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“अलग-अलग नहीं, साथ-साथ आगे बढ़ें”: क्या दक्षिण एशिया में कोविड-19 की विश्वव्यापी महामारी से क्षेत्रीय सहयोग की भावना को बढ़ावा मिल सकता है

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02/04/2020
अर्न्ड्ट माइकल

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक सौ तीस करोड़ देशवासियों के लिए चौदह घंटे तक जनता कर्फ्यू लगाकर सामाजिक दूरी बनाये रखते हुए संगरोध (क्वारंटाइन) करने का पहला प्रयोग सफल होने के दो दिन के बाद ही 24 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन घोषित कर दिया. मोदी ने यह घोषणा करके कोविड -19 की विश्वव्यापी महामारी के विरुद्ध हर स्तर पर भारत की ओर से युद्ध छेड़ दिया. इस संकट के खिलाफ़ युद्ध की पहली घोषणा 15 मार्च को उस समय की गई थी जब मोदी ने क्षेत्रीय दक्षिण एशिया सहयोग संघ (SAARC) के अपने समकक्ष साथियों के साथ वर्चुअल बैठक की थी और इस बैठक के दौरान इस विश्वव्यापी महामारी से बचने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर समन्वित उपायों पर चर्चा की गई थी.  

इसे सुनिश्चित करने के लिए मोदी की घोषणा के कुछ ही दिनों और सप्ताहों में नई दिल्ली की केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और नगर निगमों के अधिकारियों ने अनेक उपायों की घोषणा कर दी. भले ही इन सभी उपायों की तीव्रता में कुछ अंतर रहा हो, लेकिन अक्सर झगड़ते रहने वाले इन सभी 36 राज्यों और संघशासित क्षेत्रों ने इसके माध्यम से अपनी संघीय प्रणाली का उदाहरण प्रस्तुत किया. कई राज्यों ने स्थिति की गंभीरता का आकलन केंद्र सरकार से भिन्न अपने तरीके से किया. पंजाब से लेकर तमिलनाडु तक की राज्य सरकारों ने आंशिक या पूर्ण राज्यव्यापी लॉकडाउन लागू कर दिया और सामाजिक दूरी बनाये रखने के लिए सिनेमा घरों और विभिन्न प्रकार की शिक्षा संस्थाओं को बंद करने के साथ-साथ लोगों के एक साथ इकट्ठे होने पर भी रोक लगा दी. लंबी दूरी की रेलगाड़ियाँ, उपनगरीय गाड़ियाँ, मैट्रो और रिक्शा भी धीरे-धीरे बंद कर दिए गए. सभी दुकानें, कारखाने, पूजागृह, और दफ़्तर भी बंद कर दिए गए. 

11 मार्च को भारतीय अधिकारियों ने भारत में विदेशियों का प्रवेश रोकने के लिए एक महीने के लिए आधिकारिक तौर पर सभी वीज़ा निलंबित या रद्द कर दिए और विदेश की यात्राओं को रोकने के लिए चेतावनी जारी कर दी और विदेश से भारत आने वाले सभी लोगों के लिए 14 दिनों का संगरोध (क्वारंटाइन) लागू कर दिया. अंततः भारत ने कोविड-19 से प्रभावित देशों की सूची जारी करते हुए इन तमाम देशों के लोगों के भारत में प्रवेश पर रोक लगा दी. इस सूची में यूरोप अधिकांश देश शामिल थे. अंतर्राज्यीय आवागमन पर रोक लगा दी गई और पड़ोसी राज्यों की सीमाएँ सील कर दी गईं.

