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संक्रमण के दौर में भारत (India in Transition)

प्रीति मान
08/09/2014

भारत में हाल ही में हुए चुनाव पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैकल्पिक राजनीति के बीज बोये जा चुके हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि मीडिया के जबर्दस्त समर्थन और दिल्ली में अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बावजूद आम आदमी पार्टी के खाते में लोकसभा की केवल चार सीटें ही आईं? मेवात के चश्मे से चुनावों के समाजशास्त्र को समझने की इस कोशिश में इसका एक पहलू उजागर हुआ है.  मेवात पर केंद्रित होते हुए भी ज़रूरी नहीं है कि ये निष्कर्ष इसी क्षेत्र तक ही सीमित हों.

अनुराग मेहरा
25/08/2014

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटीज़) की स्थापना लगभग पाँच दशक पूर्व विज्ञान पर आधारित विकास के प्रति पं. नेहरू की गहरी निष्ठा से प्रेरित नये भारत को पुनर्जीवित करने के लिए उसे प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी. इन संस्थानों ने भारत को प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान किया या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, क्योंकि यहाँ के अधिकांश (अंडर) ग्रैजुएटया तो विदेश चले गए या फिर उन्होंने गैर-तकनीकी कैरियर अपना लिया.

अर्न्ट मिचाएल
11/08/2014

पिछले कुछ वर्षों में जिस परिमाण में उप-सहारा अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में भारी वृद्धि हुई है वह अपने-आप में ही इस बात का प्रमाण है कि उप-सहारा अफ्रीका भारत की नई धुरी है; भारत और उप-सहारा अफ्रीका के बीच सन् 2012 में व्यापार $60 बिलियन डॉलर का हो गया. उसी वर्ष अन्य देशों (योरोपीय संघ ($567.2 बिलियन डॉलर), अमरीका ($446.7 बिलियन डॉलर) और चीन ($220 बिलियन डॉलर) के साथ व्यापार में उल्लेखनीय कमी हुई.

माइकल कोलिन्स
28/07/2014

दो माह पूर्व भारत में इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक घटना संपन्न हुई थी. 2014 का आम चुनाव पाँच सप्ताह की अवधि में नौ चरणों में संपन्न हुआ था, जिसमें 16 वीं लोकसभा के लिए 553.8 मिलियन मतदाताओं ने वोट डाले थे. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय सुर्खियों में बनी रही और चुनाव पर हुए भारी खर्च के मामले से लोगों का ध्यान हट गया. एक अनुमान के अनुसार इस चुनाव में $5 बिलियन डॉलर का खर्च आया, जिसमें से $600 मिलियन डॉलर का खर्च तो सरकारी राजकोष से ही हुआ. हाल का यह चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महँगा चुनाव साबित हुआ. 

समीर लालवानी
14/07/2014

अपने चुनावी अभियान के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ़ खूब जुबानी जंग की थी और नक्सलवाद को कतई बर्दाश्त न करने की रणनीति का ऐलान भी किया था और कुछ लोग तो प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से यह उम्मीद लगाये बैठे थे कि वर्तमान रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इस समस्या को सतही तरीके से हल करने की कोशिश की है उससे इन लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

मैगन रीड
30/06/2014

कुछ आप्रवासी लेखकों के अनुमान के अनुसार भारत में मौसमी आप्रवासी मज़दूरों की संख्या 100 मिलियन तक भी हो सकती है. आप्रवासी मज़दूरों को न तो सामाजिक सेवाएँ मिलती हैं और न ही ये लोग शहरी इलाकों में स्थायी तौर पर बस सकते हैं. ऐसे हालात में ये आप्रवासी मज़दूर खास तौर पर खेती-बाड़ी के मौसम में गाँवों में ही रहना पसंद करते हैं. इसके फलस्वरूप वे अपनी मज़दूरी के लिए अपने गाँवों और मज़दूरी के ठिकानों के बीच ही भटकते रहते हैं और पूरे साल के दौरान अधिक से अधिक समय घर के बाहर ही गुज़ारते हैं.

नीलांजन सरकार
16/06/2014

 

2014 के आम चुनाव का अगर शव-परीक्षण किया जाए तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि भाजपा ने इस चुनावी मुकाबले में 282 (अर्थात् 52 प्रतिशत) सीटें जीती हैं और उनका वोट शेयर मात्र 31 प्रतिशत रहा है. यदि इस चुनाव से सन् 2009 के चुनाव की तुलना की जाए हो हम पाएँगे कि उस समय कांग्रेस ने उस चुनावी मुकाबले में  206 अर्थात् 38 प्रतिशत सीटें जीती थीं और उनका वोट शेयर मात्र 29 प्रतिशत रहा था. समान वोट शेयर के बावजूद जीती गई सीटों की संख्या में इतना अधिक अंतर क्यों है? इससे क्या अर्थ निकलता है?

रुद्र चौधुरी
02/06/2014

नरेंद्र मोदी को मिले भारी और अभूतपूर्व जनादेश ने सभी विशेषज्ञों और प्रवक्ताओं को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि भारत का अनुग्रह पाने के लिए अमरीका और क्या-क्या कर सकता है. जहाँ कुछ लोग यह मानते हैं कि ओबामा प्रशासन को पहले से ही मोदी के अनुरूप आवश्यक सुधार कर लेने चाहिए अर्थात् “मोदीकरण” (मॉडिफ़ाई) कर लेना चाहिए और कुछ लोग मानते हैं कि खेल के नियमों को बदल लेना चाहिए और “भारत के साथ नये संबंधों”  की शुरुआत करनी चाहिए. अधिकतर उदाहरणों को सामने रखकर यही बात समझ में आती है कि हमें अपना ध्यान निकट भविष्य पर केंद्रित करना चाहिए और यह बात तर्कसंगत भी है.

निकोलस ब्लेरल
19/05/2014

फ़रवरी, 2014 में भारत ने एक ही सप्ताह में सउदी अरब के युवराज अब्दुल्ला अज़ीज़ अल सउद और ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ की मेज़बानी करके एक अनूठा जबर्दस्त राजनयिक दुस्साहस किया है. इन दौरों के समय को मात्र संयोग नहीं माना जा सकता; पिछले दो दशकों से भारत इज़राइल, फिलिस्तीन, ईरान और सउदी अरब जैसे मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों के साथ बड़ी ही कुशलता से संबंधों का निर्वाह करता रहा है. कुछ लोग इस संतुलनकारी कदम को इस क्षेत्र के लिए एक नये और व्यापक दृष्टिकोण के संकेत की तरह भारत की “ मध्य पूर्व की ओर देखने” की नीति के तहत देखते हैं.