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संक्रमण के दौर में भारत (India in Transition)

शशांक श्रीनिवासन
10/04/2017
भारत को ज़रूरत है सड़कों की. देश भर में माल-असबाब और लोगों के निर्बाध आवागमन के लिए हमारे लिए रोड नैटवर्क बेहद आवश्यक है और इसकी मदद से ग्रामीण इलाके भी पूरे देश से जुड़ जाएँगे. रेल मार्ग और भारत की सड़कें सारे देश में एकता स्थापित करती हैं, लेकिन सवाल यह है कि भारत में कितनी सड़कें होनी चाहिए? यह तो स्पष्ट हो ही जाना चाहिए कि देश के अधिक से अधिक कितने इलाके में रोड नैटवर्क होना चाहिए. अगर हम सड़क पर आने वाली भारी लागत को थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दें तो भी अवसर की लागत पर विचार तो होना ही चाहिए; यह भी स्पष्ट है कि सड़क-निर्माण के लिए आबंटित ज़मीन का उपयोग किसी और काम के लिए नहीं किया जा सकता. साथ ही कुछ और बातों पर भी
अंजली थॉमस बॉलकेन
27/03/2017
भारत सरकार हर साल नागरिकों को पानी, साफ़-सफ़ाई, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे से संबंधित कार्यक्रमों को लागू करने के लिए भारी मात्रा में संसाधन जुटाती रही है. हालाँकि इन सभी प्रयासों से आम आदमी के जीवन-स्तर को सुधारने में बहुत हद तक मदद मिलने की संभावना होती है, फिर भी राजनैतिक प्रभाव की वजह से व्यापक रूप में आलोचना का शिकार होने के कारण इनके कार्यान्वयन में देरी होती रही है. लेकिन असल में ये राजनैतिक प्रभाव भारत में किस प्रकार सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के कार्यान्वयन को प्रभावित करते हैं? इस सवाल के जवाब से ही हम समझ पाएँगे कि भले ही राजनैतिक हस्तक्षेप को टाला तो नहीं जा
क्रिस्टिना- आयोना ड्रैगोमीर
13/03/2017
भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त करने वाले समुदायों को कुछ संरक्षण प्रदान किये जाते हैं, लेकिन यह बात हमेशा ही विवादग्रस्त रही है कि किन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान किया जाए. अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने का अर्थ है कि इन समुदायों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व के रूप में, स्कूलों में आरक्षित सीटों के रूप में और सरकारी नौकरियों के रूप में वांछित ठोस लाभ प्राप्त होना. पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक और राजनैतिक लामबंदी के कारण अनुसूचित जनजातियों की संख्या अब (एक से अधिक राज्यों में एक दूसरे से टकराती हुई) 700 तक पहुँच गई है, जबकि सन् 1960 में इनकी संख्या 225 थी. जैसे-जैसे अनुसूचित जनजातियों का दर्जा हासिल
अनंत पद्मनाभन
27/02/2017

लगभग एक साल पहले नागरिक विमानन के भारतीय महानिदेशालय (DGCA) ने ड्रोन के दिशा-निर्देशों का प्रारूप जारी किया था. भारत में अपेक्षाकृत नया उद्योग होने के कारण इन विनियमों के महत्व को देखते हुए अनेक उद्योग निकायों और स्टार्टअप्स ने इस पर अपना फ़ीडबैक दिया था और समयबद्ध कार्रवाई करने का आग्रह किया था. इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि ड्रोन के अनेक व्यावहारिक उपयोग हैं. भारत में कुछ स्टार्टअप तो ऐसे हैं जो ड्रोन में विभिन्न क्षेत्रों में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में जुटे हैं. जैसे, आपदा प्रबंधन, सटीक (प्रिसीज़न) खेती-बाड़ी और फसल बीमा, खनन, बुनियादी ढाँचे से जुड़ी परियोजनाएँ और भूमि अभिलेख.