इन तमाम उपायों और घटना-क्रम पर विचार करते हुए मोदी ने सार्क देशों की जो बैठक आयोजित करने का जो निर्णय लिया, वह सबसे अधिक अप्रत्याशित कदम था. इसलिए आवश्यक है कि स्वास्थ्य संबंधी सहयोग के संदर्भ में हम सार्क की उपलब्धियों और विफलताओं पर गहराई से विचार करें. सन् 1985 में सार्क की स्थापना के समय सार्क में अफ़गानिस्तान (2007 से) बांग्ला देश, भूटान, भारत, नेपाल, मालदीव, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल थे. आबादी की दृष्टि से सबसे अधिक 1.7 बिलियन आबादी वाला संगठन होने के बावजूद सार्क दुनिया का सबसे कम सफलता प्राप्त करने वाला क्षेत्रीय और अंतः शासकीय संगठन रहा है, लेकिन कुछ अच्छी बातें भी हुईं. सार्क की नियमित शिखर वार्ताएँ होती रहीं और आरंभ में दक्षिण एशिया के देशों के बीच पर्दे के पीछे होने वाली अनौपचारिक वार्ताओं के कारण सहयोग का वातावरण बनने लगा. हालाँकि कभी-कभी कुछ मतभेद भी उभरते रहे. सार्क देशों के नेताओं के बीच  “आतंकवाद के रोकने के लिए क्षेत्रीय सहयोग” (1987) जैसे अनेक विषयों पर सहमति भी बनी. उसके बाद सार्क सामाजिक चार्टर (2004) भी बनाया गया, जिसके अंतर्गत गरीबी उन्मूलन या स्वास्थ्य सुधार जैसे क्षेत्रों के लिए अनेक लक्ष्य निर्धारित किये गए और पूरे दक्षिण एशिया में सार्क आपदा प्रबंधन केंद्र जैसे कुछ विशेष केंद्र भी खुल गए, लेकिन दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार (SAFTA) जैसा नियोजित क्षेत्र नहीं बन पाया. विश्व बैंक 2018 के अनुसार आंतर क्षेत्रीय व्यापार दुनिया में सबसे कम होता है और किसी भी क्षेत्र में कुल व्यापार का मुश्किल से 5 प्रतिशत अंश ही किसी क्षेत्रविशेष में होता है. इसलिए दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) की परियोजना सबसे अधिक महत्वपूर्ण परियोजना है. दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) की विफलता और सामान्य विफलता का आंशिक कारण है, भारत-पाक दुश्मनी. और अन्य कारण हैं, वित्तपोषण की कमी या सार्क देशों की भू-रणनीतिक प्राथमिकताओं में परिवर्तन. इन सभी कारणों से सार्क की स्थापना के समय नज़दीकी क्षेत्रीय सहयोग के जिस दृष्टिकोण की बात की गई थी, उसमें नाटकीय तौर पर सार्क सफल नहीं हो पाया. 

जब मोदी मई 2014 में सत्ता में आए थे और उन्होंने उसी समय अपने शपथ-ग्रहण में सार्क देशों के प्रमुख नेताओं और शासनाध्यक्षों को आमंत्रित किया था. उस समय क्षेत्रीय सहयोग की भावी आशाएँ और आकांक्षाएँ बहुत प्रबल थीं. उस समय इस निमंत्रण को सद्भावना का वास्तविक संकेत मानकर यह समझा जाने लगा था कि मोदी सार्क की प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने के लिए सचमुच इच्छुक हैं. काठमांडू (नेपाल) में सार्क की शिखर बैठक बहुत सफल रही. मोदी ने भी इस बैठक में भाग लिया था, लेकिन इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. नवंबर, 2016 में उरी (कश्मीर) में भारत के सैनिक अड्डे पर पाकिस्तानी हमले के बाद इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में सार्क की प्रस्तावित शिखर बैठक को रद्द कर दिया गया था. तब से अब तक कोई प्रगति नहीं हुई और काठमांडू में इसका छोटा-सा मुख्यालय स्थापित करने के बाद यह संगठन लगभग पंगु ही हो गया.
उल्लेखनीय है कि सार्क के क्षेत्रीय स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्र की कुछ उपलब्धियों में उक्त स्वास्थ्य संकट के कारण तेज़ी आ गई है और अप्रैल 2003 में सार्स  के लिए माली (मालदीव) में सार्क के स्वास्थ्य मंत्रियों की आपात् बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक के परिणामस्वरूप दक्षिण एशिया में सार्स के फैलाव को रोकने और उसकी रोक-थाम करने के लिए व्यापक प्रतिबंधक उपाय करने का निर्णय किया गया. इनमें से कुछ उपाय थे, प्रत्येक देश के प्रवेश स्थल पर जाँच, सार्स के संभावित रोगियों को संगरोध या एकांत स्थलों पर ले जाना और उनके संपर्क में आये हुए लोगों की अच्छी तरह से खोजबीन करना. माली में आयोजित इस बैठक में स्वास्थ्य मंत्रियों द्वारा “सार्स के प्रति सार्क की प्रतिक्रिया” संबंधी घोषणा पत्र अपनाया गया.

