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समाज और संस्कृति

बिजली (पावर ) के बदलते ढाँचे

रोहित चंद्रा

एक सप्ताह पहले ही फ़ैलिन नामक चक्रवात ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश से गुज़रते हुए तबाही मचा दी थी.   यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 200  कि.मी.की रफ़्तार से चलने वाली हवाओं ने समुद्रतटीय इलाकों में बिजली के पारेषण की ढाँचागत सुविधाओं को काफ़ी प्रभावित किया है. बिजली का वितरण करने वाले हज़ारों खंभों और हज़ारों किलोमीटर तक उनकी तारों के उखड़ जाने के कारण विशेष तौर पर ओडिसा के कुछ ज़िले बिजली की भारी कमी से अभी भी जूझ रहे हैं. परंतु फ़ैलिन के दौरान जिस संभावित तबाही से हम बच गये हैं, वह है बड़े स्तर पर ग्रिड फ़ेल होने की तबाही.

बाँध की राजनीतिः भारत, चीन और सीमा-पार नदी

रोहन डिसूज़ा

हाल ही के वर्षों में जब भी भारत और चीन के बीच शिखर-वार्ताएँ हुई हैं, जल-विवाद का मुद्दा मुखर होकर समझौता-वार्ताओं में छाया रहा है. सबसे अधिक उलझन वाला मुद्दा रहा है, भीषण और क्रोधी स्वभाव वाली सीमा-पार की नदी, येलुज़ंगबु-ब्रह्मपुत्र-जमुना (वाईबीजे) प्रणाली, जिसका अपना पूरा जलमार्ग तीन प्रभुता-संपन्न देशों (चीन, भारत और बांगला देश) से होकर गुज़रने के बाद ही खत्म होता है.

किसने बदला गोमाँस की मेरी परंपरा को? : विनियामक परिवर्तन और गुलाबी क्रांति

रोहित दे

परंपरागत धार्मिक विश्वास और पुराने ढंग के खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों में रचे-बसे और परिवर्तन की लहर से बेखबर भारत में अब हर बंधी-बँधाई धारणाओं की तरह गाय की छवि में भी बदलाव आ रहा है. फिर भी पिछले एक दशक में भारत की बदलती राजनैतिक अर्थव्यवस्था और विनियामक राजनीति में गाय एक संकेतक के रूप में उभर रही है. आँकड़े दर्शाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में सभी प्रकार के अन्य समन्वित माँस की कुल खपत के मुकाबले में गोमाँस की खपत कहीं अधिक बढ़ी है.

भारत में कॉपीराइट संबंधी सुधार और प्रोत्साहन-ढाँचे का स्वरूप

अनंत पद्मनाभन

कॉपीराइट संरक्षण को प्रोत्साहन तभी मिल सकता है जब इस संरक्षण के लिए कोई विशेष उपयोगितावादी औचित्य हमारे पास हो. विशिष्ट अधिकारों के साथ-साथ सार्वजनिक हित के अपवाद सहित एकाधिकार वाले इसके व्यापक ढाँचे में भारत में बौद्धिक संपदा का कानून बनाने में उपयोगितावादी की यदि इकहरी नहीं तो नियामक भूमिका तो है ही. वस्तुतः यदि कॉपीराइट रचनाकारों को मात्र सम्मानित करने और उनकी कृतियों को सम्मान दिलाने के लिए न भी हो तो भी शासन की ओर से उन्हें पुरस्कार और पारितोषिक तो दिये ही जा सकते हैं. अगर शासन चाहता है कि वे अधिक से अधिक रचनाएँ करें तो उन्हें अधिकाधिक आर्थिक प्रोत्साहन दिये जाने चाहिए.

क्या एमओओसी भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार में मदद कर सकते हैं ?

गेल क्रिस्टेंसन और ब्रैंडन ऐल्कर्न

भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारी चुनौतियों का सामना कर रहा है. सन् 2007 में प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत के लगभग आधे ज़िलों में उच्च शिक्षा में नामांकन “बहुत ही कम” है और दो तिहाई भारतीय विश्वविद्यालय और 90 प्रतिशत भारतीय कॉलेज गुणवत्ता की दृष्टि से औसत से भी बहुत नीचे हैं. इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि शिक्षा की माँगों को पूरा करने में शासन की विफलता के कारण ही भारत के संभ्रांत और मध्यम वर्ग के विद्यार्थी भारत में और भारत के बाहर भी सरकारी संस्थाओं को छोड़कर निजी संस्थाओं की ओर रुख करने लगे हैं.

भारतीय मतदाता के बचाव में

नीलांजन सरकार

जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, हमारा ध्यान फिर से भारतीय मतदाता की ओर खिंचने लगा है. मीडिया, विद्वज्जन और नीति-निर्माता अक्सर यह गलत धारणा पालने लगते हैं कि भारतीय मतदाता अपेक्षाकृत नासमझ है और केवल अल्पकालीन लक्ष्यों को ही देखता है और उसे बहुत आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है.

मौन क्रांतिः भारत के गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का राजनैतिक तर्क

आदित्य दासगुप्ता

पिछले पंद्रह वर्षों में भारत में महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का एक तरह का अकारादि सूप तैयार होते देखा गया हैः ग्रामीण संपर्क योजना (PMGSY), सार्वभौमिक प्राथमिक स्कूलिंग पहल (SSA), ग्रामीण स्वास्थ्य पहल (NRHM), ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (RGGVY), ग्रामीण रोज़गार गारंटी अर्थात् नरेगा (NREGA),खाद्य सहायता के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम और गरीबों को सीधे लाभ पहुँचाने के लिए एक नया डिजिटल बुनियादी ढाँचा (UID). बिना किसी शोर-शराबे के इन कार्यक्रमों से ज़मीन पर लोगों को असली लाभ मिल रहा है और भारत की गरीबी-विरोधी नीतियों को क्रांतिकारी स्वरूप मिलने लगा है.

पाइप की राजनीतिः विश्व स्तर की ढाँचागत सुविधाएँ और शहरी विकास

लीज़ा ब्यॉर्कमैन

सन् 1991 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बंबई को सिंगापुर की तरह “विश्व स्तर का शहर” बनाने की योजना का श्रीगणेश किया था, तब से बंबई (अब मुंबई) शहर की सूरत में नाटकीय परिवर्तन होता रहा है.

भारत के आप्रवासी मज़दूरों के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था

मैगन रीड

कुछ आप्रवासी लेखकों के अनुमान के अनुसार भारत में मौसमी आप्रवासी मज़दूरों की संख्या 100 मिलियन तक भी हो सकती है. आप्रवासी मज़दूरों को न तो सामाजिक सेवाएँ मिलती हैं और न ही ये लोग शहरी इलाकों में स्थायी तौर पर बस सकते हैं. ऐसे हालात में ये आप्रवासी मज़दूर खास तौर पर खेती-बाड़ी के मौसम में गाँवों में ही रहना पसंद करते हैं. इसके फलस्वरूप वे अपनी मज़दूरी के लिए अपने गाँवों और मज़दूरी के ठिकानों के बीच ही भटकते रहते हैं और पूरे साल के दौरान अधिक से अधिक समय घर के बाहर ही गुज़ारते हैं.