कि वे कानून की जिस धारा को चाहें उसका पालन करें और जिसे नापसंद करते हों उसकी अनदेखी कर दें.

नापाक नफ़रतः लखनऊ में सामुदायिक हिंसा और आगे बढ़ने का मार्ग

कुनाल शर्मा

भारत में सुन्नी और शिया मुसलमानों के बीच लगभग एक सदी से हिंसक झड़पें होती रही हैं, लेकिन राजनीति-विज्ञानियों, पत्रकारों और भारत के नीति-निर्माताओं का ध्यान इस ओर कम ही गया है. इन लोगों का ध्यान मुख्यतः हिंदू-मुस्लिम दंगों पर ही केंद्रित रहा है. अगर इस तरह की हिंसक झड़पों की उपेक्षा की गई और इनको सुलझाने में देरी की गई तो भारत का सामाजिक ताना-बाना ही बिखर जाएगा. 2020 के दशक तक किसी अन्य देश की तुलना में भारत में मुसलमानों की तादाद बढ़ने की आशंका को देखते हुए सुन्नी-शिया दंगों को अभी रोकना बेहद ज़रूरी है ताकि भारत का सामाजिक ताना-बाना बिखरने न पाए.

नेपालः राजनैतिक सुधार के लिए घोषणा पत्र

प्रशांत झा
25 अप्रैल को नेपाल विनाशकारी भूकंप से दहल उठा और उसके बाद भी भूकंप के झटके आते रहे और 12 मई को एक बार फिर से एक शक्तिशाली भूकंप ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया.आठ हज़ार से अधिक लोग अपनी जान गँवा बैठे. लगभग 600,000 से अधिक मकान पूरी तरह से ध्वस्त हो गए या आंशिक रूप में क्षतिग्रस्त हो गये. आठ मिलियन लोग किसी न किसी रूप में इस विनाशकारी भूकंप से प्रभावित हुए हैं. हज़ारों स्कूलों की इमारतें खंडहरों में बदल गई हैं.काठमांडु की सांस्कृतिक विरासत को गहरा आघात लगा है.

संपत्ति की असमानता को उजागर करनाः व्यक्तिगत स्तर पर डैटा संग्रह का एक केस

हेमा स्वामिनाथन

2007 के वैश्विक वित्तीय धमाके और थॉमस पिकेटी की अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक कैपिटल के कारण संपत्ति की असमानता को लेकर आजकल काफ़ी चर्चा होने लगी है. उपभोग के सर्वेक्षण पर आधारित गणनाओं को उद्धृत करते हुए लगातार केवल गरीबी को ही लेकर होने वाली चर्चा के स्थान पर संपत्ति की असमानता को लेकर चर्चा होना एक अच्छे बदलाव का संकेत है. उपभोग के लिए संपत्ति बहुत आवश्यक है और परेशानी के दौर में इसका इस्तेमाल बफ़र के रूप में होता है. कई तरीकों से तो संपत्ति का संबंध आमदनी या उपभोग के बजाय सुखद जीवन की अवधारणा से अधिक है.

क्या जाति-आधारित गणना से भारत जातिगत समाज बन जाएगा?

के सत्यनारायण

भारत के संभ्रांत वर्ग में- खास तौर पर उच्च वर्ग के बुद्धिजीवियों में- भारत की जनगणना 2011 में जाति-आधारित गणना के सवाल पर इतना विरोध और चिंता क्यों है? मेरा उत्तर बहुत सरल-सा है: भारत कानूनी तौर पर एक जातिगत समाज बन जाएगा.