तमीना एम. चौधुरी
13/02/2017
बांग्लादेश-भारत संबंध कदाचित् उप महाद्वीप में सबसे अधिक जटिल द्विपक्षीय संबंध हैं. सन् 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद से ही यह धारणा बनी रही है कि भारत की भूमिका पाकिस्तान के विरुद्ध मात्र अपने राष्ट्र हितों को साधने की रही है. सन् 1972 में शांति और मैत्री की संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद दोनों ही देश आपसी संबंधों को सुधारने का प्रयास करते रहे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. यही कारण है कि ज़मीन, पानी, अवैध आप्रवासन और सीमा सुरक्षा जैसे दशकों पुराने मुद्दे अभी तक सुलझ नहीं पाए हैं. उसी तरह बांग्लादेश भारत के बाज़ारों में खास तौर पर व्यापक रूप में निर्यात-योग्य अपने कपड़ों के उत्पादों की पहुँच बनाने में भी सफल नहीं हो पाया है.
अक्षय मंगला
30/01/2017
8 नवंबर, 2016 को टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी घोषणा की, जिससे सभी स्तब्ध रह गए. इसी दिन मध्यरात्रि से ₹500 और ₹1,000 के मूल्य-वर्ग के नोट अवैध हो जाएँगे. इस समय जो नकदी प्रचलन में है, वह एक अनुमान के अनुसार कुल नकदी का लगभग 86 प्रतिशत (₹15 ट्रिलियन) है. ऐसे अवैध नोट रखने वालों से कहा गया है कि वे 30 दिसंबर, 2016 तक बैंक में विमुद्रीकृत नोटों का विनिमय कर लें या उन्हें बैंक में जमा करा दें. इस विध्वंसकारी नीति को अपनाने का घोषित कारण यही बताया गया है कि इससे “काले धन” पर रोक लगायी जा सकेगी. “काले धन” का मतलब है, ऐसा धन जो अघोषित स्रोतों से अर्जित किया गया हो. साथ ही एक घोषित कारण यह भी बताया गया कि इससे आपराधिक और आतंकवादी
जोहान चाको
16/01/2017
फ़रवरी 2014 में आईबी के भूतपूर्व प्रमुख अजित दोवाल ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पदभार ग्रहण करने से कुछ समय पहले ही अपने लंबे सार्वजनिक बयान के माध्यम से एक बड़े नीतिगत परिवर्तन की घोषणा की थी. भारत में अलगाववादी और उग्रवादी गुटों को पाकिस्तान से मिलने वाली मदद को उन्होंने एक रणनीतिक चुनौती के रूप में घोषित किया था और उसका मुकाबले करने के लिए उससे कहीं बड़े ठोस प्रतिरोध की बात भी कही थी. इसी घोषणा में बलोचिस्तान को अलग करने की बात भी शामिल थी. हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने भी दावा किया था कि “विश्व एक स्वर से पाकिस्तान के संबंध में भारत की नीति का समर्थन करने लगा है” और भारत से यह माँग भी करने लगा है कि “भारत वैश्विक स्तर पर
नीलांजन सरकार
02/01/2017
30 दिसंबर, 2016 को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने अपने ही बेटे अखिलेश यादव को पार्टी से निष्कासित कर दिया. सिर्फ़ एक दिन के बाद ही निष्कासन आदेश को वापस ले लिया गया और अखिलेश यादव को फिर से अपने पद पर बहाल कर दिया गया. उत्तर प्रदेश (यूपी) के करिश्माई नेता अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत करना शुरू कर दिया था. यही बात कुछ हद तक पार्टी के बुजुर्ग नेताओं और उनके परिवार के सदस्यों को चुभ गई. चुनाव आयोग यूपी में चुनाव की तारीखों की घोषणा करने वाला है. समाजवादी पार्टी के पास अपनी पार्टी में गुटबाज़ी को खत्म करने के लिए बहुत कम समय बाकी है. इसलिए यह समय उनके लिए बहुत कीमती है. किसी को नहीं मालूम कि कल क्या होगा ? स्वाभाविक है कि दैनिक समाचार
अविनाश पालिवाल
19/12/2016
भारत-अफ़गानिस्तान के संबंधों की पूरी ताकत का प्रदर्शन 4 दिसंबर, 2016 को अमृतसर में आयोजित छठे हार्ट ऑफ़ एशिया के सम्मेलन में हुआ था. अफ़गान केंद्रित हक्कानी नैटवर्क से संबद्ध “आंतकवादियों” को और भारत केंद्रित लश्कर-ए-ताइबा और जैश-ए-मोहम्मद को “सुरक्षित पनाह” देने के लिए पाकिस्तान की आलोचना करते हुए नई दिल्ली और काबुल ने इस मंच का इस्तेमाल इस्लामाबाद को अलग-थलग करने और नीचा दिखाने के लिए सफलतापूर्वक किया. दोनों देशों ने एयर कार्गो के लिए एक ऐसे कॉरिडोर के बारे में भी चर्चा की, जिसमें पाकिस्तान को बाईपास किया जा सके, क्योंकि अफ़गानिस्तान को उनके देश से भारतीय बाज़ारों में और भारतीय बाज़ारों से उनके देश में आवाजाही का रास्ता अभी तक खुल नहीं पाया है.
नरेन करुणाकरन
05/12/2016

अमरीकियों के पास लगभग 28 मिलियन छोटे कारोबार हैं. इनमें से 8 मिलियन कारोबार अल्पसंख्यकों के पास हैं और अल्पसंख्यकों के इन कारोबारों से उत्पन्न 64 प्रतिशत नई नौकरियाँ ऐसी हैं, जिनकी शुरुआत 1993 और 2011 के बीच हुई थी. लगभग आधे अमरीकी कामगार इन नौकरियों पर ही लगे हुए हैं. राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की कामयाबी इन्हीं छोटे कारोबारों के कार्य-परिणामों पर ही निर्भर करती है. यह बात तो निःसंकोच मानी जा सकती है कि कई दशकों से सतत चलने वाले सप्लायर डाइवर्सिटी ईको सिस्टम में न तो कोई कटौती हो सकती है और न ही उसके विशेष दर्जे को कोई आघात पहुँच सकता है.