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समाज और संस्कृति

क्या एमओओसी भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार में मदद कर सकते हैं ?

गेल क्रिस्टेंसन और ब्रैंडन ऐल्कर्न

भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारी चुनौतियों का सामना कर रहा है. सन् 2007 में प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत के लगभग आधे ज़िलों में उच्च शिक्षा में नामांकन “बहुत ही कम” है और दो तिहाई भारतीय विश्वविद्यालय और 90 प्रतिशत भारतीय कॉलेज गुणवत्ता की दृष्टि से औसत से भी बहुत नीचे हैं. इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि शिक्षा की माँगों को पूरा करने में शासन की विफलता के कारण ही भारत के संभ्रांत और मध्यम वर्ग के विद्यार्थी भारत में और भारत के बाहर भी सरकारी संस्थाओं को छोड़कर निजी संस्थाओं की ओर रुख करने लगे हैं.

भारतीय मतदाता के बचाव में

नीलांजन सरकार

जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, हमारा ध्यान फिर से भारतीय मतदाता की ओर खिंचने लगा है. मीडिया, विद्वज्जन और नीति-निर्माता अक्सर यह गलत धारणा पालने लगते हैं कि भारतीय मतदाता अपेक्षाकृत नासमझ है और केवल अल्पकालीन लक्ष्यों को ही देखता है और उसे बहुत आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है.

मौन क्रांतिः भारत के गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का राजनैतिक तर्क

आदित्य दासगुप्ता

पिछले पंद्रह वर्षों में भारत में महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का एक तरह का अकारादि सूप तैयार होते देखा गया हैः ग्रामीण संपर्क योजना (PMGSY), सार्वभौमिक प्राथमिक स्कूलिंग पहल (SSA), ग्रामीण स्वास्थ्य पहल (NRHM), ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (RGGVY), ग्रामीण रोज़गार गारंटी अर्थात् नरेगा (NREGA),खाद्य सहायता के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम और गरीबों को सीधे लाभ पहुँचाने के लिए एक नया डिजिटल बुनियादी ढाँचा (UID). बिना किसी शोर-शराबे के इन कार्यक्रमों से ज़मीन पर लोगों को असली लाभ मिल रहा है और भारत की गरीबी-विरोधी नीतियों को क्रांतिकारी स्वरूप मिलने लगा है.

पाइप की राजनीतिः विश्व स्तर की ढाँचागत सुविधाएँ और शहरी विकास

लीज़ा ब्यॉर्कमैन

सन् 1991 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बंबई को सिंगापुर की तरह “विश्व स्तर का शहर” बनाने की योजना का श्रीगणेश किया था, तब से बंबई (अब मुंबई) शहर की सूरत में नाटकीय परिवर्तन होता रहा है.

भारत के आप्रवासी मज़दूरों के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था

मैगन रीड

कुछ आप्रवासी लेखकों के अनुमान के अनुसार भारत में मौसमी आप्रवासी मज़दूरों की संख्या 100 मिलियन तक भी हो सकती है. आप्रवासी मज़दूरों को न तो सामाजिक सेवाएँ मिलती हैं और न ही ये लोग शहरी इलाकों में स्थायी तौर पर बस सकते हैं. ऐसे हालात में ये आप्रवासी मज़दूर खास तौर पर खेती-बाड़ी के मौसम में गाँवों में ही रहना पसंद करते हैं. इसके फलस्वरूप वे अपनी मज़दूरी के लिए अपने गाँवों और मज़दूरी के ठिकानों के बीच ही भटकते रहते हैं और पूरे साल के दौरान अधिक से अधिक समय घर के बाहर ही गुज़ारते हैं.

नक्सली चुनौती के विरुद्ध भारत की जवाबी कार्रवाई को समझना

समीर लालवानी

अपने चुनावी अभियान के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ़ खूब जुबानी जंग की थी और नक्सलवाद को कतई बर्दाश्त न करने की रणनीति का ऐलान भी किया था और कुछ लोग तो प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से यह उम्मीद लगाये बैठे थे कि वर्तमान रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इस समस्या को सतही तरीके से हल करने की कोशिश की है उससे इन लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

नकदी, उम्मीदवार और चुनावी अभियान

माइकल कोलिन्स

दो माह पूर्व भारत में इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक घटना संपन्न हुई थी. 2014 का आम चुनाव पाँच सप्ताह की अवधि में नौ चरणों में संपन्न हुआ था, जिसमें 16 वीं लोकसभा के लिए 553.8 मिलियन मतदाताओं ने वोट डाले थे. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय सुर्खियों में बनी रही और चुनाव पर हुए भारी खर्च के मामले से लोगों का ध्यान हट गया. एक अनुमान के अनुसार इस चुनाव में $5 बिलियन डॉलर का खर्च आया, जिसमें से $600 मिलियन डॉलर का खर्च तो सरकारी राजकोष से ही हुआ. हाल का यह चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महँगा चुनाव साबित हुआ. 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटीज़) में अंडरग्रैजुएट शिक्षा पर पुनर्विचार

अनुराग मेहरा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटीज़) की स्थापना लगभग पाँच दशक पूर्व विज्ञान पर आधारित विकास के प्रति पं. नेहरू की गहरी निष्ठा से प्रेरित नये भारत को पुनर्जीवित करने के लिए उसे प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी. इन संस्थानों ने भारत को प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान किया या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, क्योंकि यहाँ के अधिकांश (अंडर) ग्रैजुएटया तो विदेश चले गए या फिर उन्होंने गैर-तकनीकी कैरियर अपना लिया.

राजनैतिक मृग-मरीचिकाः मेवात के चश्मे से

प्रीति मान

भारत में हाल ही में हुए चुनाव पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैकल्पिक राजनीति के बीज बोये जा चुके हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि मीडिया के जबर्दस्त समर्थन और दिल्ली में अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बावजूद आम आदमी पार्टी के खाते में लोकसभा की केवल चार सीटें ही आईं? मेवात के चश्मे से चुनावों के समाजशास्त्र को समझने की इस कोशिश में इसका एक पहलू उजागर हुआ है.  मेवात पर केंद्रित होते हुए भी ज़रूरी नहीं है कि ये निष्कर्ष इसी क्षेत्र तक ही सीमित हों.