Penn Calendar Penn A-Z School of Arts and Sciences University of Pennsylvania

समाज और संस्कृति

भारत प्रगति के पथ पर: दैनिक यात्रियों के ब्लैक बॉक्स की गुत्थी को सुलझाना

Author Image
20/10/2014
एस. चंद्रशेखर

पिछले कुछ दशकों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आने-जाने वाले दैनिक यात्रियों की संख्या में जबर्दस्त वृद्धि हुई है. इसमें छोटे-मोटे काम करने वाले कामगारों की सेवा का वह क्षेत्र भी शामिल है जिनके काम का कोई पक्का ठिकाना नहीं होता. ये लोग जोखिम उठाकर भी काम पर जाते हैं और यह मानते हैं कि आप्रवासन अब पुरानी बात हो गई है और दैनिक यात्रा उनके लिए खिलवाड़ बन गई है, लेकिन अब समय आ गया है कि ऐसे श्रमिक जो एक-से अधिक बार कहीं आते-जाते हैं, आप्रवासन-केंद्रिक हो गए हैं.ऐसे आप्रवासियों में दैनिक यात्री भी शामिल हैं. 

स्किलिंग इंडिया के लिए डेटा सिस्टम का डिज़ाइन

Author Image
Author Image
Author Image
06/10/2014
स्टीफ़ैन बैंडर, जॉर्ज हीनिंग, कौशिक कृष्णन्

इस समय भारत में बेरोज़गारी की दर 9 प्रतिशत है. तथापि  बैचलर डिग्री वाले तीन नागरिकों में से कम से कम एक के पास कोई काम नहीं है. काम करने की उम्र वाली आबादी आज 750 मिलियन से अधिक है, जो सन् 2020 में बढ़कर लगभग एक बिलियन तो हो ही जाएगी. साथ ही कृषि रोज़गार भी घट रहा है. कुल रोज़गार में से कृषि रोज़गार 50 प्रतिशत से भी कम है. ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है. बाज़ार के इन्हीं दबावों के कारण श्रमिक वर्ग उच्च कौशल वाले काम-धंधों की ओर बढ़ रहा है. तथापि कॉलेज में शिक्षित भारतीय युवाओं के पास इन कामों के लिए अपेक्षित कौशल ही नहीं है.

भारत का ज्ञान शक्ति के रूप में रूपांतरण

Author Image
14/01/2013
प्रियंवदा नटराजन

विश्व के परिदृश्य पर सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के एक खिलाड़ी के रूप में भारत के उदय के कारण नयी आशाओं और आकांक्षाओं को बल मिला है. आर्थिक शक्ति होने के साथ-साथ अब भारत ज्ञान शक्ति के रूप में, नवोन्मेष और सृजनात्मक विचारों के केंद्र के रूप में भी उभरने लगा है. लेकिन यही हमारा अभीष्ट मार्ग और मंज़िल नहीं है. इसमें संदेह नहीं कि भारत के पास इस मंज़िल तक पहुँचने के साधन तो हैं, लेकिन जब तक बुनियादी संस्थागत परिवर्तन नहीं होते तब तक इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता.

भारत में पुलिस महिलाकर्मीः अभी मंज़िल दूर है

Author Image
02/01/2013
अंजना सिन्हा

इतिहास के प्रवाह में स्वाधीन भारत की महिलाएँ आगे तो आयी हैं, लेकिन पिछले पैंतीस वर्षों में ही उन्होंने वैश्वीकरण की उत्तर-औद्योगिक क्रांति और उसके बाद आयी सकारात्मक गतिविधियों को महसूस किया है. इन गतिविधियों के कारण घर में,कार्यस्थलों पर, अपने सहकर्मियों के साथ और आम तौर पर पूरे समाज में भी बुनियादी तौर पर बदलाव आया है. यह ठीक वैसा ही सामाजिक बदलाव था,जैसा कि साठ के दशकों में अमरीकी महिलाओं ने महसूस किया था.

भारत में इनडोर वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण

Author Image
28/01/2013
अविनाश किशोर

इनडोर अर्थात् घर के अंदर होने वाले वायु प्रदूषण का सेहत पर पड़ने वाले भारी नकारात्मक दुष्परिणामों के बावजूद दुनिया के लगभग पचास प्रतिशत घरों के लोग खाना पकाने के लिए ठोस जैवपिंड का ईंधन ही इस्तेमाल करते हैं. भारत में हालात और भी खराब हैं, जहाँ 83 प्रतिशत ग्रामीण घरों के लोग और लगभग 20 प्रतिशत शहरी घरों के लोग अभी-भी खाना बनाने के प्राथमिक ऊर्जा स्रोत के रूप में लकड़ी या गोबर का इस्तेमाल करते है. एक अनुमान के अनुसार परंपरागत चूल्हे में इस प्रकार की बिना प्रोसेस की हुई जैवपिंड की ऊर्जा को जलाने से लगभग आधे मिलियन लोग हर साल अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं.

