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राजनीति

भारत की अफ़गानिस्तान नीति के पुनर्निर्धारण का समय

अविनाश पालीवाल
मार्च 2018 में आयोजित सुरक्षा परिषद की बैठक में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने कहा था कि "इस तथ्य के बावजूद कि सशस्त्र समूहों ने खुद की अपनी पहचान बना ली है और हम सभी के सामने यह सिद्ध भी कर दिया है कि वे समझौते के कट्टर विरोधी हैं, फिर भी अफ़गान सरकार की शांति स्थापित करने की इच्छा अभी भी बनी हुई है." सन् 2015 में इसी तरह से आगे बढ़कर घानी ने जो पहल की थी, उसे न केवल नापसंद किया गया था, बल्कि इसे घानी का पाकिस्तान के प्रति झुकाव भी माना

स्वचालन (ऑटोमेशन) और भारत में काम-धंधों का भविष्य

फ्रांसिस कुरियाकोज़ व दीपा ऐयर
हम कृत्रिम बुद्धि (AI) के ऐसे युग में रहते हैं जिसने हमें प्रोसेसिंग की ज़बर्दस्त शक्ति, भंडारण की क्षमता और सूचना तक पहुँचने की शक्ति प्रदान की है. इसी प्रौद्योगिकी के बढ़ते विकास के पहले चरण में हमें चरखा, दूसरे चरण में बिजली और औद्योगिक क्रांति के तीसरे चरण में कंप्यूटर की सौगात मिली. सन् 2016 में विश्व

मैट्रो रेल परियोजनाओं के संबंध में भारत के प्रबल आकर्षण पर चेतावनी का संकेत

मीनाक्षी सिन्हा

कोलकाता में पहली मैट्रो परियोजना के बाद भारत को लगभग दो दशक का समय लगा जब दूसरी मैट्रो रेल परियोजना सन् 2002 में दिल्ली में शुरू हुई. लेकिन उसके बाद भारत के विभिन्न शहरों में मैट्रो रेल परियोजनाओं की झड़ी लग गई. पिछले एक दशक में भारत के तेरह से अधिक शहरों में मैट्रो रेल प्रणालियों को मंजूरी प्रदान की गई और कई राज्य ऐसे हैं जो केंद्र सरकार से अभी-भी मैट्रो रेल परियोजनाओं की मंजूरी मिलने की बाट जोह रहे हैं.

अनजान बने रहने में ही आनंद हैः भारत में असमानता का सच

संजय चक्रवर्ती
बार-बार होने वाले धमाकों की तरह मीडिया और ट्विटर खाताधारकों के बीच छोटा-मोटा वाक् युद्ध ही छिड़ गया है कि भारत में कितनी असमानता है और यह किस हद तक बढ़ती जा रही है. इस बार इस बहस की शुरुआत हुई जेम्स क्रैबट्री की पुस्तक द बिलियनर राज के प्रकाशन से. पिछले साल भी इसी तरह की घटना हुई थी जब ल्यूक चांसेल और थॉमस पिकेटी का एक आलेख “भारतीय आय में असमानता, 1922-2015 : ब्रिटिश राज से बिलियनर राज तक ?” प्रकाशित हुआ था. दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि भारत में

अफ्रीका में एशियाई अड्डा: सेशल्स में भारत को और भी गहरा झटका लग सकता था

नीलंती समरनायके
पिछले माह भारत के राजकीय दौरे के समय सैशल्स के राष्ट्रपति डैनी फ़ॉरे का भव्य स्वागत किया गया था. हिंद महासागर के अपने छोटे-से द्वीप के लिए वह अपने साथ रक्षा सामग्री के रूप में बहुत बड़ी सौगात लेकर गए थेः सेकंड डोर्नियर एयरक्राफ़्ट, सागर सुरक्षा सहयोग के लिए $100 मिलियन डॉलर का लाइन ऑफ़ क्रेडिट और व्हाइट शिपिंग की सूचना साझा करने के लिए एक करार. परंतु दोनों देशों के साझा हितों से संबंधित

भारत में वुहान की शिखर-वार्ता के बाद के विकल्प

रूपकज्योति बोरा
भारत और चीन के बीच हुई वुहान शिखर-वार्ता को भारत-प्रशांत क्षेत्र के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए. यह बात बेहद महत्वपूर्ण है कि नई दिल्ली और बीजिंग अपने मतभेदों को सुलझाने में सक्षम हैं, क्योंकि दोनों देशों को अपना ध्यान आर्थिक विकास पर केंद्रित रखने की आवश्यकता है. नई दिल्ली के लिए यह उचित ही होगा यदि वह सीमा पर चौकसी में किसी भी प्रकार की ढिलाई न करते हुए बीजिंग के साथ अभिसरण (कर्वजेंस) के क्षेत्र में सहयोग करे.जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र

भारत के आंतरिक जल विवाद

स्कॉट मूर
लगभग पंद्रह साल पहले भारत के केंद्रीय जल आयोग ने चेतावनी दी थी कि विश्व के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश में “जलीय राजनीति, संघवाद के मूलभूत ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर तुली हुई है”. वास्तव में सिंधु और ब्रह्मपुत्र सहित सभी नदियों के साथ-साथ उपमहाद्वीप की सभी प्रमुख नदियाँ भी किसी न किसी स्तर पर विवादास्पद ही हैं. वस्तुतः जहाँ अनेक देशों की सीमाओं से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग अधिकाधिक चर्चा में रहते हैं, वहीं भारत की आंतरिक नदियों के

संघनीतिः भारतीय विशेषताओं वाली लोक-लुभावन योजनाएँ

गौतम मेहता
सन् 2018 में डेवोस में विश्व आर्थिक मंच पर एकत्रित विश्व भर के विशिष्ट कारोबारियों को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने वैश्वीकरण की तो खुलकर प्रशंसा की, लेकिन व्यापारिक संरक्षणवाद की आलोचना की थी. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के “कट्टरवादी उदारीकरण” की चर्चा करते हुए सन् 2006 में श्री मोदी ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि आज विश्व में “भारत की अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए सबसे अधिक

अवरोधों और देशीय मूल्यों के अंतराल पर

शौमित्रो चटर्जी
भारत के किसानों से बहुत ही कम राजस्व की वसूली होती है. राजस्व की कमी का एक कारण तो यह है कि उनकी उपज ही नहीं होती और /या उन्हें अपनी उपज का बहुत कम दाम मिलता है. जहाँ एक ओर उत्पादकता का संबंध अधिकांशतः कृषि के तकनीकी पक्षों से होता है, वहीं मूल्य का निर्धारण कृषि की अर्थव्यवस्था के हालात पर निर्भर करता है और इसका निदान आर्थिक नीति में बदलाव लाकर ही किया जा सकता है. इस लेख में मैं मूल्य के दो आयामों पर चर्चा करना चाहूँगा

संस्थागत रस्साकशी : कार्यपालिका के जीवंत होने के दौर में चुनाव आयोग

सूज़न ऑस्टरमैन व अमित आहुजा
विकासशील देशों में संस्थाओं के विद्वत्तापूर्ण और लोकप्रिय लेखों में दो ही बातें मुख्यतः हावी रहती हैं, संस्थागत वर्चस्व और पतन, तो भी भारतीय चुनाव आयोग (EC) सत्यनिष्ठा की भावना से काम करता है और सक्षम होकर उसने अपने अधिकारों का विस्तार भी कर लिया है. भारतीय