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राजनीति

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

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15/01/2018
रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

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01/01/2018
संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

भारत की परमाणु पनडुब्बी क्षमता की भू-राजनीति

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18/12/2017
योगेश जोशी
नवंबर के आरंभ में एक रूसी समाचार वैबसाइट ने दावा किया था कि भारतीय नौसेना ने अमरीका की तकनीकी टीम को सन् 2012 में भारत को पट्टे पर दी गई एक रूसी अकूला-क्लास की परमाणु पनडुब्बी के निरीक्षण की अनुमति दी थी. हालाँकि यह रिपोर्ट बाद में झूठी पाई गई, फिर भी रणनीतिक हलकों में इससे कई सवाल पैदा हो गए. इसके दो कारण थे. इसका पहला कारण तो यही था कि इस दावे के कारण परमाणु पनडुब्बी के मामले में भारत-रूसी सहयोग की बात

एकनिष्ठा का एकाश्म मिथकः संघ परिवार के अंदर विवादित राष्ट्रवाद

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04/12/2017
गौतम मेहता
2 जुलाई, 2015 को नई दिल्ली में एक असाधारण इफ़्तार पार्टी हुई, जिसने मीडिया का ध्यान आकर्षित किया. भारत के राजनेता रमज़ान के मुबारक महीने के दौरान रोज़ा तोड़ने के लिए मुस्लिम भाइयों के लिए इफ़्तार पार्टियों का नियमित रूप में आयोजन करते रहे हैं, लेकिन 2014 में प्रधान मंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने न तो इफ़्तार पार्टी का आयोजन किया और न ही किसी इफ़्तार पार्टी में भाग लिया. यह इफ़्तार पार्टी इसलिए अनूठी थी, क्योंकि इसका

भारत और दक्षिण कोरियाः आपसी सुरक्षा-हितों का आकलन

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06/11/2017
जी यन-जूङ्

हाल ही में, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ती राजनीतिक सरगर्मियों से दोनों देशों के बीच एशिया में आपसी सुरक्षा-हितों को साझा करने की एक नई शुरुआत हुई है. अभी दो महीने पहले ही, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन ने अपने प्रशासन के सौवें दिन पूरे होने पर विशेष समारोह का आयोजन किया था, जिसे व्यापक जनसमर्थन मिला. अब द.कोरिया के कूटनीतिक गलियारे में भारत को आमंत्रित करके वह एक साहसिक कदम उठाने जा रहे हैं. 

निजता या प्राइवेसी के बाद ‘आधार'

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23/10/2017
माधव खोसला व अनंत पद्मनाभन
निजता या प्राइवेसी के संबंध में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा हाल ही में निजता के अधिकार की पुष्टि करते हुए जो निर्णय (न्यायमूर्ति पुत्तास्वामी बनाम भारतीय संघ) दिया गया है, उसके बाद देश के विवादास्पद बायोमैट्रिक प्रोग्राम ‘आधार’ के साथ सरकार ने पहचान के विभिन्न प्रकार के नंबरों और कल्याणकारी योजनाओं को जोड़ने के

किसान के नाम पर

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03/01/2012
मेखला कृष्णमूर्ति

भारत के कृषि विपणन और वितरण प्रणाली में थोक बाज़ारों या मंडियों की विशेष भूमिका है.इस प्रकार भारतीय कृषि के भविष्य के बारे में होने वाले महत्वपूर्ण वाद-विवाद में महत्वपूर्ण तत्व हैं, खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की और खाद्य संबंधी मुद्रास्फीति के प्रबंधन की चुनौतियाँ और राष्ट्र के खाद्यमार्गों के विशाखन के चरित्र और नियंत्रण पर उठते प्रश्न. राज्य के विपणन संबंधी विभिन्न अधिनियमों के अंतर्गत स्थापित और स्थानीय रूप में गठित कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) के प्रबंधन के अंतर्गत मंडी ही किसानों और उनकी उपज के पहले खरीदारों के बीच “पहला महत्वपूर्ण लेन-देन” होता है.

स्थायी संसदीय समितियों का कार्य-संचालन

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09/10/2017
एम. आर. माधवन
लोकतंत्र निर्वाचित संस्थाओं के संचालन से ही विधिमान्य बनता है. संसद अनेक प्रकार के महत्वपूर्ण कार्यों को संपन्न करते हुए भारत के लोकतंत्र में अपनी केंद्रीय भूमिका का निर्वाह करता है. प्रधान मंत्री (और मंत्रिमंडल) को हर समय प्रत्यक्ष रूप में निर्वाचित लोकसभा के बहुमत का समर्थन अपेक्षित होता है. लोकसभा और परोक्ष रूप में निर्वाचित राज्यसभा अपने प्रश्नकाल में पूछे गए सवालों और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर की जाने वाली बहस और प्रस्तावों जैसी अनेक प्रक्रियाओँ के द्वारा

टोक्यो और नई दिल्ली की बढ़ती नज़दीकियों के क्या कारण हैं ?

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25/09/2017
रूपकज्योति बोरा

अगस्त 2007 में जापानी प्रधान मंत्री शिंज़ो आबे ने अपने आरंभिक कार्यकाल के दौरान "दो सागरों के संगम” पर दिये गये अपने ऐतिहासिक भाषण में टिप्पणी की थी कि "प्रशांत और हिंद महासागर अब मिलकर स्वतंत्रता और समृद्धि के समुद्र के रूप में गतिशील हो रहे हैं.”  पिछली कालावधि के रिश्तों के विपरीत जापान और भारत के बीच अब जिस तेज़ी के साथ रिश्तों में गर्माहट बढ़ी है, वह अभूतपूर्व है.

दक्षिण एशिया में चीन के प्रतिकार के लिए “समान विचारधारा वाले” देशों की भागीदारी

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11/09/2017
कॉन्स्टेंटिनो ज़ेवियर

वर्ष 2000 के मध्य से दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभुत्व के कारण इस क्षेत्र में पाकिस्तान से लेकर म्याँमार तक और हिंद महासागर में भी भारत का परंपरागत दबदबा कुछ कम हो गया है. चूँकि बीजिंग पूरे उप महाद्वीप में इतनी भारी मात्रा में वित्तीय निवेश करता है और अपनी रणनीतिक धौंस जमाता है कि नई दिल्ली को अपने रणनीतिक ढंग से भारी क्षमताओं वाली चीनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.