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राजनीति

नकदी, उम्मीदवार और चुनावी अभियान

माइकल कोलिन्स

दो माह पूर्व भारत में इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक घटना संपन्न हुई थी. 2014 का आम चुनाव पाँच सप्ताह की अवधि में नौ चरणों में संपन्न हुआ था, जिसमें 16 वीं लोकसभा के लिए 553.8 मिलियन मतदाताओं ने वोट डाले थे. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय सुर्खियों में बनी रही और चुनाव पर हुए भारी खर्च के मामले से लोगों का ध्यान हट गया. एक अनुमान के अनुसार इस चुनाव में $5 बिलियन डॉलर का खर्च आया, जिसमें से $600 मिलियन डॉलर का खर्च तो सरकारी राजकोष से ही हुआ. हाल का यह चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महँगा चुनाव साबित हुआ. 

अफ्रीका पर केंद्रितः भारत की गतिविधियों का उभरता केंद्र उप-सहारा अफ्रीका

अर्न्ट मिचाएल

पिछले कुछ वर्षों में जिस परिमाण में उप-सहारा अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में भारी वृद्धि हुई है वह अपने-आप में ही इस बात का प्रमाण है कि उप-सहारा अफ्रीका भारत की नई धुरी है; भारत और उप-सहारा अफ्रीका के बीच सन् 2012 में व्यापार $60 बिलियन डॉलर का हो गया. उसी वर्ष अन्य देशों (योरोपीय संघ ($567.2 बिलियन डॉलर), अमरीका ($446.7 बिलियन डॉलर) और चीन ($220 बिलियन डॉलर) के साथ व्यापार में उल्लेखनीय कमी हुई.

राजनैतिक मृग-मरीचिकाः मेवात के चश्मे से

प्रीति मान

भारत में हाल ही में हुए चुनाव पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैकल्पिक राजनीति के बीज बोये जा चुके हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि मीडिया के जबर्दस्त समर्थन और दिल्ली में अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बावजूद आम आदमी पार्टी के खाते में लोकसभा की केवल चार सीटें ही आईं? मेवात के चश्मे से चुनावों के समाजशास्त्र को समझने की इस कोशिश में इसका एक पहलू उजागर हुआ है.  मेवात पर केंद्रित होते हुए भी ज़रूरी नहीं है कि ये निष्कर्ष इसी क्षेत्र तक ही सीमित हों.

व्यक्तिगत हिंसा की दरारः कश्मीरी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास

राहुल पंडित

उत्तर भारतीय राज्य जम्मू व कश्मीर इस समय भयानक बाढ़ संकट से गुज़र रहा है. कश्मीरी घाटी में बाढ़ से हुई तबाही के कारण अनेक जानें गई हैं और बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हो गई है. हालाँकि कई संगठन और लोग बचाव और राहत कार्य में लगे हैं, लेकिन भारतीय सेना की भूमिका अब तक सबसे बड़े रक्षक की रही है. बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि कश्मीरी लोग अब भारतीय सेना को अलग नज़रिये से देखने लगे हैं.

भाजपा और गठबंधन राजनीति

अदनान फ़ारूक़ी और ईश्वरन श्रीधरन

सन् 2014 से पूर्व भारत में लगातार (1989 से 2009 तक ) सात ऐसे चुनाव हुए, जिनमें किसी भी एक दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं मिला. इसके फलस्वरूप अल्पसंख्यक सरकारें बनीं. इनमें वे ढुलमुल अल्पसंख्यक सरकारें भी थीं, जो बाहरी समर्थन पर निर्भर थीं.

हैसियत की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति

रोहन मुखर्जी

हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में पंकज मिश्र ने आधुनिक हिंदू भारतीय मानसिकता को “उत्पीड़न और अंधराष्ट्रीयता” के रंग भरकर दिखाने की कोशिश की है और यह तर्क दिया है कि “बहुत बड़े इलाके में फैले हुए और पूरी तरह से वैश्विक मध्यमवर्गीय हिंदू समुदाय के अनेक महत्वाकांक्षी सदस्य गोरे पश्चिमी लोगों की तुलना में ऊँची हैसियत की अपनी माँग को लेकर कुंठित महसूस करने लगे हैं.” मिश्र का यह विवादित बयान न केवल समकालीन राजनीति को समझने के लिए बहुत उपयुक्त है बल्कि इसमें भारतीय मानसिकता के उन तत्वों को भी उजागर किया गया है जो भारतीय मानस में रचे-बसे हैं.

भारतीय संघ में जनहित की भावना और जवाबदेही

अक्षय मंगला

भारतीय संघ में जवाबदेही के एहसास को बढ़ाने की कोशिश के रूप में प्रधान मंत्री मोदी ने सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति की निगरानी के लिए एक नई निगरानी प्रणाली की शुरुआत की है. बायोमैट्रिक उपस्थिति प्रणाली सरकार के “डिजिटल भारत” प्रोग्राम का ही एक हिस्सा है. इसके अंतर्गत कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दफ़्तर में आने और बाहर जाने के समय को रिकॉर्ड करने के लिए अपनी उंगलियों के निशान और “आधार” से जुड़े हुए अपने विशिष्ट पहचान नं. को इस पर अंकित कर दें.

दक्षिण एशिया और उसके पार क्षेत्रीय सहयोग का मूल्यांकन

ऐर्न्ट माइकल

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रमुख अध्यक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था. यह एक ऐसा महत्वपू्र्ण संकेत हो सकता था जिससे कि दक्षिण एशिया में खास तौर पर द्विपक्षीय स्तर पर क्षेत्रीय सहयोग की नई शुरूआत हो सके. सन् 1985 से भारत ने चार क्षेत्रीय पहल करने में संस्थापक सदस्य की भूमिका का निर्वाह किया था, लेकिन इनमें से किसी भी पहल का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.

नया भूमि अधिग्रहण कानून कैसे बनाया जाए

संजय चक्रवर्ती

ढोंग-पाखंड,भुलक्कड़पन, अवसरवाद और अज्ञान के विषैले मिश्रण और पैटर्नलिज़्म अर्थात् बाप-दादा की जायदाद समझने के कारण भूमि अधिग्रहण कानून खिचड़ी बन कर रह गया है. भाजपा के लिए कांग्रेस के बनाये इस कानून को पारित करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना मुश्किल होता जा रहा है और अब उन्होंने मिले-जुले संकेत भेजने भी शुरू कर दिये हैं- हो सकता है कि वे इसे पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला लें, या हो सकता है कि संशोधनों के साथ तत्संबंधी अध्यादेश फिर से जारी कर दें या फिर राज्यों को इतनी छूट दे दी जाए कि वे कानून की जिस धारा को चाहें उसका पालन करें और जिसे नापसंद करते हों उसकी अनदेखी कर दें.

नेपालः राजनैतिक सुधार के लिए घोषणा पत्र

प्रशांत झा
25 अप्रैल को नेपाल विनाशकारी भूकंप से दहल उठा और उसके बाद भी भूकंप के झटके आते रहे और 12 मई को एक बार फिर से एक शक्तिशाली भूकंप ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया.आठ हज़ार से अधिक लोग अपनी जान गँवा बैठे. लगभग 600,000 से अधिक मकान पूरी तरह से ध्वस्त हो गए या आंशिक रूप में क्षतिग्रस्त हो गये. आठ मिलियन लोग किसी न किसी रूप में इस विनाशकारी भूकंप से प्रभावित हुए हैं. हज़ारों स्कूलों की इमारतें खंडहरों में बदल गई हैं.काठमांडु की सांस्कृतिक विरासत को गहरा आघात लगा है.