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संक्रमण के दौर में भारत (India in Transition)

पवित्र सूर्यनारायण
15/08/2016

भारतीय राजनीति के अंतर्गत राजनैतिक व्यवहार में वर्गीय पहचान पर बहुत जोर दिया गया है. फिर भी भारत एक ऐसा देश है जिसमें व्यक्तियों की भाषा, धर्म और (सवर्ण जाति, पिछड़ी जाति और अनुसूचित जातियों के नाम से) राजनैतिक छत्र के अंतर्गत समाहित जातियों और ‘बिरादरी’ या ‘जाति’ के रूप में बेहद स्थानीकृत उप-जातियों/ रिश्तेदारों के वर्गों के अंतर्गत भी अनेक वर्गीय पहचानें हैं. यदि व्यक्तियों की इतनी अधिक पहचानें हैं तो चुनाव के समय मतदाताओं के लिए किस पहचान का सबसे अधिक महत्व है और क्यों ?   

ऐडम ज़िएगफ़ैल्ड
01/08/2016
2015 के उत्तरार्ध में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य बिहार में एक विचित्र बात हुई. राज्य के विधान सभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को किसी अन्य पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक वोट मिले. इसके बावजूद भाजपा विधान सभा में तीसरी सबसे पार्टी के रूप में ही उभरकर सामने आई. भारत जैसे देश में, जहाँ प्रथम-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली का लाभ आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को ही मिलता है, तो फिर यह कैसे संभव हुआ कि सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी चुनाव हार गई ? इसका उत्तर चुनाव-पूर्व गठबंधन में निहित है, जब दो या अधिक राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे के खिलाफ़ अपने
अमित आहुजा
18/07/2016

आँकड़ों के अनुसार केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं. इससे अक्सर मोटे तौर पर यही निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि वैवाहिक संबंधों का आधार जातिगत है. परंपरागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है. यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की खातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है, लेकिन भारत के शहरी मध्यम वर्ग में युवा लोग शादी के लिए अपने जीवन साथी की तलाश अपनी जाति तक ही सीमित नहीं रखते.

मेखला कृष्णमूर्ति
05/07/2016

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

अजय शुक्ला
20/06/2016
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की
गैब्रिएल क्रक्स-विसनर
06/06/2016

उस बात को लगभग पच्चीस साल हो गए जब विकेंद्रीकरण पर विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग भारत में शुरू हुआ था. संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार 200,000से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई, उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं का दायित्व सौंपा गया और ऐतिहासिक रूप से वंचितमहिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. बहुत से लोग मानते हैं कि ये पंचायतें लोकतांत्रिक और नौकरशाही के जाल में फँसे कागज़ी शेर हैं. यही कारण है कि नागरिकों से भी उनकी यहीअपेक्षा है कि इन पंचायतों की अनदेखी की जाए.

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सुमति चंद्रशेखरन और स्मृति परशीरा
23/05/2016

दिसंबर, 2015 में भारत सरकार ने अपने नये मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को सार्वजनिक कर दिया. यह व्यक्तिगत स्तर पर किये गये समझौते के करार का एक टैम्पलेट है, जिसके माध्यम से किसी एक देश की किसी फ़र्म द्वारा दूसरे देश की फ़र्म में किये गये निजी निवेश को शासित किया जाता है.

सामंत सुब्रमणियन
09/05/2016

अप्रैल के मध्य में नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक एच.वाई.शारदा प्रसाद स्मारक व्याख्यानमाला के अंतर्गत इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक व्याख्यान दिया था, जिसका विषय था, “ऐतिहासिक जीवनी की कला और शिल्प”.  गुहा ने अपने व्याख्यान में विस्तार से इस प्रकार के लेखन के मूल्य को रेखांकित करते हुए अच्छी जीवनी की विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला था. साथ ही उन्होंने एक सवाल भी उठाया था, जो उनके लेखन में भी उभरकर सामने आता है. खास तौर पर  द लिबरल ऐंड अदर एस्सेज़के अंतिम अध्याय में आपने इसका उल्लेख किया है.

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सुप्रिया रॉय चौधुरी और शशांक श्रीनिवास
25/04/2016
भारत अन्य उदीयमान शक्तियों से साथ वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाने में जुटा हुआ है और इसके लिए ज़रूरी है कि वह भारी मात्रा में बिजली की पूर्ति की प्रतिस्पर्धा में प्रभावी रूप में भाग ले. यह तभी संभव हो सकता है
फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस
11/04/2016

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.