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भारत में स्वास्थ्य संबंधी डेटा की निजता और डिजिटलीकरण

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07/12/2020
एन.डी.विवेक

15 अगस्त, 2020 को भारत के स्वाधीनता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आश्वासन के साथ राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) की शुरुआत के समय  घोषणा की थी कि यह मिशन भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा. भारत सरकार के अनुसार राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत बनाने और संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास के लक्ष्य 3 अर्थात् सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की प्राप्ति की दिशा में पहला कदम है. इसका लक्ष्य है, सभी प्रकार के व्यक्तिगत-क्लिनिकल परीक्षणों, बीमारियों, चिकित्सा पर्चियों और रिपोर्टों को स्वास्थ्य संबंधी एक ही पहचान के स्वास्थ्य रिकॉर्डों को डिजिटाइज़ करना. भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित “कोख से लेकर समाधि तक  (womb to tomb) तक”  की स्वास्थ्य संबंधी पहचान का उद्देश्य यही है कि रोगी की देखभाल की क्षमता में सुधार लाया जा सके और उसके स्वास्थ्य संबंधी अभिलेखों को सुगमता से उपलब्ध कराया जा सके. साथ ही इस बारे में यह आशंका भी प्रकट की गई है कि कहीं इसका उपयोग बड़े पैमाने पर निगरानी के उपकरण के रूप में न किया जाए.

पिछले साल दिसंबर में सर्वप्रथम राष्ट्रीय कानूनी ढाँचे के रूप में निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 को संसद के पटल पर रखते समय भारत में सरकारी स्तर पर निगरानी रखने की आशंका प्रकट की गई थी. भारत की संघीय प्रणाली के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी कानून केंद्र-राज्यों के संबंधों में हमेशा ही बहुत जटिल विषय रहा है. केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के पास स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के वितरण के लिए स्वास्थ्य-नीति के संबंध में अधिकांश निर्णय लेने की विनियामक शक्ति मौजूद है, लेकिन स्वास्थ्य सेवा की डिलीवरी में वह सीधे दखल नहीं दे सकता. यह शक्ति मुख्यतः राज्य सरकारों के पास होती है. मौजूदा निजता के नियमों के अंतर्गत सरकार (किसी भी स्तर पर) व्यक्तिगत स्तर पर लोगों से स्वास्थ्य संबंधी अभिलेख लेकर जमा नहीं कर सकती और उसे ये अभिलेख कानूनी न्यायालय की रजिस्ट्री के माध्यम से ही प्राप्त करने होंगे. अगस्त, 2017 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक आदेश में निजता के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के मूलभूत अधिकार के रूप में कायम रखा था. लेकिन डेटा की निजता से संबंधित यह कानून अभी भी बिल्कुल स्पष्ट नहीं है.

इस प्रकार की जानकारी किसको मिल सकती है और अन्य प्रकार के डेटा का दुरुपयोग कौन कर सकता है, जैसे पर्याप्त कानूनी संरक्षण के बिना स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशील डेटा के संग्रह और भंडारण के कारण प्रस्तावित डेटा संरक्षण विधेयक को रद्द करके राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य खाके के कुछ प्रमुख बिंदुओं के साथ निजता की बहस समय से पूर्व ही समाप्त हो सकती है. आधार की राष्ट्रीय पहचान संख्या से संबद्ध स्वास्थ्य-योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्मियों के एक समूह ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जहाँ एक ओर इससे स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की सेवाओं के उपयोग को प्रोत्साहित करने में सुधार हुआ है, वहीं इससे गंभीर नैतिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं; जैसे, टीबी जैसे रोगों और ऐक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम के उपचार में बाधा आई है, क्योंकि रोगियों को अपनी गोपनीयता के भंग होने का खतरा सताने लगा है. उन्होंने यह भी सुझाया कि विकासशील देशों में स्वास्थ्य संबंधी अभिलेखों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में नागरिकों के डेटा के संरक्षण के लिए कानूनी विनियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियाँ लाभ के लिए इस प्रकार के डेटाबेस का दुरुपयोग न कर सकें.

