Penn Calendar Penn A-Z School of Arts and Sciences University of Pennsylvania

राजनीति

पूरे भारत में बिजली की कमी का संकट

ऐलिज़ाबेथ चटर्जी
क्या कारण है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में बिजली अधिक जाती है ? हाल ही में भारत ने यद्यपि पीढ़ीगत क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन पर्याप्त भुगतान और निवेश न हो पाने और निराशाजनक प्रदर्शन के दुश्चक्र में फँस जाने के कारण कई सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी भी नहीं पहुँच पा रहा है. इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं: सन् 2010 में विश्व बैंक की अनुमानित लागत के अनुसार बिजली की कमी की लागत भारत

भारत-अफ्रीका संबंधों का बदलता परिदृश्य

वेदा वैद्यनाथन
पिछले कुछ दशकों में भारत की अफ्रीका नीति बहुत हद तक निराशा और अनिच्छा से प्रकट की गई प्रतिक्रियाओं के बीच झूलती रही है. कई मंचों पर तो इस महाद्वीप की ओर रणनीतिक उदासीनता भी दिखाई पड़ी है. नई दिल्ली की विदेश नीति के व्यापक ढाँचे में अफ्रीका महाद्वीप के देशों को अब तक कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन अब स्थिति में बदलाव आने लगा है. भारत के नेता अफ्रीकी देशों की यात्रा भी बहुत कम करते थे और बहुत कम ही ऐसा होता था कि नई दिल्ली

भारतीयों के लिए सुरक्षित आर्थिक प्रवासन सुनिश्चित करना

नम्रता राजू
ज़रा कल्पना कीजिए कि आप एक बिल्कुल नये किस्म के काम के लिए विदेश जा रहे हैं और वहाँ जाकर आपको पता चलता है कि $4,700 डॉलर में आपको किसी नियोक्ता के हाथों बेच दिया गया है. यह असंभव-सा लगता है, लेकिन भारत की 39 वर्षीय हैदराबादी महिला की यह असली कहानी है. यह वही महिला है जो पिछले साल सुर्खियों में छाई हुई थी. सलमा को धोखे से कपटी भर्ती एजेंटों द्वारा उसके नियोक्ता को बेच दिया गया था. सलमा ने जब उससे

भारत का ग्रामीण मतदाता कितना समझदार है?

मार्क शाइडर
क्या भारत के ग्रामीण मतदाता इतने समझदार हैं कि वे भारत के स्थानीय चुनावों की जटिलता को समझ सकें ? सन् 1992 में 73 वें संशोधन के पारित होने के बाद ग्रामीण पंचायत अर्थात् ग्रामीण भारत के निम्नतम शासकीय पायदान को संवैधानिक अधिकार मिल गया कि ग्राम पंचायत और सरपंच का चुनाव नियमित रूप में कराया जाए. इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय शासन के लाखों चुनावी पदों का सृजन हो गया. इससे ग्रामीण नेताओं का, खास तौर पर सरपंचों का सशक्तीकरण हो गया और

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता की भू-राजनीति

योगेश जोशी
नवंबर के आरंभ में एक रूसी समाचार वैबसाइट ने दावा किया था कि भारतीय नौसेना ने अमरीका की तकनीकी टीम को सन् 2012 में भारत को पट्टे पर दी गई एक रूसी अकूला-क्लास की परमाणु पनडुब्बी के निरीक्षण की अनुमति दी थी. हालाँकि यह रिपोर्ट बाद में झूठी पाई गई, फिर भी रणनीतिक हलकों में इससे कई सवाल पैदा हो गए. इसके दो कारण थे. इसका पहला कारण तो यही था कि इस दावे के कारण परमाणु पनडुब्बी के मामले में भारत-रूसी सहयोग की बात

एकनिष्ठा का एकाश्म मिथकः संघ परिवार के अंदर विवादित राष्ट्रवाद

गौतम मेहता
2 जुलाई, 2015 को नई दिल्ली में एक असाधारण इफ़्तार पार्टी हुई, जिसने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया. भारत के राजनेता रमज़ान के मुबारक महीने के दौरान रोज़ा तोड़ने के लिए मुस्लिम भाइयों के लिए इफ़्तार पार्टियों का नियमित रूप में आयोजन करते रहे हैं, लेकिन 2014 में प्रधान मंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने न तो इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया और न ही किसी इफ़्तार पार्टी में भाग लिया. यह इफ़्तार पार्टी इसलिए अनूठी थी, क्योंकि इसका

भारत और दक्षिण कोरियाः आपसी सुरक्षा-हितों का आकलन

जी यन-जूङ्

हाल ही में, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ती राजनीतिक सरगर्मियों से दोनों देशों के बीच एशिया में आपसी सुरक्षा-हितों को साझा करने की एक नई शुरुआत हुई है. अभी दो महीने पहले ही, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने अपने प्रशासन के सौवें दिन पूरे होने पर विशेष समारोह का आयोजन किया था, जिसे व्यापक जनसमर्थन मिला. अब द.कोरिया के कूटनीतिक गलियारे में भारत को आमंत्रित करके वह एक साहसिक कदम उठाने जा रहे हैं. 

निजता या प्राइवेसी के बाद ‘आधार'

माधव खोसला व अनंत पद्मनाभन
निजता या प्राइवेसी के संबंध में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा हाल ही में निजता के अधिकार की पुष्टि करते हुए जो निर्णय (न्यायमूर्ति पुत्तास्वामी बनाम भारतीय संघ) दिया गया है, उसके बाद देश के विवादास्पद बायोमैट्रिक प्रोग्राम ‘आधार’ के साथ सरकार ने पहचान के विभिन्न प्रकार के नंबरों और कल्याणकारी योजनाओं को जोड़ने के