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वातावरण

सुब्रमणियन समिति की रिपोर्ट का मूल्यांकन

शिबानी घोष

भारत में पर्यावरण को व्यवस्थित करने का काम लगातार बेहद मुश्किल और पेचीदा होता जा रहा है. वायु, जल और वन का आच्छादन कुछ ऐसे महत्वपूर्ण संकेतक हैं जिनमें पर्यावरण की गुणवत्ता में तेज़ी से गिरावट आ रही है. साथ ही “विकास के एजेंडा” को सुगम बनाने के लिए विनियामक लचीलेपन की भी ज़रूरत महसूस की जा रही है.  अनेक हितधारकों ने अक्सर विनियामक और संस्थागत सुधारों की बात उठाई है, हालाँकि इसमें उनके व्यापक और अलग-अलग हित भी हो सकते हैं. पर्यावरण संबंधी विनियामकों की असफलता का एक अंतर्निहित कारण सरकार की तदर्थ नीतियाँ भी हो सकती हैं.

ऊर्जा नियोजन के लिए विश्लेषक बेस बनाने की ओर अग्रसर होना

राधिका खोसला

जलवायु परिवर्तन के संबंध में दिसंबर 2015 में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्रसंघ की शिखर वार्ता के संभावित परिणामों को लेकर सारी दुनिया में और भारत में भी अनेक अनुमान लगाये जा रहे हैं. उसकी तैयारी के लिए प्रत्येक देश को इस वर्ष के अंत तक शिखर वार्ता से काफ़ी पहले INDC अर्थात् राष्ट्रीय तौर पर अपेक्षित निर्धारित योगदानपर अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा. अमरीका-भारत के वर्तमान संबंधों के महत्व को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के संबंध में भारत की प्रतिक्रिया को इसमें प्राथमिकता मिल सकती है.

पाइप और झोपड़पट्टीः “गैर-कानूनी बस्तियों” के निवासियों के लिए मुंबई की नई प्रस्तावित जल योजना पर सोच-विचार

लीज़ा ब्रोकमैन

दो दशक पूर्व मुंबई में पाइप से सप्लाई होने वाले म्युनिसिपैलिटी के पानी की व्यवस्था संबंधी नियमों में नाटकीय परिवर्तन आया था. इस परिवर्तन के कारण ही शहर के लोकप्रिय पड़ोसी इलाकों और झोपड़पट्टी के निवासियों को म्युनिसिपल पानी की पात्रता दिलाने के लिए इन नियमों को झोपड़पट्टी पुनर्वास की आवासीय योजनाओं में शामिल कर लिया गया है. ढाँचागत योजना और सर्विस डिलीवरी के (कम से कम सिद्धांत रूप में तो ) स्थानिक और जलप्रेरित तर्कों के द्वारा पहले नियमित पानी की सप्लाई को झोपड़पट्टी पुनर्विकास योजना में पात्रता से जोड़ने के परिणाम भयावह हो चुके हैं.

क्या चीन में आई कोयले की तेज़ी भारत में भी जारी रहेगी ?

फ़िलिप एम. हेनम
इस वर्ष के उत्तरार्ध में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में जलवायु पर जो वार्ताएँ होने जा रही हैं उनमें सारी अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भारत पर ही टिका हुआ है. भारत को उम्मीद है कि कोयला-बहुल औद्योगीकरण पथ के कारण सन् 2030 तक इसका कोल फ़्लीट बढ़कर दुगुना हो जाएगा. यह अनुभव लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं ने किया है और चीन को भी इसका ताज़ा अनुभव अभी हाल ही में हुआ है. यद्यपि वैश्विक कोयले की लगभग आधी खपत तो चीन में ही हो जाती है और अब वह नई नीतियाँ लागू