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विदेश नीति और सुरक्षा

रूसी हस्तक्षेपवाद पर प्रतिक्रियाएँ : हंगरी, 1956 और क्रीमिया, 2014 से उठे प्रश्न और भारत

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12/01/2015
स्वप्ना कोना नायुडु

सन् 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद भारत में रूसी हितों की वृद्धि होती रही है. सन् 1955 में ही ख्रुश्चेव और बुल्गानिन ने तीसरी वैश्विक नीति की शुरुआत की जिसके कारण ये दोनों नेता भारत आए और नेहरू भी मास्को पहुँचे. इसी वर्ष में एशियाई और अफ्रीकी देशों का इंडोनेशिया में बांडुंग सम्मेलन हुआ, जिसे रूसी समाचार पत्रों ने “इस युग की एक विशेष घटना”  बताया.  भारतीय पक्ष इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था कि स्टालिन के उत्तराधिकारियों ने उसके “भारत के धूमिल चित्र” को नकार दिया है. शीत युद्ध के दौरान, इन संबंधों में गिरावट आने के बजाय निरंतरता ही बनी रही.

दक्षिण एशिया और उसके पार क्षेत्रीय सहयोग का मूल्यांकन

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09/03/2015
ऐर्न्ट माइकल

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रमुख अध्यक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था. यह एक ऐसा महत्वपू्र्ण संकेत हो सकता था जिससे कि दक्षिण एशिया में खास तौर पर द्विपक्षीय स्तर पर क्षेत्रीय सहयोग की नई शुरूआत हो सके. सन् 1985 से भारत ने चार क्षेत्रीय पहल करने में संस्थापक सदस्य की भूमिका का निर्वाह किया था, लेकिन इनमें से किसी भी पहल का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.

एशिया में महाशक्ति के रूप में भारत का उदय

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20/04/2015
मंजीत एस. परदेसी

सिंगापुर के रक्षामंत्री नग इंग हेनने पिछले महीने दिये गये अपने एक बयान में यह इच्छा व्यक्त की थी कि भारत को दक्षिण चीन सागर में एक बड़ी भूमिका अदा करनी चाहिए. हाल ही के वर्षों में इसी तरह के बयान विएतनाम और फिलीपींस के नेताओं ने भी दिये हैं. दक्षिण पूर्वेशिया के नेताओं द्वारा उस क्षेत्र के सुरक्षा मामलों में भारत की भागीदारी के लिए उसे दिये गये निमंत्रणका मतलब है दक्षिण पूर्वेशिया में महाशक्ति के रूप में भारत का उदय और फिर एशिया में महाशक्ति के रूप में भारत का उदय.

भारत में विशेष बलों का पुनर्गठन

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04/05/2015
इस्कैंडर रहमान

पिछले दशक के दौरान आधुनिक सैन्य शक्ति के लगातार बढ़ते हुए और बहुत ही महत्वपूर्ण अंग के रूप में विशेष ऑपरेशन बलों (SOF) का उदय हुआ है. पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में खास तौर पर छोटे, चुने हुए और प्रच्छन्न ऑपरेटर इकाइयों का उदय बुरी तरह युद्ध में उलझे क्षेत्रों में अत्यंत  प्रभावी, कुशल और सुनिश्चित साधनों के रूप में शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है.

मध्य शक्तियों की अनुरूपताः भारत,फ्रांस और परमाणु टैक्नोलॉजी

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29/06/2015
जयिता सरकार
अप्रैल, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योरोपीय देशों में सबसे पहले फ्रांस का ही दौरा किया था. इससे पेरिस के साथ नई दिल्ली के बढ़ते रिश्तों का संकेत मिलता है. भारत ने रक्षा की खरीद के आधार को भी व्यापक बनाने का प्रयास किया और साथ ही शीत युद्ध की अधिकांश अवधि के दौरान समान बिंदुओं पर दोनों देशों की समान विचारधारा पर भी ज़ोर दिया. फ्रांस धीरे-धीरे सभी तीनों रणनीतिक (अर्थात् रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा) क्षेत्रों में भारत को दुर्जेय टैक्नोलॉजी की सप्लाई करने वाले देश के रूप में उभरकर सामने आया. यद्यपि पेरिस में उपमहाद्वीप में अमरीका के प्रभाव को कम करने या उसका स्थान लेने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, फिर भी नई