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वातावरण

नमामि गंगेः क्या नई नीति से निरंतर हो रही और अपवित्र गड़बड़ी को ठीक किया जा सकता है ?

शरीन जोशी

गंगा भारत की सबसे अधिक पवित्र नदी है, जिसे करोड़ों लोग देवी की तरह पूजते हैं. गंगा भारत की 47 प्रतिशत ज़मीन की सिंचाई करती है और 500 मिलियन लोगों का पेट भरती है. इतनी महत्वपूर्ण नदी होने के बावजूद यह दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक है. तेज़ी से आबादी बढ़ने, शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण इसके पानी में घरेलू और औद्योगिक प्रदूषकों का स्तर बहुत बढ़ गया है.

अक्षय ऊर्जा और इसके क्षेत्रीय परिणाम

रोहित चंद्र
इन दिनों भारत में सहकारी संघवाद ही शासन का मंत्र बना हुआ है. जीएसटी, आधार, विमुद्रीकरण, स्वच्छ भारत और अन्य अनेक योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार जिस दृढ़ता से व्यापक तकनीकी समाधान खोजने का प्रयास कर रही है, वह अभूतपूर्व है. भले ही कुछ समय तक ऐसे हस्तक्षेप तकलीफ़देह लगें, लेकिन इनके दूरगामी लाभ अच्छे ही होंगे, इस बात को मानने के लिए भी स्पष्ट कारण मौजूद हैं, लेकिन ऐसे लाभ सभी क्षेत्रों में हमेशा एक जैसे नहीं हो सकते और इन नीतियों के

क्या भारत में समावेशी विकास संभव है? कृषि क्षेत्र की चुनौती

संजय चक्रवर्ती, एस. चंद्रशेखर और कार्तिकेय नारपराजु

समावेशी विकास या “गरीबोन्मुखी” विकास भारत के विकास संबंधी विमर्श का एक महत्वपूर्ण विचारबिंदु बन गया है. इसे व्यापक समर्थन मिला है, क्योंकि इस विकास में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं: प्रगतिवादी (या अधिक समतावादी) वितरण सहित आमदनी में वृद्धि. इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल में किया गया था. उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने इसे आगे बढ़ाया, लेकिन क्या ‘समावेशी विकास’ ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे से कहीं आगे की बात है?

अल्पकालिक प्रवासन और महिला किसान

हेमा स्वामिनाथन
भारत में कृषि क्षेत्र में महिलाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। ग्रामीण परिवर्तन की मौजूदा स्थिति के कारण ही कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका उजागर हो पाई है। सामान्यतः, इस विषय पर चर्चा बहुत ही स्वभाविक प्रवृत्तियों पर ही केंद्रित रहती है; जैसे, स्व-नियोजित रूप में कृषि-क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का अनुपात, सहायता-राशि का भुगतान न होना या श्रमिकों को मज़दूरी न मिलना। जो मुद्दा उपेक्षित रह जाता है, वह भी महिलाओं की भूमिकाओं में महत्वपूर्ण और दिलचस्प बदलाव

टाइल साम्राज्यवाद

दीप्ता सतीश
पश्चिमी घाट में “प्राकृतिक आवास-स्थलों” के रूप में खास तरह के भूखंड निर्मित हो गए हैं, जैसे, पहाड़ी और घाटी, चोटी और पठार, ढलान और मैदान. सन् 2012 में यूनेस्को द्वारा इस घाट को विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित करने के बाद इन विशेषताओं के कारण ही यह घाट विकास और पर्यावरण के झगड़े का केंद्र बन गया है और यह संघर्ष अब बढ़ता ही जा रहा है. भूखंडों की इस

भारत के भूमिगत जल के निष्कासन का भविष्य

ईशा झवेरी
हर साल जून से सितंबर के अंत तक ग्रीष्म ऋतु की मानसूनी बरसात भारत के दक्षिणी तट से शुरू होकर धीरे-धीरे उत्तर की ओर बढ़ती जाती है, जिसमें भारत की वार्षिक बरसात के 80 प्रतिशत भाग की आपूर्ति होती है. नदियाँ कल-कल करके बहने लगती हैं, खेतों में बुवाई होने लगती है और जलवाही स्तर और जलाशय पानी से लबालब भरने लगते हैं. इसके फलस्वरूप गर्मी

ऊर्जा स्थलों और जलवायु परिवर्तन के कार्यस्थलों के रूप में भारतीय शहर

राधिका खोसला
आजकल शहरों को स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन के लिए रणनीतिक कार्यस्थलों के रूप में देखा जाता है. संयुक्त राष्ट्र के 2015 के स्थायी विकास के लक्ष्यों में पहली बार स्पष्ट रूप में शहरी लक्ष्य को भी शामिल किया गया है और 2015 के पेरिस जलवायु के करार में राष्ट्रीय विकास के संदर्भों में जलवायु के अनुकूल परिणामों के लिए

पर्यावरण के लिए अनुकूल रोड नैटवर्क बनाने के लिए सुनियोजित योजना

शशांक श्रीनिवासन
भारत को ज़रूरत है सड़कों की. देश भर में माल-असबाब और लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए हमारे लिए रोड नैटवर्क बेहद आवश्यक है और इसकी मदद से ग्रामीण इलाके भी पूरे देश से जुड़ जाएँगे. रेल मार्ग और भारत की सड़कें सारे देश में एकता स्थापित करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि भारत में कितनी सड़कें होनी चाहिए?

उत्पादन नहीं, खपतः भारतीय ऊर्जा नियोजन की पुनर्कल्पना

राधिका खोसला
ऊर्जा भारत की विकास योजनाओं का केंद्रबिंदु है. यही कारण है कि अधिकांश मामलों में कोयले, गैस, परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा आदि के उत्पादन और उपलब्धता में वृद्धि हुई है. ऊर्जा की वर्तमान योजनाओं के प्रमुख बिंदुओं में इस प्रवृत्ति की झलक मिलती हैः इसमें कोयले (2020 तक 1.5 बिलियन टन के घरेलू उत्पादन के लक्ष्य के साथ) पर विशेष ध्यान दिया गया है और नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि हुई है (2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन की आकांक्षा के साथ), परंतु सप्लाई के प्रति उन्मुख समाधान के ऊर्जा नियोजन की यह दृष्टि ऊर्जा की लंबे समय से चली आ रही

भारत के शहरी मध्यम वर्ग में जाति और विवाह

अमित आहुजा

आँकड़ों के अनुसार केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं. इससे अक्सर मोटे तौर पर यही निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि वैवाहिक संबंधों का आधार जातिगत है. परंपरागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है. यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की खातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है, लेकिन भारत के शहरी मध्यम वर्ग में युवा लोग शादी के लिए अपने जीवन साथी की तलाश अपनी जाति तक ही सीमित नहीं रखते.