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राजनीति

बांग्लादेश-भारत संबंधः भूमि सीमा करार के लेंस के ज़रिये

तमीना एम. चौधुरी
बांग्लादेश-भारत संबंध कदाचित् उप महाद्वीप में सबसे अधिक जटिल द्विपक्षीय संबंध हैं. सन् 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद से ही यह धारणा बनी रही है कि भारत की भूमिका पाकिस्तान के विरुद्ध मात्र अपने राष्ट्र हितों को साधने की रही है. सन् 1972 में शांति और मैत्री की संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद दोनों ही देश आपसी संबंधों को सुधारने का प्रयास करते रहे, लेकिन उन्हें

विमुद्रीकरणः साफ़ तौर पर विध्वंस की राजनीति

अक्षय मंगला
8 नवंबर, 2016 को टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी घोषणा की, जिससे सभी स्तब्ध रह गए. इसी दिन मध्यरात्रि से ₹500 और ₹1,000 के मूल्य-वर्ग के नोट अवैध हो जाएँगे. इस समय जो नकदी प्रचलन में है, वह एक अनुमान के अनुसार कुल नकदी का लगभग 86

सत्ता की सीमाएँ: विश्व की बदलती व्यवस्था के विरुद्ध पाकिस्तान की नीति

जोहान चाको
फ़रवरी 2014 में आईबी के भूतपूर्व प्रमुख अजित दोवाल ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पदभार ग्रहण करने से कुछ समय पहले ही अपने लंबे सार्वजनिक बयान के माध्यम से एक बड़े नीतिगत परिवर्तन की घोषणा की थी. भारत में अलगाववादी और

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय और राज्य स्तर की नीतियाँ

नीलांजन सरकार
30 दिसंबर, 2016 को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने अपने ही बेटे अखिलेश यादव को पार्टी से निष्कासित कर दिया. सिर्फ़ एक दिन के बाद ही निष्कासन आदेश को वापस ले लिया गया और अखिलेश यादव को फिर से अपने पद पर बहाल कर दिया गया. उत्तर प्रदेश (यूपी) के करिश्माई नेता अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत करना शुरू कर दिया था. यही बात कुछ हद तक पार्टी के बुजुर्ग नेताओं और उनके परिवार के सदस्यों को चुभ गई. चुनाव आयोग यूपी में चुनाव की तारीखों की घोषणा करने वाला है. समाजवादी पार्टी के पास अपनी पार्टी में गुटबाज़ी को खत्म करने के लिए बहुत कम समय बाकी है. इसलिए यह समय उनके लिए बहुत कीमती है. किसी को नहीं मालूम कि कल क्या होगा ? स्वाभाविक है कि दैनिक समाचार

भारत-अफ़गानिस्तान “धुरी” और पाकिस्तान का सवाल

अविनाश पालिवाल
भारत-अफ़गानिस्तान के संबंधों की पूरी ताकत का प्रदर्शन 4 दिसंबर, 2016 को अमृतसर में आयोजित छठे हार्ट ऑफ़ एशिया के सम्मेलन में हुआ था. अफ़गान केंद्रित हक्कानी नैटवर्क से संबद्ध “आंतकवादियों” को और भारत केंद्रित लश्कर-ए-ताइबा और जैश-ए-मोहम्मद को “सुरक्षित पनाह” देने के लिए पाकिस्तान की आलोचना करते हुए नई दिल्ली और काबुल ने इस मंच का इस्तेमाल इस्लामाबाद को अलग-थलग करने और नीचा दिखाने के लिए सफलतापूर्वक किया. दोनों देशों ने एयर कार्गो के लिए एक ऐसे कॉरिडोर के बारे में भी चर्चा की, जिसमें पाकिस्तान को बाईपास किया जा सके, क्योंकि अफ़गानिस्तान को उनके देश से भारतीय बाज़ारों में और भारतीय बाज़ारों से उनके देश में आवाजाही का रास्ता अभी तक खुल नहीं पाया है.