मोर्चेबंद संप्रभुताः भारत,संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवतावादी हस्तक्षेप

Author Image
11/02/2013
रोहन मुखर्जी

31 दिसंबर, 2012 को भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाये रखने के लिए विश्व की प्रमुखतम बहुपक्षीय संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना सातवाँ दोवर्षीय अस्थायी सदस्यता  का कार्यकाल पूरा किया है. आरंभ में कई विश्लेषकों ने इस अवधि को दिल्ली द्वारा वांछित और संभावित स्थायी सीट के लिए एक “प्रयोग” माना था.

भारत आईसीटी के वैश्विक खेल में

ऐन्ड्रू बी. कैनेडी

यदि वैश्वीकरण एक खेल है तो लगता है कि भारत इसके विजेताओं में से एक विजेता हो सकता है.  पिछले दशक में भारत के आर्थिक विकास की दर का रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा है और इसने तेज़ी से आगे बढ़ते हुए हाई टैक सैक्टर में प्रवेश पा लिया है. यह संक्रमण जितना आईसीटी (सूचना व संचार प्रौद्योगिकी) में स्पष्ट दिखायी देता है, उतना किसी और सैक्टर में दिखायी नहीं देता. जहाँ चीन ने आईसीटी हार्डवेयर के क्षेत्र में अपना मुकाम हासिल किया है, वहीं भारत ने सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में अपनी शक्ति का लोहा मनवा लिया है.

शब्द अभी-भी क्यों गाते हैं

Author Image
08/04/2013
अविजीत घोष

पिछले महीने जब सन् 2012 में चिटगौंग फ़िल्म के गीत “बोलो न ”  को सर्वश्रेष्ठ गीत का पुरस्कार मिला तो जिन संगीत प्रेमियों ने यह गाना सुना भी नहीं था, उन्होंने भी इंटरनैट पर इसे सुनने के लिए तुरंत लॉग ऑन कर लिया. प्रसून जोशी द्वारा रचे गये इस गीत में वसंत के आगमन पर जल्द ही खिलने वाली बंद कलियों के लजीले प्यार का वर्णन किया गया है. इसके बोल हैं:  बोलो न , बोलो न //ऋतुओं को घर से निकलने तो दो // बोये थे मौसम खिलने तो दो //होठों की मुंडेर पर रुकी // मोतियों सी बात बोल दो // फीकी-फीकी सी है ज़िंदगी //चीनी-चीनी ख्वाब घोल दो //.

स्वतंत्र न्यायपालिका,हितधारक समूह और नियमों का औचित्य

Author Image
22/04/2013
श्रुति राजगोपालन

आज भारत में सार्वजनिक हित के मामलों को तभी महत्व मिलता है जब उच्चतम न्यायालय इस पर ज़ोर डालता है. सामान्य और विशेष दोनों ही प्रकार के हितधारकों के प्रतिनिधि न्यायपालिका में सक्रिय होकर याचिका दाखिल करते हैं. किसी भी विषय पर होने वाले वाद-विवाद से भारतीय न्यायपालिका को महत्व मिलता है और वह सक्रिय भी बनी रहती है. एक ऐसे युग में जहाँ अधिकांश संस्थाओं पर राजनीति हावी होने लगी है, न्यायपालिका ही एकमात्र संस्था बची है जिस पर नागरिकों का विश्वास अभी भी कायम है और उन्हें लगता है कि वहाँ उनकी सुनवाई ठीक तरह से हो सकती है.

भारत में चुनावः मतदाताओं की गलतियाँ

Author Image
17/06/2013
मिलन वैष्णव

पहचान की राजनीति करना भारत के मानवीय संवाद के अधिकांश विश्लेषण का सबसे अधिक उपयोगी काम रह गया है. कई दशकों तक तो जाति और समुदाय की खाई को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाता था, क्योंकि इसीसे सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिशीलता के  स्वरूप को आकार मिलता था. जिस हद तक लोग व्यक्तिगत स्तर पर हिंसक गतिविधियों में संलग्न  होते हैं, सामूहिक तौर पर हिंसक हो जाते हैं, सार्वजनिक हितकारी कामों को सफलता से पूरा करते हैं या चुनाव के दिन निर्णय लेते हैं – सभी कुछ जातीय पहचान के दायरे में देखा जाता है.