मोदी की घोषणा के अनुरूप स्वास्थ्य डेटा नीति प्रबंधन का मसौदा 26 अगस्त, 2020 को स्वास्थ्य प्रणाली के विभिन्न हितधारकों के बीच चर्चा और विचार-विमर्श के लिए जनता को उपलब्ध करा दिया गया. भारत में विधायी स्वरूप देने से पहले इस नीति पर परामर्श के लिए आवश्यक फ़ीडबैक के लिए एक महीने की न्यूनतम अवधि निर्धारित होने के बावजूद राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) ने आरंभ में जनता से सुझाव आमंत्रित करने के लिए केवल एक सप्ताह का समय ही दिया. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के संकट के दौरान परामर्श के लिए पर्याप्त समय न देने की आलोचना होने के बाद अंतिम तारीख को पहले 10 सितंबर तक और अंत में 21 सितंबर तक बढ़ा दिया गया. खास तौर पर डेटा सुरक्षा से संबंधित मसौदे के अनेक प्रावधानों पर हितधारकों से साथ परामर्श की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई. व्यक्तिगत स्तर पर (रोगियों और डॉक्टरों) का कानूनी पंजीकरण उनकी स्वैच्छिक सहमति के बिना ही कर दिया गया और सार्वजनिक स्वास्थ्य व कानूनी विशेषज्ञों ने इस पर अनेक सवाल उठाये. भारतीय चिकित्सा संघ के ऐलोपैथिक दवाओं के चिकित्सकों की नोडल एजेंसी सहित स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले प्रतिनिधि निकायों ने सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों के कुछ ऐसे मामलों को उद्धृत किया है, जिनमें उन्हें राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) के साथ पंजीकृत करने के लिए अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पेशेवर कार्रवाई करने की बार-बार धमकियाँ दी जाती थीं. इसके अलावा राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद, भारतीय बीमा विनियामक विकास प्राधिकरण और भारतीय भेषज परिषद सहित सांविधिक निकाय जैसी स्वास्थ्य प्रणाली के विभिन्न तत्वों से संबद्ध प्रमुख एजेंसियाँ अपनी विनियामक भूमिका और डेटा को रिकॉर्ड करने और डेटा प्राप्त करने में निजी उपक्रमों की विनियामक भूमिका के बारे में भी स्पष्ट नहीं हैं.

सरकार की विनियामक भूमिका के अलावा, इलैक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय सूचना अवसंरचना नामक नोडल एजेंसी भारत में खास तौर पर ग्रामीण और सुदूर इलाकों में मोबाइल कनैक्टिविटी के लिए इंटरनैट के प्रसार में सुधार लाने के लिए तीव्र गति के ब्रॉडबैंड हाइवे (नेटवर्क और क्लाउड अवसंरचना) को ऑपरेशनलाइज़ कर रही है. भारत स्वास्थ्य अवसंरचना और मानव संसाधनों के संदर्भ में अधिकांश मानदंडों में भी पीछे है. भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली को मज़बूत बनाने के लिए शुरू किये गए स्वास्थ्य संबंधी हस्तक्षेपों के साहित्य के व्यवस्थित पुनरीक्षण से ऐसी दो बातें उजागर हुई हैं जिन पर गहन अध्ययन किया गया है, वे बातें हैं, सेवा की खराब डिलीवरी और प्रशिक्षित स्वास्थ्य-कर्मियों की कमी. जनसंख्या पर डॉक्टरों का अनुपात प्रत्येक 1,445 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर का है. यह अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित 1,000 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर के अनुपात से भी बहुत कम है. ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी दयनीय है. देश के लगभग एक तिहाई योग्य डॉक्टर और नर्सें शहरी निजी क्षेत्र में प्रैक्टिस करते हैं. केवल 38,549 केंद्र इस समय पर्याप्त संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं, जबकि 2022 तक 150,000 ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल के केंद्रों को योग्य और प्रशिक्षित कर्मचारियों से सुसज्जित करके पूरी तरह से चलाने का प्रस्ताव किया गया था. इससे स्पष्ट होता है कि गुणवत्ता के साथ स्वास्थ्य देखभाल के केंद्रों में अभी भी भारी असमानता है. अध्ययन से यह भी पता चला है कि झोपड़पट्टियों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 80 प्रतिशत से अधिक लोग अनौपचारिक निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं के माध्यम से प्राथमिक इलाज करवाते हैं. 

