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विदेश नीति और सुरक्षा

दूसरे देशों का जनमत : विश्व मत और भारत की विदेश नीति

रोहन मुखर्जी

दूसरों की नज़र से अपने-आपको देखना आत्मनिरीक्षण के लिए बहुत ज़रूरी है. अगर हम इस बात का अध्ययन करते रहें कि दुनिया हमें किस नज़र से देखती है तो कोई भी देश अपनी विदेश नीति के मूल स्वर और प्रभाव के बारे में बहुत कुछ समझ सकता है. जनमत द्विपक्षीय संबंधों के मामले में प्रवृत्तियों को समझने के लिए विश्वसनीय संकेतक का काम करता है और विश्लेषक आम तौर पर किसी भी देश के आकर्षक बिंदुओं (सॉफ़्ट पावर) का आकलन दूसरे समाज की धारणाओं से करते हैं. इसलिए किसी भी देश की विदेशनीति की सफलता का अनुमान किसी और मानदंड से नहीं, बल्कि दूसरे देशों के जनमतके आधार पर अधिक बेहतरढंग से किया जा सकता है.

सेना (अनचाहे ही) संक्रमण के हालात में

अनित मुखर्जी

हाल ही में भारतीय सेना सभी गलत कारणों से समाचारों की सुर्खियों में बनी रही. जनरल वी.के.सिंह के विवादग्रस्त कार्यकाल, अफ़सरों और उनके मातहत कर्मचारियों के बीच झड़पों की खबरों, भ्रष्टाचार के आरोपों और नियंत्रण रेखा पर सैनिक कार्रवाई के दौरान सोते हुए सैनिकों के किस्सों ने मीडिया का ध्यान खींचा तो ज़रूर, लेकिन किसी ने इसे पसंद नहीं किया. दिलचस्प बात तो यह है कि प्रधानमंत्री ने इन सभी मुद्दों में से सिर्फ़ एक मुद्दे को ही उजागर करना ठीक समझा और वह मुद्दा था अफ़सरों और उनके मातहत कर्मचारियों के बीच के संबंधों का.

कच्चे तेल का भारत का राजा अफ्रीका में तेल के क्षेत्र में निवेश करके फँसा

ल्यूक पैटे

पिछले दिसंबर में दक्षिणी सूडान में संघर्ष शुरू हो जाने के कारण हाल ही में नवोदित देश में भारत के मल्टी-बिलियन डॉलर की तेल परियोजना बंद हो गयी. अस्थिरता के कारण भारतीय राजनयिकों ने नुक्सान से बचने की कोशिशें शुरू कर दीं, क्योंकि भारत की राष्ट्रीय तेल कंपनी की अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) के लिए आवश्यक था कि वह उस क्षेत्र से अपने कर्मचारियों को बाहर निकाले. वैश्विक तेल संसाधनों को हासिल करने में चीन को अक्सर भारत का सबसे बड़ा प्रतियोगी माना जाता है.

भारत में मध्य पूर्व की नीतियों की निरंतरता और परिवर्तन

निकोलस ब्लेरल

फ़रवरी, 2014 में भारत ने एक ही सप्ताह में सउदी अरब के युवराज अब्दुल्ला अज़ीज़ अल सउद और ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ की मेज़बानी करके एक अनूठा जबर्दस्त राजनयिक दुस्साहस किया है. इन दौरों के समय को मात्र संयोग नहीं माना जा सकता; पिछले दो दशकों से भारत इज़राइल, फिलिस्तीन, ईरान और सउदी अरब जैसे मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों के साथ बड़ी ही कुशलता से संबंधों का निर्वाह करता रहा है. कुछ लोग इस संतुलनकारी कदम को इस क्षेत्र के लिए एक नये और व्यापक दृष्टिकोण के संकेत की तरह भारत की “ मध्य पूर्व की ओर देखने” की नीति के तहत देखते हैं.

तात्कालिकता के पारः 21 वीं सदी में भारत और अमरीका

रुद्र चौधुरी

नरेंद्र मोदी को मिले भारी और अभूतपूर्व जनादेश ने सभी विशेषज्ञों और प्रवक्ताओं को यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि भारत का अनुग्रह पाने के लिए अमरीका और क्या-क्या कर सकता है. जहाँ कुछ लोग यह मानते हैं कि ओबामा प्रशासन को पहले से ही मोदी के अनुरूप आवश्यक सुधार कर लेने चाहिए अर्थात् “मोदीकरण” (मॉडिफ़ाई) कर लेना चाहिए और कुछ लोग मानते हैं कि खेल के नियमों को बदल लेना चाहिए और “भारत के साथ नये संबंधों”  की शुरुआत करनी चाहिए. अधिकतर उदाहरणों को सामने रखकर यही बात समझ में आती है कि हमें अपना ध्यान निकट भविष्य पर केंद्रित करना चाहिए और यह बात तर्कसंगत भी है.

अफ्रीका पर केंद्रितः भारत की गतिविधियों का उभरता केंद्र उप-सहारा अफ्रीका

अर्न्ट मिचाएल

पिछले कुछ वर्षों में जिस परिमाण में उप-सहारा अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में भारी वृद्धि हुई है वह अपने-आप में ही इस बात का प्रमाण है कि उप-सहारा अफ्रीका भारत की नई धुरी है; भारत और उप-सहारा अफ्रीका के बीच सन् 2012 में व्यापार $60 बिलियन डॉलर का हो गया. उसी वर्ष अन्य देशों (योरोपीय संघ ($567.2 बिलियन डॉलर), अमरीका ($446.7 बिलियन डॉलर) और चीन ($220 बिलियन डॉलर) के साथ व्यापार में उल्लेखनीय कमी हुई.

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के बारे में भारतीय नीति और स्थिति का विश्लेषण

ऋषिका चौहान

पिछले सप्ताह रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन और मीडिया को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “वैश्विक राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का चरित्र बदल रहा है, लेकिन इस रिश्ते का विशेष महत्व है और भारत की विदेश नीति में इसके विशिष्ट स्थान में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता.

रूसी हस्तक्षेपवाद पर प्रतिक्रियाएँ : हंगरी, 1956 और क्रीमिया, 2014 से उठे प्रश्न और भारत

स्वप्ना कोना नायुडु

सन् 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद भारत में रूसी हितों की वृद्धि होती रही है. सन् 1955 में ही ख्रुश्चेव और बुल्गानिन ने तीसरी वैश्विक नीति की शुरुआत की जिसके कारण ये दोनों नेता भारत आए और नेहरू भी मास्को पहुँचे. इसी वर्ष में एशियाई और अफ्रीकी देशों का इंडोनेशिया में बांडुंग सम्मेलन हुआ, जिसे रूसी समाचार पत्रों ने “इस युग की एक विशेष घटना”  बताया.  भारतीय पक्ष इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था कि स्टालिन के उत्तराधिकारियों ने उसके “भारत के धूमिल चित्र” को नकार दिया है. शीत युद्ध के दौरान, इन संबंधों में गिरावट आने के बजाय निरंतरता ही बनी रही.