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राजनीति

भारत में चुनावः मतदाताओं की गलतियाँ

मिलन वैष्णव

पहचान की राजनीति करना भारत के मानवीय संवाद के अधिकांश विश्लेषण का सबसे अधिक उपयोगी काम रह गया है. कई दशकों तक तो जाति और समुदाय की खाई को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाता था, क्योंकि इसीसे सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिशीलता के  स्वरूप को आकार मिलता था. जिस हद तक लोग व्यक्तिगत स्तर पर हिंसक गतिविधियों में संलग्न  होते हैं, सामूहिक तौर पर हिंसक हो जाते हैं, सार्वजनिक हितकारी कामों को सफलता से पूरा करते हैं या चुनाव के दिन निर्णय लेते हैं – सभी कुछ जातीय पहचान के दायरे में देखा जाता है.

परमाणु संरक्षकों का संरक्षण

क्रिस्टोफ़र क्लैरी

सन् 1998 के परमाणु परीक्षण की पंद्रहवीं वर्षगाँठ को कुछ सप्ताह ही हुए हैं. सन् 1974 के भारत के “शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण” की चालीसवीं वर्षगाँठ को पूरा होने में साल भर से कम समय बचा है. भारत अपने परमाणु वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व का अनुभव करता है. अंतर्राष्ट्रीय  हुकूमत द्वारा प्रगति को धीमा करने के लिए किये गये प्रयासों को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और यहाँ तक कि नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने एकजुट होकर परमाणु ऊर्जा की भिन्न-भिन्न प्रकार की अवसंरचनाओं को निर्मित करने और परमाणु हथियारों को बनाने की क्षमता विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास किये हैं.

भारत के लोकतंत्र का कानून

माधव खोसला

सूक्ष्म लोकतांत्रिक आदर्शों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए, इसका निर्णय बहुत आसान नहीं है. कुछ व्यापक निर्णय संस्थागत होते हैं, जैसे कि देश को संसद की प्रणाली अपनानी चाहिए या नहीं; और कुछ निर्णय बहुत सूक्ष्म होते हैं- जैसे चुनावी ज़िलों को किस आधार पर गठित किया जाए, चुनावी भाषणों का नियमन कैसे किया जाए, आदि..आदि. लोकतांत्रिक आदर्श को विशिष्ट संस्थागत स्वरूप प्रदान करने से उसका प्रभाव मूलतः उसकी कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है और उस आदर्श को अपने-आपमें चुनौती भी दे सकता है.

बदलती धाराएँ:अंतर्राज्यीय नदियाँ और संबंध

श्रीनिवास चोक्ककुला

हाल ही में जल संसाधन मंत्रालय ने सन्2012 की जल नीति के राष्ट्रीय प्रारूप से संबंधित प्रस्ताव के अनुसरण में अंतर्राज्यीय नदियों के जल संबंधी विवादों के लिए एक स्थायी अधिकरण बनाने के लिए एक कैबिनेट नोट तैयार किया है.जहाँ तक रिपोर्ट का संबंध है, विवादों के निवारण में होने वाले विलंब और बार-बार होने वाले इन विवादों के निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय जाने की राज्यों की प्रवृत्ति से सरकार बहुत चिंतित है. न्यायनिर्णयन के लिए स्थायी गुंजाइश रखने का लाभ तो होगा, लेकिन यह काफ़ी नहीं होगा. यह एप्रोच गलत सूचनाओं पर आधारित है.

बाँध की राजनीतिः भारत, चीन और सीमा-पार नदी

रोहन डिसूज़ा

हाल ही के वर्षों में जब भी भारत और चीन के बीच शिखर-वार्ताएँ हुई हैं, जल-विवाद का मुद्दा मुखर होकर समझौता-वार्ताओं में छाया रहा है. सबसे अधिक उलझन वाला मुद्दा रहा है, भीषण और क्रोधी स्वभाव वाली सीमा-पार की नदी, येलुज़ंगबु-ब्रह्मपुत्र-जमुना (वाईबीजे) प्रणाली, जिसका अपना पूरा जलमार्ग तीन प्रभुता-संपन्न देशों (चीन, भारत और बांगला देश) से होकर गुज़रने के बाद ही खत्म होता है.