सार्क देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की नियमित बैठकों के बाद क्षेत्रीय स्तर पर इस विश्वव्यापी महामारी की रोकथाम के लिए आवश्यक तैयारी और “सार्क रोग निगरानी प्रणाली” को कार्यान्वित करने के उपायों पर चर्चा की गई. हालाँकि यह प्रणाली (अभी तक) कार्यान्वित नहीं हो पाई है. जुलाई 2017 में आयोजित सार्क देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की छठी और अंतिम बैठक अभी तक नहीं हो पाई है. इसी बैठक में “क्षेत्रीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख उपायों में तेज़ी लाने के लिए आह्वान” करने के लिए कोलंबो घोषणापत्र को स्वीकार किया गया था, लेकिन घोषणा-पत्रों और बड़े-बड़े भाषणों के माध्यम से प्रतिबद्धता प्रकट करने के अलावा इस बैठक से स्वास्थ्य संबंधी मामलों पर सामूहिक रूप में मिल-जुलकर क्षेत्रीय भावना के साथ सहयोग करने का कोई रास्ता नहीं निकला.

15 मार्च को आयोजित सार्क का वर्चुअल शिखर सम्मेलन चार वर्षों में सार्क की पहले महत्वपूर्ण बैठक थी. इससे यह संकेत मिलता है कि सार्स की महामारी के समान कोविड-19 की विश्वव्यापी महामारी के फैलाव का खतरा भी कितना गंभीर है. वीडियो कॉन्फेरेंसिंग के द्वारा आयोजित इस बैठक में दक्षिण एशिया के लगभग सभी निर्वाचित नेताओं ने भाग लियाः नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली, बांग्ला देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना, अफ़गानी राष्ट्रपति अशरफ़ घानी, भूटानी प्रीमियर लोटे टीशिंग, श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे, मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलीह और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के विशेष स्वास्थ्य सहायक ज़फ़र मिर्ज़ा. इस बैठक में सार्क के महानिदेशक और सार्क आपदा प्रबंधन केंद्र के निदेशक ने भी भाग लिया था.

संयोजक के रूप में बैठक की कार्यसूची निर्धारित करते हुए भारत की ओर से मोदी ने कहा था, “हम अलग-अलग होकर नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर ही कोरोनो वायरस का अच्छी तरह मुकाबला कर सकते हैं.” उन्होंने सभी सदस्यों को भारत द्वारा जनवरी के मध्य से भारत में प्रवेश करने वाले सभी लोगों की जाँच के बारे में भारत द्वारा उठाये गए कदमों की जानकारी दी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मोदी ने “कोविड-19 आपात् निधि” की स्थापना का सुझाव भी दिया. इस निधि के लिए भारत ने $10 मिलियन डॉलर का आरंभिक योगदान भी किया. उन्होंने यह भी बताया कि कोविड-19 से प्रभावित देशों से भारतीय नागरिकों के साथ-साथ पड़ोसी देशों के नागरिकों को भी बाहर निकालने में मदद की. इससे यही स्पष्ट होता है कि भारत सरकार “पहले पड़ोस” की अपनी घोषित नीति का पालन संकट के समय भी करती है. सचमुच भारत ने अपने नागरिकों के साथ-साथ बांग्ला देश, म्याँमार, श्री लंका और नेपाल के नागरिकों को भी स्वदेश वापस लाने में मदद की. भारत-पाक दुश्मनी के बावजूद भारत ने पाकिस्तानी छात्रों को भी वुहान (चीन) से स्वदेश लाने की पेशकश की थी, लेकिन पाकिस्तान ने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया.

सब मिलाकर वर्चुअल कॉन्फ़ेरेंस का सबसे बड़ा लाभ मोदी की यही पेशकश है जिसमें उन्होंने सार्क के सभी सदस्य-देशों को समन्वित रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) का एक ऐसा सॉफ़्टवेयर देने का वायदा किया है जिसकी मदद से सभी प्रकार के रोगों के फैलाव पर नज़र रखते हुए उसकी निगरानी की जा सकती है. मोदी ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद  (ICMR) के माध्यम से सार्क के सदस्य-देशों को दक्षिण एशिया में किसी भी भावी महामारी पर समन्वित रूप से अनुसंधान करने के लिए साझा मंच बनाने में सहयोग करने का प्रस्ताव भी रखा. और अंत में मोदी ने सभी प्रतिभागियों को सूचित किया कि सार्क के सदस्य-देशों के लिए परीक्षण किट और उपकरणों के साथ त्वरित प्रक्रिया में सक्षम डॉक्टरों और विशेषज्ञों का दल उनके लिए उपलब्ध रहेगा. असल में तो भारत ने मालदीव के स्वास्थ्य-सेवा प्राधिकरणों की मदद के लिए मालदीव में चिकित्सा सप्लाई और चिकित्सा दल भेज भी दिया है. सम्मेलन के दौरान अफ़गानी राष्ट्रपति अशरफ़ घानी ने टेलीमेडिसिन का साझा ढाँचा तैयार करने का प्रस्ताव भी किया और श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे और बांग्ला देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सुझाव दिया कि इस सम्मेलन में किये गए विचार-विमर्श को मंत्री-स्तर पर और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के स्तर पर यथाशीघ्र आगे बढ़ाया जाना चाहिए.

