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समाज और संस्कृति

भारत में सिविल सैक्टर और ड्रोन

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19/10/2015
शशांक श्रीनिवासन

मानव-रहित हवाई वाहनों की मदद से कुछ ऐसे रोबोट उड़ाये जा रहे हैं जिनसे मानव-सहित उड़ानों के कुछ लाभ तो मिलते हैं लेकिन, इनमें न तो कोई जोखिम उठाना पड़ता है और न ही किसी प्रकार की परेशानी नहीं झेलनी पड़ती है. ड्रोन नाम से प्रचलित ये रोबोट पिछले दो दशकों से इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान में हुई प्रगति के कारण काफ़ी चर्चा में आ गए हैं. सन् 1973 में योम कुप्पूर में और सन् 1982 में लेबनान के युद्ध में जब से इनकी क्षमता प्रमाणित हुई है, कई सैन्यबलों ने इनकी मदद से निगरानी का काम शुरू कर दिया है और ड्रोन का उपयोग हथियार के रूप में भी किया जाने लगा है.

सामाजिक पदक्रम में हैसियत, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य और देश का विकास

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05/10/2015
डियाने कॉफ़े
स्वस्थ माताएँ स्वस्थ बच्चों को जन्म देती हैं और ये बच्चे ही बड़े होकर उपयोगी काम करते हैं| इसके विपरीत जो महिलाएँ गर्भावस्था की शुरुआत में ही बहुत दुबली-पतली रहती हैं और गर्भावस्था के दौरान भी जिनका वजन जितना बढ़ना चाहिए उतना नहीं बढ़ता, उनके नवजात बच्चों का वजन भी कम रहने की सम्भावना बनी रहती है| जन्म के समय बच्चों का कम वजन का होना नवजात बच्चों की मृत्यु, जो कि जन्म के एक महीने के अन्दर होती है, की एक मुख्या वजह है| नवजात शिशु मृत्यु-दर भारत में कुल शिशु मृत्यु दर का 70

भारतीय उपन्यास इतिहास के एजेंट

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07/09/2015
चंद्रहास चौधरी

यह एक सार्वभौमिक रूप में स्वीकृत सत्य है कि मानव अपने जीवन को काल में नहीं, बल्कि इतिहास में धड़कते हुए अनुभव करता है. इतिहास की व्याख्या के लिए अनेक विधाओं का उपयोग किया जाता है : व्यक्तिगत अनुभव और सांस्कृतिक संस्मरण, राजनैतिक विचारधारा और इतिहासलेखन और कभी-कभी तो खास तौर पर मिथक और कथा-कहानियाँ भी. इन्हीं विधाओं में केवल 150 वर्ष पुरानी विधा है, उपन्यास. यह विधा भारत में कुछ देरी से आई.

स्मार्ट सिटीः भारत का शहरी भविष्य

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24/08/2015
शाहाना चट्टराज

गत जून में भारत सरकार ने एक बेहद महत्वाकांक्षी और भविष्योमुखी कार्यक्रम की शुरुआत की थी. यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी के विकास एजेंडा का केंद्रीय मुद्दा है. स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत नये अधुनातन शहरों के निर्माण और पुराने शहरों के आधुनिकीकरण का काम शामिल होगा. इस मिशन को लेकर पत्र-पत्रिकाओं में खूब लिखा गया है और इससे लोगों ने भारी उम्मीदें भी लगा रखी हैं. भारत का तेज़ी से अंधाधुंध शहरीकरण हो रहा है और उम्मीद है कि अगले तीन दशकों में चार सौ मिलियन निवासी शहरी आबादी में शामिल हो जाएँगे.

भारत प्रगति के पथ पर: दैनिक यात्रियों के ब्लैक बॉक्स की गुत्थी को सुलझाना

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20/10/2014
एस. चंद्रशेखर

पिछले कुछ दशकों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आने-जाने वाले दैनिक यात्रियों की संख्या में जबर्दस्त वृद्धि हुई है. इसमें छोटे-मोटे काम करने वाले कामगारों की सेवा का वह क्षेत्र भी शामिल है जिनके काम का कोई पक्का ठिकाना नहीं होता. ये लोग जोखिम उठाकर भी काम पर जाते हैं और यह मानते हैं कि आप्रवासन अब पुरानी बात हो गई है और दैनिक यात्रा उनके लिए खिलवाड़ बन गई है, लेकिन अब समय आ गया है कि ऐसे श्रमिक जो एक-से अधिक बार कहीं आते-जाते हैं, आप्रवासन-केंद्रिक हो गए हैं.ऐसे आप्रवासियों में दैनिक यात्री भी शामिल हैं. 