भारत में बाँटने वाली राजनीति और गुप्त मतदानः किसका क्या परिणाम होगा?

मार्क श्नाइडर

क्या राजनैतिक दलों और उनके स्थानीय एजेंटों की पहुँच सरकारी सेवाओं और सरकारी कल्याण योजनाओं से मिलने वाले लाभ तक हो पाती है और क्या वे जान पाते हैं कि मतदाता कैसे वोट डालते हैं और किसको वोट डाल सकते हैं ? यह राजनैतिक रणनीति, जिसे सामाजिक वैज्ञानिक ग्राहकवाद कहते हैं उन स्थानीय नेताओं पर किये गये भारी निवेश पर निर्भर करती है जो मतदाताओं के बारे में यह जानकारी जुटाते हैं कि दल विशेष के प्रति उनकी पसंद क्या है, उनके वोटों के और विकल्प क्या हो सकते हैं, उनके इरादे क्या हैं और साथ ही यह भी कि चुनाव के दौरान वे अपने दल के पक्ष में मतदाताओं को रिझाने के लिए कौन-से लोक-लुभावने काम कर सकते हैं?

भारत में आनुवंशिक राजनीति फल-फूल रही है, लेकिन असली नेता दूसरे मार्गों से शीर्ष पर पहुँच रहे हैं

पैट्रिक फ्रैंच

जो लोग यह मानते हैं कि भारतीय समाज आम तौर पर गुणतंत्र पर अधिकाधिक ज़ोर देने लगा है, उन्हें यह बात रास नहीं आती कि वंशवाद अभी-भी चुनावी राजनीति पर हावी है- लेकिन अब उनका प्रभाव इतना नहीं रह गया है, जितना कि पहली नज़र में दिखायी देता है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों ने शीर्ष पर पहुँचने का दूसरा रास्ता ढूँढ लिया हैः कई दलों के ऊपरी पायदान के प्रमुख नेताओं को वंशवाद का कोई लाभ नहीं मिलता और जल्द ही इस व्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की भी कोई संभावना नहीं है. 

भारतीय मतदाता के बचाव में

नीलांजन सरकार

जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, हमारा ध्यान फिर से भारतीय मतदाता की ओर खिंचने लगा है. मीडिया, विद्वज्जन और नीति-निर्माता अक्सर यह गलत धारणा पालने लगते हैं कि भारतीय मतदाता अपेक्षाकृत नासमझ है और केवल अल्पकालीन लक्ष्यों को ही देखता है और उसे बहुत आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है.

भारतीय संघवाद के लिए तेलंगाना के क्या मतलब हैं?

अरुण सागर

आखिरी क्षणों में हुई राजनीतिक धमाचौकड़ी को अगर छोड़ दिया जाए तो 2014 की शुरुआत में तेलंगाना भारत का 29 वाँ राज्य बन जाएगा. इससे उस कहानी का अंत हो गया जिसकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में राज्यों के पुनर्गठन के पहले चरण के रूप में हुई थी. तेलंगाना उस आंध्र प्रदेश को विभाजित करके बनाया जाएगा, जिसका निर्माण सन् 1953 में तत्कालीन हैदराबाद और मद्रास राज्यों के तेलुगुभाषी क्षेत्रों को मिलाकर किया गया था. तेलंगाना उस क्षेत्र का नाम है जो पहले हैदराबाद राज्य का हिस्सा था. आंध्र प्रदेश  के निर्माण के बाद ही भाषाई आधार पर अन्य राज्यों के निर्माण के लिए आंदोलनों की शुरुआत हुई थी.