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संक्रमण के दौर में भारत (India in Transition)

अनंत पद्मनाभन
02/12/2013

कॉपीराइट संरक्षण को प्रोत्साहन तभी मिल सकता है जब इस संरक्षण के लिए कोई विशेष उपयोगितावादी औचित्य हमारे पास हो. विशिष्ट अधिकारों के साथ-साथ सार्वजनिक हित के अपवाद सहित एकाधिकार वाले इसके व्यापक ढाँचे में भारत में बौद्धिक संपदा का कानून बनाने में उपयोगितावादी की यदि इकहरी नहीं तो नियामक भूमिका तो है ही. वस्तुतः यदि कॉपीराइट रचनाकारों को मात्र सम्मानित करने और उनकी कृतियों को सम्मान दिलाने के लिए न भी हो तो भी शासन की ओर से उन्हें पुरस्कार और पारितोषिक तो दिये ही जा सकते हैं. अगर शासन चाहता है कि वे अधिक से अधिक रचनाएँ करें तो उन्हें अधिकाधिक आर्थिक प्रोत्साहन दिये जाने चाहिए.

रोहित दे
18/11/2013

परंपरागत धार्मिक विश्वास और पुराने ढंग के खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों में रचे-बसे और परिवर्तन की लहर से बेखबर भारत में अब हर बंधी-बँधाई धारणाओं की तरह गाय की छवि में भी बदलाव आ रहा है. फिर भी पिछले एक दशक में भारत की बदलती राजनैतिक अर्थव्यवस्था और विनियामक राजनीति में गाय एक संकेतक के रूप में उभर रही है. आँकड़े दर्शाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में सभी प्रकार के अन्य समन्वित माँस की कुल खपत के मुकाबले में गोमाँस की खपत कहीं अधिक बढ़ी है.

रोहन डिसूज़ा
04/11/2013

हाल ही के वर्षों में जब भी भारत और चीन के बीच शिखर-वार्ताएँ हुई हैं, जल-विवाद का मुद्दा मुखर होकर समझौता-वार्ताओं में छाया रहा है. सबसे अधिक उलझन वाला मुद्दा रहा है, भीषण और क्रोधी स्वभाव वाली सीमा-पार की नदी, येलुज़ंगबु-ब्रह्मपुत्र-जमुना (वाईबीजे) प्रणाली, जिसका अपना पूरा जलमार्ग तीन प्रभुता-संपन्न देशों (चीन, भारत और बांगला देश) से होकर गुज़रने के बाद ही खत्म होता है.

रोहित चंद्रा
21/10/2013

एक सप्ताह पहले ही फ़ैलिन नामक चक्रवात ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश से गुज़रते हुए तबाही मचा दी थी.   यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 200  कि.मी.की रफ़्तार से चलने वाली हवाओं ने समुद्रतटीय इलाकों में बिजली के पारेषण की ढाँचागत सुविधाओं को काफ़ी प्रभावित किया है. बिजली का वितरण करने वाले हज़ारों खंभों और हज़ारों किलोमीटर तक उनकी तारों के उखड़ जाने के कारण विशेष तौर पर ओडिसा के कुछ ज़िले बिजली की भारी कमी से अभी भी जूझ रहे हैं. परंतु फ़ैलिन के दौरान जिस संभावित तबाही से हम बच गये हैं, वह है बड़े स्तर पर ग्रिड फ़ेल होने की तबाही.

श्रीनिवास चोक्ककुला
07/10/2013

हाल ही में जल संसाधन मंत्रालय ने सन्2012 की जल नीति के राष्ट्रीय प्रारूप से संबंधित प्रस्ताव के अनुसरण में अंतर्राज्यीय नदियों के जल संबंधी विवादों के लिए एक स्थायी अधिकरण बनाने के लिए एक कैबिनेट नोट तैयार किया है.जहाँ तक रिपोर्ट का संबंध है, विवादों के निवारण में होने वाले विलंब और बार-बार होने वाले इन विवादों के निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय जाने की राज्यों की प्रवृत्ति से सरकार बहुत चिंतित है. न्यायनिर्णयन के लिए स्थायी गुंजाइश रखने का लाभ तो होगा, लेकिन यह काफ़ी नहीं होगा. यह एप्रोच गलत सूचनाओं पर आधारित है.

अपूर्वा जाधव
23/09/2013

पिछले सप्ताह एक बहुत ही महत्वपूर्ण पेंशन निधि विनियामक व विकास प्राधिकरण विधेयक (पेंशन बिल) प्रैस में बिना किसी शोर-शराबे के राज्यसभा में पारित हो गया. कमज़ोर होते रुपये के समाचार की छाया में यह विधेयक, जिसे बनने में लगभग दस साल लग गये, बीमा क्षेत्र में 26 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का मार्ग प्रशस्त करेगा और देश की लगभग न के बराबर औपचारिक पेंशन प्रणाली के लिए एक प्रकार का विनियम बनाने में मदद करेगा. एक बहुत बड़ी चेतावनी को छोड़कर यह समाचार हर लिहाज से शुभ समाचार ही है.

रोहन मुखर्जी
12/08/2013

दूसरों की नज़र से अपने-आपको देखना आत्मनिरीक्षण के लिए बहुत ज़रूरी है. अगर हम इस बात का अध्ययन करते रहें कि दुनिया हमें किस नज़र से देखती है तो कोई भी देश अपनी विदेश नीति के मूल स्वर और प्रभाव के बारे में बहुत कुछ समझ सकता है. जनमत द्विपक्षीय संबंधों के मामले में प्रवृत्तियों को समझने के लिए विश्वसनीय संकेतक का काम करता है और विश्लेषक आम तौर पर किसी भी देश के आकर्षक बिंदुओं (सॉफ़्ट पावर) का आकलन दूसरे समाज की धारणाओं से करते हैं. इसलिए किसी भी देश की विदेशनीति की सफलता का अनुमान किसी और मानदंड से नहीं, बल्कि दूसरे देशों के जनमतके आधार पर अधिक बेहतरढंग से किया जा सकता है.

माधव खोसला
29/07/2013

सूक्ष्म लोकतांत्रिक आदर्शों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए, इसका निर्णय बहुत आसान नहीं है. कुछ व्यापक निर्णय संस्थागत होते हैं, जैसे कि देश को संसद की प्रणाली अपनानी चाहिए या नहीं; और कुछ निर्णय बहुत सूक्ष्म होते हैं- जैसे चुनावी ज़िलों को किस आधार पर गठित किया जाए, चुनावी भाषणों का नियमन कैसे किया जाए, आदि..आदि. लोकतांत्रिक आदर्श को विशिष्ट संस्थागत स्वरूप प्रदान करने से उसका प्रभाव मूलतः उसकी कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है और उस आदर्श को अपने-आपमें चुनौती भी दे सकता है.