गुणवत्ता के साथ स्वास्थ्य की देखभाल की सुविधा मिलना भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक प्राथमिक चिंता का विषय है. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) के माध्यम से यही प्रयास किया जा रहा है कि स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की सुविधा को सुगम और दक्ष बनाया जाए. नैदानिकी (डायग्नोस्टिक्स) एक ऐसी विधि है, जिसकी मदद से अनिवार्यतः परीक्षण के द्वारा रोग का पता लगाकर उपचार किया जा सकता है. यह एक ऐसी जटिल प्रणाली सिद्ध हुई है जिससे अधिकांश रोगियों को नेविगेट किया जा सकता है.  इसकी मदद से खुद ही अपना परीक्षण और खुद ही अपना इलाज करने के मामले आम होने लगे हैं, जिसके कारण परीक्षण के द्वारा रोग का पता लगाकर इलाज करने का विकल्प खुला रहता है. नये डिजिटल मिशन के अंतर्गत नीति निर्माता, परीक्षण विकासकर्ता और स्वास्थ्य प्रशासकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रोगियों के पास आसान से आसान बिंदु से संबंधित परीक्षण करने की सुविधा उपलब्ध रहे.

डिजिटलीकरण के प्रयासों से रोगियों को वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा? संपूर्ण स्वास्थ्य प्रणाली को एक ही छत के नीचे डिजिटल आर्किटेक्चर को लाने की जटिलता के कारण अमरीका और यू.के. जैसे विकसित देशों को भी डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली को चलाने पर भारी खर्चों, तकनीकी कठिनाइयों और आबादी के बहुत बड़े वर्ग तक किफ़ायती दाम पर गुणवत्ता के साथ स्वास्थ्य की देखभाल करने में बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) इस प्रक्रिया में डिजिटलीकरण की प्रक्रिया से संबद्ध विशेषकर भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाले मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (ASHAs) / सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की समग्र महिला सेना जैसे अन्य हितधारकों के साथ समवेत रूप में स्वास्थ्य-सेवा को एकीकृत करके व्यक्तिगत स्तर पर लोगों तक पहुँचने की ज़मीनी वास्तविकता को समझने से लाभान्वित होगा.

पूरे भारत में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) का कार्यान्वयन किसी विकासशील देश द्वारा देशव्यापी पैमाने पर स्वास्थ्य संबंधी डेटा को डिजिटाइज़ करने का पहला प्रयास होगा और अन्य देशों के लिए यह बढ़िया उदाहरण भी बन जाएगा और वे भी इसका अनुसरण कर सकेंगे. AI और मशीन शिक्षण द्वारा संचालित हैल्थ-टैक चौथी औद्योगिक क्रांति के अंतर्गत किए गए परिवर्तनों का भी एक मजबूत घटक है. (एक ऐसी दुनिया में जो बीमार और जर्जर हो रही है) उद्योग और समाज के मिलन के कारण डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया मिशनों के साथ मिलकर राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (NDHM) वैश्विक स्वास्थ्य के संबंध में निर्णायक नीति सिद्ध हो सकता है और टैक्नोलॉजी के विकास में भारत की प्रतिस्पर्धा को प्रखर बनाने में अपना प्रभाव डाल सकता है.

एन.डी. विवेक सूरत (भारत) में स्थित ऑरो विश्वविद्यालय के लिबरल आर्ट्स और मानव विज्ञान स्कूल में सहायक प्रोफेसर हैं. यहाँ वह राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक नीति का अध्यापन करते हैं. वह भारत के हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी के प्रत्याशी भी हैं. उनके थीसिस का विषय है, वैश्विक स्वास्थ्य शासन और स्वास्थ्य शासन एवं नीति की राजनीति में सरकार से इतर लोगों और संस्थाओं की भूमिका’ (Global health governance and the role of non-state actors in the politics of health governance and policy).

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार <malhotravk@gmail.com> / मोबाइल : 91+9910029919