भारत ने संकट की इस घड़ी में सहायता की जो उदार पेशकश की है उसे महामारी के मौजूदा फैलाव से भी आगे बढ़कर जारी रखा जाएगा. भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3.66 प्रतिशत (सार्वजनिक) स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है और फ्रांस जैसे देशों के मुकाबले उसका (सार्वजनिक) स्वास्थ्य तंत्र बहुत कमज़ोर है. फ्रांस और जर्मनी अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का क्रमशः 11.5 और 11.1 प्रतिशत खर्च करते हैं. भारत का यह प्रतिशत सार्क के कुछ सदस्य-देशों के बराबर है या फिर उनसे भी कम है. इसलिए भारत और दक्षिण एशिया के सहयोगी देश बहुत ही सीमित संसाधनों और बहुत कम कोरोना आपात् निधि के साथ इस विश्वव्यापी महामारी से लड़ने में जुटे हुए हैं. इस निधि में भारत, मालदीव ($200,000) और भूटान ($100,000) की निधि शामिल है. 

लेकिन स्वास्थ्य ढाँचे की सीमाओं के बावजूद सफलता प्राप्त करके भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह कठोर कदम उठाकर HIV/AIDS और H1N1 स्वाइन फ्लू की रोकथाम करने में सफल हुआ है. इसके साथ-साथ भारत इस समय कोरोना वायरस के परीक्षण की सुविधाओं का विस्तार करके हर सप्ताह 60,000 से 70,000 लोगों के परीक्षण करने में सक्षम एक हज़ार प्रयोगशालाएँ खोल रहा है और लगभग 60 से अधिक निजी प्रयोगशालाओं को अनुमोदन प्रदान करने जा रहा है. 

सार्क के सभी सदस्य-देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों के सामने इसी तरह चुनौतियाँ और कमियाँ हैं और इटली और स्पेन जैसे देशों में हर रोज़ होने वाली हज़ारों मौतों के गंभीर संकट को देखते हुए इन सभी देशों की स्वास्थ्य प्रणालियाँ गंभीर संकट के कारण चरमराने लगी हैं. निश्चय ही भारत और सार्क के अन्य सदस्य-देशों ने इन उपायों को सही ढंग से लागू किया है और इसके कारण दक्षिण एशिया का यह संकट टल भी सकता है. विश्वव्यापी महामारी से लड़ने के लिए मोदी की यह रणनीति और सार्क के अन्य सदस्य-देशों द्वारा प्रदर्शित चिंता एक बेहद सकारात्मक राजनीतिक कदम है. भले ही मोदी और भारत के लिए यह कदम छोटा हो, लेकिन दक्षिण एशिया के लिए यह बहुत बड़ा कदम है, क्योंकि वायरस के लिए इनकी राजनीतिक सीमाएँ कोई मायने नहीं रखतीं. इसलिए इसमें क्षेत्रीय सहयोग बढ़ने की अपार संभावनाएँ निहित हैं.

अर्न्ड्ट माइकल फ़ेल्बर्ग विश्वविद्यालय (जर्मनी) के राजनीति विज्ञान विभाग में लैक्चरर हैं और India’s Foreign Policy and Regional Multilateralism (Palgrave Macmillan, 2013) जैसी पुस्तक के लेखक हैं, जिसे अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं और साथ ही Indian Verstehen (Understanding India, Springer 2016) के सह-संपादक भी हैं. उनके लेख Asian Security, Cambridge Review of International Affairs, Harvard Asia Quarterly, India Quarterly और  India Review में प्रकाशित हो चुके हैं.

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार <malhotravk@gmail.com> / मोबाइल : 91+9910029919