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समाज और संस्कृति

नक्सली चुनौती के विरुद्ध भारत की जवाबी कार्रवाई को समझना

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14/07/2014
समीर लालवानी

अपने चुनावी अभियान के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ़ खूब जुबानी जंग की थी और नक्सलवाद को कतई बर्दाश्त न करने की रणनीति का ऐलान भी किया था और कुछ लोग तो प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से यह उम्मीद लगाये बैठे थे कि वर्तमान रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इस समस्या को सतही तरीके से हल करने की कोशिश की है उससे इन लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

नकदी, उम्मीदवार और चुनावी अभियान

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28/07/2014
माइकल कोलिन्स

दो माह पूर्व भारत में इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक घटना संपन्न हुई थी. 2014 का आम चुनाव पाँच सप्ताह की अवधि में नौ चरणों में संपन्न हुआ था, जिसमें 16 वीं लोकसभा के लिए 553.8 मिलियन मतदाताओं ने वोट डाले थे. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय सुर्खियों में बनी रही और चुनाव पर हुए भारी खर्च के मामले से लोगों का ध्यान हट गया. एक अनुमान के अनुसार इस चुनाव में $5 बिलियन डॉलर का खर्च आया, जिसमें से $600 मिलियन डॉलर का खर्च तो सरकारी राजकोष से ही हुआ. हाल का यह चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महँगा चुनाव साबित हुआ. 

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटीज़) में अंडरग्रैजुएट शिक्षा पर पुनर्विचार

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25/08/2014
अनुराग मेहरा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटीज़) की स्थापना लगभग पाँच दशक पूर्व विज्ञान पर आधारित विकास के प्रति पं. नेहरू की गहरी निष्ठा से प्रेरित नये भारत को पुनर्जीवित करने के लिए उसे प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी. इन संस्थानों ने भारत को प्रौद्योगिकीय नेतृत्व प्रदान किया या नहीं, यह विवाद का विषय हो सकता है, क्योंकि यहाँ के अधिकांश (अंडर) ग्रैजुएटया तो विदेश चले गए या फिर उन्होंने गैर-तकनीकी कैरियर अपना लिया.

राजनैतिक मृग-मरीचिकाः मेवात के चश्मे से

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08/09/2014
प्रीति मान

भारत में हाल ही में हुए चुनाव पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैकल्पिक राजनीति के बीज बोये जा चुके हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि मीडिया के जबर्दस्त समर्थन और दिल्ली में अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बावजूद आम आदमी पार्टी के खाते में लोकसभा की केवल चार सीटें ही आईं? मेवात के चश्मे से चुनावों के समाजशास्त्र को समझने की इस कोशिश में इसका एक पहलू उजागर हुआ है.  मेवात पर केंद्रित होते हुए भी ज़रूरी नहीं है कि ये निष्कर्ष इसी क्षेत्र तक ही सीमित हों.

व्यक्तिगत हिंसा की दरारः कश्मीरी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास

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22/09/2014
राहुल पंडित

उत्तर भारतीय राज्य जम्मू व कश्मीर इस समय भयानक बाढ़ संकट से गुज़र रहा है. कश्मीरी घाटी में बाढ़ से हुई तबाही के कारण अनेक जानें गई हैं और बड़े पैमाने पर संपत्ति नष्ट हो गई है. हालाँकि कई संगठन और लोग बचाव और राहत कार्य में लगे हैं, लेकिन भारतीय सेना की भूमिका अब तक सबसे बड़े रक्षक की रही है. बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि कश्मीरी लोग अब भारतीय सेना को अलग नज़रिये से देखने लगे हैं.

