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राजनीति

चीनी-भारतीय संबंधः दिल्ली की रोलर कोस्टर राइड

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20/05/2013
सी. मोहन राजा

यदि चीनी-भारतीय संबंधों का यही ऐतिहासिक क्रम बना रहता है तो जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में हाल ही में भारत-चीन के सैन्य संबंधों में आये गतिरोध के बाद भी द्विपक्षीय संबंधों में आसन्न कायाकल्प को लेकर जल्द ही भारी प्रचार होगा और यह भी चर्चा होगी कि इससे विश्व में कैसे बदलाव आएगा. भारत ने जब चीन को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि यथास्थिति बनाये रखने में असफल होने के परिणामस्वरूप द्विपक्षीय संबंधों पर भारी असर पड़ सकता है तो भारत के दावित क्षेत्र में चीनी सुरक्षा बलों द्वारा तीन सप्ताह तक जारी घुसपैठ मई के आरंभ में समाप्त हो गयी.

रणनीतिक संस्कृति के रूप में सरकारियत

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03/06/2013
अनित मुखर्जी

सन् 1992 में प्रायः उद्धृत किये जाने वाले एक निबंध में जॉर्ज टनहम ने निरंतर प्रचारित किंतु सत्य से परे एक भूराजनीतिक विचार को सामने रखा था कि भारतीयों में रणनीतिक संस्कृति का अभाव है. टनहम द्वारा आधुनिक भारत के सभी कूटनीतिज्ञों को एक साथ नकार देने से कुछ भारतीय विचारक बेहद नाराज़ हो गए थे जबकि कुछ लोगों ने उनके इस विचार को अविलंब स्वीकार कर लिया था. हाल ही की  एक कवर स्टोरी में ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ने महाशक्ति बनने की भारत की इच्छा के मार्ग में आने वाली अनेक चुनौतियों का विश्लेषण तो अच्छा किया है, लेकिन रणनीतिक संस्कृति की उसकी परिभाषा बौद्धिक रूप से लचर है.

भारत में चुनावः मतदाताओं की गलतियाँ

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17/06/2013
मिलन वैष्णव

पहचान की राजनीति करना भारत के मानवीय संवाद के अधिकांश विश्लेषण का सबसे अधिक उपयोगी काम रह गया है. कई दशकों तक तो जाति और समुदाय की खाई को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाता था, क्योंकि इसीसे सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिशीलता के  स्वरूप को आकार मिलता था. जिस हद तक लोग व्यक्तिगत स्तर पर हिंसक गतिविधियों में संलग्न  होते हैं, सामूहिक तौर पर हिंसक हो जाते हैं, सार्वजनिक हितकारी कामों को सफलता से पूरा करते हैं या चुनाव के दिन निर्णय लेते हैं – सभी कुछ जातीय पहचान के दायरे में देखा जाता है.

परमाणु संरक्षकों का संरक्षण

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15/07/2013
क्रिस्टोफ़र क्लैरी

सन् 1998 के परमाणु परीक्षण की पंद्रहवीं वर्षगाँठ को कुछ सप्ताह ही हुए हैं. सन् 1974 के भारत के “शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण” की चालीसवीं वर्षगाँठ को पूरा होने में साल भर से कम समय बचा है. भारत अपने परमाणु वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व का अनुभव करता है. अंतर्राष्ट्रीय  हुकूमत द्वारा प्रगति को धीमा करने के लिए किये गये प्रयासों को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और यहाँ तक कि नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने एकजुट होकर परमाणु ऊर्जा की भिन्न-भिन्न प्रकार की अवसंरचनाओं को निर्मित करने और परमाणु हथियारों को बनाने की क्षमता विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास किये हैं.

भारत के लोकतंत्र का कानून

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29/07/2013
माधव खोसला

सूक्ष्म लोकतांत्रिक आदर्शों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए, इसका निर्णय बहुत आसान नहीं है. कुछ व्यापक निर्णय संस्थागत होते हैं, जैसे कि देश को संसद की प्रणाली अपनानी चाहिए या नहीं; और कुछ निर्णय बहुत सूक्ष्म होते हैं- जैसे चुनावी ज़िलों को किस आधार पर गठित किया जाए, चुनावी भाषणों का नियमन कैसे किया जाए, आदि..आदि. लोकतांत्रिक आदर्श को विशिष्ट संस्थागत स्वरूप प्रदान करने से उसका प्रभाव मूलतः उसकी कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है और उस आदर्श को अपने-आपमें चुनौती भी दे सकता है.