संकट, भ्रष्टाचार और विश्वसनीयताः भारत में सरकारी व्यवहार का स्वरूप-निर्धारण

बिलाल बलोच
2011 के आरंभ से लेकर 2012 के अंत तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की यूपीए की गठबंधन सरकार ने भारत के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में सबसे बड़ी नागरिक चुनौती का सामना किया था. यह आंदोलन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से जुड़े उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के घोटालों के लगातार बढ़ने के कारण हुआ था. सन् 2009 में चुनाव में दुबारा सफलता मिलने के बाद यूपीए ने अपने-आपको विश्वसनीयता के संकट और भ्रष्टाचार के बीच फँसा हुआ पाया. भ्रष्टाचार-विरोधी राष्ट्रव्यापी आंदोलनों ने विश्व भर के विकासशील लोकतांत्रिक देशों में 2013 की ग्रीष्म ऋतु की चिलचिलाती धूप में नागरिकों के आक्रोश को स्वर प्रदान किया. टर्की जैसे कुछ लोकतांत्रिक देशों ने इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप

नेहरू का भारत और 1956 का स्वेज नहर का संकट

स्वप्ना कोना नायुडु
इसी सप्ताह स्वेज नहर के संकट को साठ साल पूरे हो गए हैं. सामान्य रूप में संबंधित क्षेत्र के प्रति और अरब राष्ट्रवाद के उदय के प्रति भारत के दृष्टिकोण की दृष्टि से यह घटना बहुत महत्वपूर्ण है.शुरू-शुरू में तो भारत इस संकट के मूल कारणों से जुड़ी गतिविधियों के प्रति पूरी तरह से अनजान बना रहा, लेकिन जब भारत ने इस समस्या से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से और इस संकट से जुड़े सभी पक्षों के साथ सीधे राजनयिक चर्चा शुरू की तो ऐसा लगने लगा कि हमें इस अनुभव से बहुत-से पाठ सीखने की आवश्यकता है. इस संकट का आरंभ तब हुआ जब इज़राइल, ब्रिटेन और फ्रांस तीनों ने मिलकर 29 अक्तूबर, 1956 को मिस्र पर हमला कर दिया. हालाँकि यह संकट केवल दस दिनों तक रहा, लेकिन भारत के लिए यह गहरी चिंता का सबब बना रहा.

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग 2)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के अनौपचारिक नेताओं से संबंधित इस द्विभागीय श्रृंखला के भाग एक में हमने चर्चा की थी कि किस प्रकार झुग्गी-झोपड़ियों के निवासी अपनी बस्ती के नेता बन जाते हैं और वे किस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. इस अंक में हमने उन्हीं बस्तियों की झुग्गी-झोपड़ियों के 629 वास्तविक नेताओं के नमूनों के आधार पर 2016 के ग्रीष्म में आयोजित अपने दूसरे सर्वेक्षण के निष्कर्ष निकाले हैं. व्यवस्थित रूप में और बहुत बड़े स्तर की बात तो छोड़ दें, झुग्गी-

भारत की झुग्गी-झोपड़ियों के नेता (भाग1)

ऐडम ऑएरबैक व तारिक़ थैचिल
शहरों में भूसांख्यिकीय परिवर्तन के साथ-साथ शासन और विकास की भारी चुनौतियाँ भी सामने आती रही हैं. इनमें सबसे गंभीर चुनौती तो यही है कि अंधाधुंध निर्माण-कार्यों, भारी गरीबी, भूमि-अधिकारों की असुरक्षा और बुनियादी सार्वजनिक सुविधाओं की कमी के कारण झुग्गी-झोपड़ी की बस्तियों का तेज़ी से विस्तार होने लगा है. भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 65 मिलियन लोग देश-भर में फैली शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. ये भारी

शहरी मध्यम वर्ग की राजनीतिः भारत की तीसरी लोकतांत्रिक लहर ?

पौलोमी चक्रबर्ती
पिछले दशक में शहरी मध्यम वर्ग की सक्रियता में निरंतर वृद्धि होती रही है. भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐतिहासिक आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है. इसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी (‘आप’ पार्टी ) का जन्म हुआ था. इसलिए इसे भारत की पहली श्रेणी-आधारित महत्वपूर्ण शहरी राजनैतिक पार्टी माना जा सकता है. हाल ही के इतिहास पर अगर हम नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि 2014 के आम चुनाव में बड़े शहरों के अलावा अन्य शहरों में भी मध्यम वर्ग का मतदान पहली बार गरीब वर्ग से कहीं अधिक हुआ था.