हैसियत की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति

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17/11/2014
रोहन मुखर्जी

हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में पंकज मिश्र ने आधुनिक हिंदू भारतीय मानसिकता को “उत्पीड़न और अंधराष्ट्रीयता” के रंग भरकर दिखाने की कोशिश की है और यह तर्क दिया है कि “बहुत बड़े इलाके में फैले हुए और पूरी तरह से वैश्विक मध्यमवर्गीय हिंदू समुदाय के अनेक महत्वाकांक्षी सदस्य गोरे पश्चिमी लोगों की तुलना में ऊँची हैसियत की अपनी माँग को लेकर कुंठित महसूस करने लगे हैं.” मिश्र का यह विवादित बयान न केवल समकालीन राजनीति को समझने के लिए बहुत उपयुक्त है बल्कि इसमें भारतीय मानसिकता के उन तत्वों को भी उजागर किया गया है जो भारतीय मानस में रचे-बसे हैं.

नरेगाः पुनरुद्धार हो या खत्म हो ?

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29/12/2014
अभिरूप मुखोपाध्याय

क्या नरेगा पर संकट गहरा रहा है या यह मरणासन्न स्थिति में अंतिम साँसें गिन रहा है? वर्ष 2010-11 में इसका बजट 401बिलियन रुपये था, जो 2013-2014 में घटकर 330 बिलियन रुपये रह गया. हाल ही में कामगारों के लिए घोषित अधिक मज़दूरी के कारण नरेगा पर मामूली-सा असर पड़ा है. सरकारी अधिकारियों (और अनेक अर्थशास्त्रियों) को लगता है कि नरेगा में अब कामगारों की सामान्यतः रुचि नहीं रह गई है.

भारत में गैर-संचारी रोग (NCDs): वैश्विक स्तर पर इससे निपटना और घरेलू स्तर पर इसका निर्मूलन

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23/02/2015
कार्तिक नचियप्पन

राष्ट्रपति ओबामा ने हाल ही में अपनी भारत यात्रा के अंतिम दिन प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक रेडियो प्रसारण की रिकॉर्डिंग की थी. अपने इस रेडियो प्रसारण में ओबामा ने इच्छा व्यक्त की थी कि वह राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त करने के बाद भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर काम करना चाहेंगे. इस संदर्भ में उन्होंने मोटापे का खास तौर पर उल्लेख किया, क्योंकि यह एक ऐसी चुनौती है जो दुनिया-भर में तेज़ी से फैल रही है.

दक्षिण एशिया और उसके पार क्षेत्रीय सहयोग का मूल्यांकन

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09/03/2015
ऐर्न्ट माइकल

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के सभी प्रमुख अध्यक्षों को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था. यह एक ऐसा महत्वपू्र्ण संकेत हो सकता था जिससे कि दक्षिण एशिया में खास तौर पर द्विपक्षीय स्तर पर क्षेत्रीय सहयोग की नई शुरूआत हो सके. सन् 1985 से भारत ने चार क्षेत्रीय पहल करने में संस्थापक सदस्य की भूमिका का निर्वाह किया था, लेकिन इनमें से किसी भी पहल का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.

पाइप और झोपड़पट्टीः “गैर-कानूनी बस्तियों” के निवासियों के लिए मुंबई की नई प्रस्तावित जल योजना पर सोच-विचार

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23/03/2015
लीज़ा ब्रोकमैन

दो दशक पूर्व मुंबई में पाइप से सप्लाई होने वाले म्युनिसिपैलिटी के पानी की व्यवस्था संबंधी नियमों में नाटकीय परिवर्तन आया था. इस परिवर्तन के कारण ही शहर के लोकप्रिय पड़ोसी इलाकों और झोपड़पट्टी के निवासियों को म्युनिसिपल पानी की पात्रता दिलाने के लिए इन नियमों को झोपड़पट्टी पुनर्वास की आवासीय योजनाओं में शामिल कर लिया गया है. ढाँचागत योजना और सर्विस डिलीवरी के (कम से कम सिद्धांत रूप में तो ) स्थानिक और जलप्रेरित तर्कों के द्वारा पहले नियमित पानी की सप्लाई को झोपड़पट्टी पुनर्विकास योजना में पात्रता से जोड़ने के परिणाम भयावह हो चुके हैं.