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राजनीति

नेहरू का भारत और 1956 का स्वेज नहर का संकट

स्वप्ना कोना नायुडु
इसी सप्ताह स्वेज नहर के संकट को साठ साल पूरे हो गए हैं. सामान्य रूप में संबंधित क्षेत्र के प्रति और अरब राष्ट्रवाद के उदय के प्रति भारत के दृष्टिकोण की दृष्टि से यह घटना बहुत महत्वपूर्ण है.शुरू-शुरू में तो भारत इस संकट के मूल कारणों से जुड़ी गतिविधियों के प्रति पूरी तरह से अनजान बना रहा, लेकिन जब भारत ने इस समस्या से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से और इस संकट से जुड़े सभी पक्षों के साथ सीधे राजनयिक चर्चा शुरू की तो ऐसा लगने लगा कि हमें इस अनुभव से बहुत-से पाठ सीखने की आवश्यकता है. इस संकट का आरंभ तब हुआ जब इज़राइल, ब्रिटेन और फ्रांस तीनों ने मिलकर 29 अक्तूबर, 1956 को मिस्र पर हमला कर दिया. हालाँकि यह संकट केवल दस दिनों तक रहा, लेकिन भारत के लिए यह गहरी चिंता का सबब बना रहा.

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग 2)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के अनौपचारिक नेताओं से संबंधित इस द्विभागीय श्रृंखला के भाग एक में हमने चर्चा की थी कि किस प्रकार झुग्गी-झोपड़ियों के निवासी अपनी बस्ती के नेता बन जाते हैं और वे किस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. इस अंक में हमने उन्हीं बस्तियों की झुग्गी-झोपड़ियों के 629 वास्तविक नेताओं के नमूनों के आधार पर 2016 के ग्रीष्म में आयोजित अपने दूसरे सर्वेक्षण के निष्कर्ष निकाले हैं. व्यवस्थित रूप में और बहुत बड़े स्तर की बात तो छोड़ दें, झुग्गी-

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग1)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
शहरों में भूसांख्यिकीय परिवर्तन के साथ-साथ शासन और विकास की भारी चुनौतियाँ भी सामने आती रही हैं. इनमें सबसे गंभीर चुनौती तो यही है कि अंधाधुंध निर्माण-कार्यों, भारी गरीबी, भूमि-अधिकारों की असुरक्षा और बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं की कमी के कारण झुग्गी-झोपड़ी की बस्तियों का तेज़ी से विस्तार होने लगा है. भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 65 मिलियन लोग देश-भर में फैली शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. ये भारी

शहरी मध्यम वर्ग की राजनीतिः भारत की तीसरी लोकतांत्रिक लहर ?

पौलोमी चक्रबर्ती
पिछले दशक में शहरी मध्यम वर्ग की सक्रियता में निरंतर वृद्धि होती रही है. भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐतिहासिक आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है. इसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी (‘आप’ पार्टी ) का जन्म हुआ था. इसलिए इसे भारत की पहली श्रेणी-आधारित महत्वपूर्ण शहरी राजनैतिक पार्टी माना जा सकता है. हाल ही के इतिहास पर अगर हम नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि 2014 के आम चुनाव में बड़े शहरों के अलावा अन्य शहरों में भी मध्यम वर्ग का मतदान पहली बार गरीब वर्ग से कहीं अधिक हुआ था.

लड़कियों द्वारा गँवाये गये स्कूली पढ़ाई के साल: असम विद्रोह का मामला

प्रकाश सिंह
भारतीय लड़कियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गर्भ में आते ही लड़कों के मुकाबले उनके जन्म लेने की संभावनाएँ भी बहुत कम हो जाती हैं. “खोई हुई लड़कियों” की उपस्थिति अल्ट्रासाउंड टैक्नोलॉजी की पहुँच की ज़द में आ जाती है. साथ ही लड़कियों को स्तनपान भी बहुत कम समय के लिए कराया जाता है और उन पर शिशुपालन संबंधी निवेश भी बहुत कम होता है. उम्र के साथ बढ़ते हुए लड़कों के मुकाबले उन्हें शिक्षा के अवसर भी कम ही मिलते हैं. सूखे या युद्ध के समय भारी आर्थिक आघात के बाद तो इसका दुष्प्रभाव और भी भयानक

अंतर्वर्गीय असमानता और मतदान का व्यवहारः भारत के साक्ष्य

पवित्र सूर्यनारायण

भारतीय राजनीति के अंतर्गत राजनैतिक व्यवहार में वर्गीय पहचान पर बहुत जोर दिया गया है. फिर भी भारत एक ऐसा देश है जिसमें व्यक्तियों की भाषा, धर्म और (सवर्ण जाति, पिछड़ी जाति और अनुसूचित जातियों के नाम से) राजनैतिक छत्र के अंतर्गत समाहित जातियों और ‘बिरादरी’ या ‘जाति’ के रूप में बेहद स्थानीकृत उप-जातियों/ रिश्तेदारों के वर्गों के अंतर्गत भी अनेक वर्गीय पहचानें हैं. यदि व्यक्तियों की इतनी अधिक पहचानें हैं तो चुनाव के समय मतदाताओं के लिए किस पहचान का सबसे अधिक महत्व है और क्यों ?   

भारत के शहरी मध्यम वर्ग में जाति और विवाह

अमित आहुजा

आँकड़ों के अनुसार केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं. इससे अक्सर मोटे तौर पर यही निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि वैवाहिक संबंधों का आधार जातिगत है. परंपरागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है. यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की खातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है, लेकिन भारत के शहरी मध्यम वर्ग में युवा लोग शादी के लिए अपने जीवन साथी की तलाश अपनी जाति तक ही सीमित नहीं रखते.

भारत में चुनाव-पूर्व गठबंधन की राजनीति

ऐडम ज़िएगफ़ैल्ड
2015 के उत्तरार्ध में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य बिहार में एक विचित्र बात हुई. राज्य के विधान सभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को किसी अन्य पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक वोट मिले. इसके बावजूद भाजपा विधान सभा में तीसरी सबसे पार्टी के रूप में ही उभरकर सामने आई. भारत जैसे देश में, जहाँ प्रथम-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली का लाभ आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को ही मिलता है, तो फिर यह कैसे संभव हुआ कि सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी चुनाव हार गई ? इसका उत्तर चुनाव-पूर्व गठबंधन में निहित है, जब दो या अधिक राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे के खिलाफ़ अपने

राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) क्या है ?

मेखला कृष्णमूर्ति

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

मुल्ला मंसूर के मारे जाने के कारण अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान के कम होते विकल्प

अजय शुक्ला
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की