स्किलिंग इंडिया के लिए डेटा सिस्टम का डिज़ाइन

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06/10/2014
स्टीफ़ैन बैंडर, जॉर्ज हीनिंग, कौशिक कृष्णन्

इस समय भारत में बेरोज़गारी की दर 9 प्रतिशत है. तथापि  बैचलर डिग्री वाले तीन नागरिकों में से कम से कम एक के पास कोई काम नहीं है. काम करने की उम्र वाली आबादी आज 750 मिलियन से अधिक है, जो सन् 2020 में बढ़कर लगभग एक बिलियन तो हो ही जाएगी. साथ ही कृषि रोज़गार भी घट रहा है. कुल रोज़गार में से कृषि रोज़गार 50 प्रतिशत से भी कम है. ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है. बाज़ार के इन्हीं दबावों के कारण श्रमिक वर्ग उच्च कौशल वाले काम-धंधों की ओर बढ़ रहा है. तथापि कॉलेज में शिक्षित भारतीय युवाओं के पास इन कामों के लिए अपेक्षित कौशल ही नहीं है.

भारत का ज्ञान शक्ति के रूप में रूपांतरण

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14/01/2013
प्रियंवदा नटराजन

विश्व के परिदृश्य पर सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के एक खिलाड़ी के रूप में भारत के उदय के कारण नयी आशाओं और आकांक्षाओं को बल मिला है. आर्थिक शक्ति होने के साथ-साथ अब भारत ज्ञान शक्ति के रूप में, नवोन्मेष और सृजनात्मक विचारों के केंद्र के रूप में भी उभरने लगा है. लेकिन यही हमारा अभीष्ट मार्ग और मंज़िल नहीं है. इसमें संदेह नहीं कि भारत के पास इस मंज़िल तक पहुँचने के साधन तो हैं, लेकिन जब तक बुनियादी संस्थागत परिवर्तन नहीं होते तब तक इन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता.

भारत में पुलिस महिलाकर्मीः अभी मंज़िल दूर है

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02/01/2013
अंजना सिन्हा

इतिहास के प्रवाह में स्वाधीन भारत की महिलाएँ आगे तो आयी हैं, लेकिन पिछले पैंतीस वर्षों में ही उन्होंने वैश्वीकरण की उत्तर-औद्योगिक क्रांति और उसके बाद आयी सकारात्मक गतिविधियों को महसूस किया है. इन गतिविधियों के कारण घर में,कार्यस्थलों पर, अपने सहकर्मियों के साथ और आम तौर पर पूरे समाज में भी बुनियादी तौर पर बदलाव आया है. यह ठीक वैसा ही सामाजिक बदलाव था,जैसा कि साठ के दशकों में अमरीकी महिलाओं ने महसूस किया था.

भारत में इनडोर वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण

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28/01/2013
अविनाश किशोर

इनडोर अर्थात् घर के अंदर होने वाले वायु प्रदूषण का सेहत पर पड़ने वाले भारी नकारात्मक दुष्परिणामों के बावजूद दुनिया के लगभग पचास प्रतिशत घरों के लोग खाना पकाने के लिए ठोस जैवपिंड का ईंधन ही इस्तेमाल करते हैं. भारत में हालात और भी खराब हैं, जहाँ 83 प्रतिशत ग्रामीण घरों के लोग और लगभग 20 प्रतिशत शहरी घरों के लोग अभी-भी खाना बनाने के प्राथमिक ऊर्जा स्रोत के रूप में लकड़ी या गोबर का इस्तेमाल करते है. एक अनुमान के अनुसार परंपरागत चूल्हे में इस प्रकार की बिना प्रोसेस की हुई जैवपिंड की ऊर्जा को जलाने से लगभग आधे मिलियन लोग हर साल अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं.

मोर्चेबंद संप्रभुताः भारत,संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवतावादी हस्तक्षेप

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11/02/2013
रोहन मुखर्जी

31 दिसंबर, 2012 को भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाये रखने के लिए विश्व की प्रमुखतम बहुपक्षीय संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना सातवाँ दोवर्षीय अस्थायी सदस्यता  का कार्यकाल पूरा किया है. आरंभ में कई विश्लेषकों ने इस अवधि को दिल्ली द्वारा वांछित और संभावित स्थायी सीट के लिए एक “प्रयोग” माना था.