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राजनीति

नौकरशाही किस प्रकार से सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में राजनैतिक संरक्षण का लाभ उठाती है

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07/05/2018
तनुश्री भान
वर्ष 2018 की शुरुआत उस समय एक ऐसी निराशाजनक घटना से हुई जब केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका) में पानी की सप्लाई ठप्प होने की खबर ने पूरी दुनिया के समाचार जगत् को झकझोर कर रख दिया. संपूर्णघटना क्रम में एक और भी तथ्य था, जिसपर मीडिया ने अधिक ध्यान नहीं दिया कि कच्ची बस्तियों में रहने वाले शहर के एक चौथाई लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं और “डे-ज़ीरो” अर्थात पानी न होने की

अनौपचारिक निकासी नैटवर्क के माध्यम से क्रांतिकारियों की वापसीः भारत के साक्ष्य

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23/04/2018
रुमेला सेन
आखिर क्रांतिकारी सशस्त्र गुट को छोड़कर उसी राजनैतिक प्रक्रिया में भाग लेने के लिए कैसे लौट आते हैं, जिसे पहले वे उखाड़ फेंकने की बात करते थे? इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है कि पुरुष और स्त्रियाँ विद्रोह क्यों करते हैं? लेकिन इस बारे में हमारी जानकारी बहुत कम है कि विद्रोह का रास्ता छोड़कर वे सामान्य जीवन में क्यों और कैसे लौट आते हैं. परंतु नेपाल से लेकर कोलंबिया तक नीति-निर्माता अभी भी

शिक्षा प्रणाली में नवाचारः शिक्षा संबंधी नवाचारों के लिए मानदंड कैसे निर्धारित होते हैं?

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09/04/2018
रोहन संधु
एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में भारत में लगभग 15 मिलियन गैर सरकारी संगठन (NGOs) हैं. यदि हाल ही में स्थापित सामाजिक उद्यमों की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाए तो गैर सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में किये गये नवाचारों का स्थान तेज़ी से फैलते कुटीर उद्योगों के नैटवर्क लेते जा रहे हैं. ये हस्तक्षेप अक्सर चक्र का आविष्कार फिर से कर रहे हैं और जो प्रयोग सफल हो भी जाते हैं, वे भी भारत में शिक्षण के संकट को दूर

नमामि गंगेः क्या नई नीति से निरंतर हो रही और अपवित्र गड़बड़ी को ठीक किया जा सकता है ?

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26/03/2018
शरीन जोशी

गंगा भारत की सबसे अधिक पवित्र नदी है, जिसे करोड़ों लोग देवी की तरह पूजते हैं. गंगा भारत की 47 प्रतिशत ज़मीन की सिंचाई करती है और 500 मिलियन लोगों का पेट भरती है. इतनी महत्वपूर्ण नदी होने के बावजूद यह दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक है. तेज़ी से आबादी बढ़ने, शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण इसके पानी में घरेलू और औद्योगिक प्रदूषकों का स्तर बहुत बढ़ गया है.

पूरे भारत में बिजली की कमी का संकट

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12/03/2018
ऐलिज़ाबेथ चटर्जी
क्या कारण है कि कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में बिजली अधिक जाती है ? हाल ही में भारत ने यद्यपि पीढ़ीगत क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन पर्याप्त भुगतान और निवेश न हो पाने और निराशाजनक प्रदर्शन के दुश्चक्र में फँस जाने के कारण कई सुविधाओं का लाभ लोगों तक अभी भी नहीं पहुँच पा रहा है. इसके भारी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं: सन् 2010 में विश्व बैंक की अनुमानित लागत के अनुसार बिजली की कमी की लागत भारत

भारत-अफ्रीका संबंधों का बदलता परिदृश्य

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26/02/2018
वेदा वैद्यनाथन
पिछले कुछ दशकों में भारत की अफ्रीका नीति बहुत हद तक निराशा और अनिच्छा से प्रकट की गई प्रतिक्रियाओं के बीच झूलती रही है. कई मंचों पर तो इस महाद्वीप की ओर रणनीतिक उदासीनता भी दिखाई पड़ी है. नई दिल्ली की विदेश नीति के व्यापक ढाँचे में अफ्रीका महाद्वीप के देशों को अब तक कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन अब स्थिति में बदलाव आने लगा है. भारत के नेता अफ्रीकी देशों की यात्रा भी बहुत कम करते थे और बहुत कम ही ऐसा होता था कि नई दिल्ली

भारतीयों के लिए सुरक्षित आर्थिक प्रवासन सुनिश्चित करना

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12/02/2018
नम्रता राजू
ज़रा कल्पना कीजिए कि आप एक बिल्कुल नये किस्म के काम के लिए विदेश जा रहे हैं और वहाँ जाकर आपको पता चलता है कि $4,700 डॉलर में आपको किसी नियोक्ता के हाथों बेच दिया गया है. यह असंभव-सा लगता है, लेकिन भारत की 39 वर्षीय हैदराबादी महिला की यह असली कहानी है. यह वही महिला है जो पिछले साल सुर्खियों में छाई हुई थी. सलमा को धोखे से कपटी भर्ती एजेंटों द्वारा उसके नियोक्ता को बेच दिया गया था. सलमा ने जब उससे

भारत का ग्रामीण मतदाता कितना समझदार है?

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29/01/2018
मार्क शाइडर
क्या भारत के ग्रामीण मतदाता इतने समझदार हैं कि वे भारत के स्थानीय चुनावों की जटिलता को समझ सकें ? सन् 1992 में 73 वें संशोधन के पारित होने के बाद ग्रामीण पंचायत अर्थात् ग्रामीण भारत के निम्नतम शासकीय पायदान को संवैधानिक अधिकार मिल गया कि ग्राम पंचायत और सरपंच का चुनाव नियमित रूप में कराया जाए. इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय शासन के लाखों चुनावी पदों का सृजन हो गया. इससे ग्रामीण नेताओं का, खास तौर पर सरपंचों का सशक्तीकरण हो गया और

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

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15/01/2018
रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

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01/01/2018
संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?