बदलती धाराएँ:अंतर्राज्यीय नदियाँ और संबंध

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07/10/2013
श्रीनिवास चोक्ककुला

हाल ही में जल संसाधन मंत्रालय ने सन्2012 की जल नीति के राष्ट्रीय प्रारूप से संबंधित प्रस्ताव के अनुसरण में अंतर्राज्यीय नदियों के जल संबंधी विवादों के लिए एक स्थायी अधिकरण बनाने के लिए एक कैबिनेट नोट तैयार किया है.जहाँ तक रिपोर्ट का संबंध है, विवादों के निवारण में होने वाले विलंब और बार-बार होने वाले इन विवादों के निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय जाने की राज्यों की प्रवृत्ति से सरकार बहुत चिंतित है. न्यायनिर्णयन के लिए स्थायी गुंजाइश रखने का लाभ तो होगा, लेकिन यह काफ़ी नहीं होगा. यह एप्रोच गलत सूचनाओं पर आधारित है.

बाँध की राजनीतिः भारत, चीन और सीमा-पार नदी

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04/11/2013
रोहन डिसूज़ा

हाल ही के वर्षों में जब भी भारत और चीन के बीच शिखर-वार्ताएँ हुई हैं, जल-विवाद का मुद्दा मुखर होकर समझौता-वार्ताओं में छाया रहा है. सबसे अधिक उलझन वाला मुद्दा रहा है, भीषण और क्रोधी स्वभाव वाली सीमा-पार की नदी, येलुज़ंगबु-ब्रह्मपुत्र-जमुना (वाईबीजे) प्रणाली, जिसका अपना पूरा जलमार्ग तीन प्रभुता-संपन्न देशों (चीन, भारत और बांगला देश) से होकर गुज़रने के बाद ही खत्म होता है.

भारत में बाँटने वाली राजनीति और गुप्त मतदानः किसका क्या परिणाम होगा?

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13/01/2014
मार्क श्नाइडर

क्या राजनैतिक दलों और उनके स्थानीय एजेंटों की पहुँच सरकारी सेवाओं और सरकारी कल्याण योजनाओं से मिलने वाले लाभ तक हो पाती है और क्या वे जान पाते हैं कि मतदाता कैसे वोट डालते हैं और किसको वोट डाल सकते हैं ? यह राजनैतिक रणनीति, जिसे सामाजिक वैज्ञानिक ग्राहकवाद कहते हैं उन स्थानीय नेताओं पर किये गये भारी निवेश पर निर्भर करती है जो मतदाताओं के बारे में यह जानकारी जुटाते हैं कि दल विशेष के प्रति उनकी पसंद क्या है, उनके वोटों के और विकल्प क्या हो सकते हैं, उनके इरादे क्या हैं और साथ ही यह भी कि चुनाव के दौरान वे अपने दल के पक्ष में मतदाताओं को रिझाने के लिए कौन-से लोक-लुभावने काम कर सकते हैं?

भारत में आनुवंशिक राजनीति फल-फूल रही है, लेकिन असली नेता दूसरे मार्गों से शीर्ष पर पहुँच रहे हैं

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27/01/2014
पैट्रिक फ्रैंच

जो लोग यह मानते हैं कि भारतीय समाज आम तौर पर गुणतंत्र पर अधिकाधिक ज़ोर देने लगा है, उन्हें यह बात रास नहीं आती कि वंशवाद अभी-भी चुनावी राजनीति पर हावी है- लेकिन अब उनका प्रभाव इतना नहीं रह गया है, जितना कि पहली नज़र में दिखायी देता है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों ने शीर्ष पर पहुँचने का दूसरा रास्ता ढूँढ लिया हैः कई दलों के ऊपरी पायदान के प्रमुख नेताओं को वंशवाद का कोई लाभ नहीं मिलता और जल्द ही इस व्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की भी कोई संभावना नहीं है.