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राजनीति

कच्चे तेल का भारत का राजा अफ्रीका में तेल के क्षेत्र में निवेश करके फँसा

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24/03/2014
ल्यूक पैटे

पिछले दिसंबर में दक्षिणी सूडान में संघर्ष शुरू हो जाने के कारण हाल ही में नवोदित देश में भारत के मल्टी-बिलियन डॉलर की तेल परियोजना बंद हो गयी. अस्थिरता के कारण भारतीय राजनयिकों ने नुक्सान से बचने की कोशिशें शुरू कर दीं, क्योंकि भारत की राष्ट्रीय तेल कंपनी की अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) के लिए आवश्यक था कि वह उस क्षेत्र से अपने कर्मचारियों को बाहर निकाले. वैश्विक तेल संसाधनों को हासिल करने में चीन को अक्सर भारत का सबसे बड़ा प्रतियोगी माना जाता है.

मौन क्रांतिः भारत के गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का राजनैतिक तर्क

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07/04/2014
आदित्य दासगुप्ता

पिछले पंद्रह वर्षों में भारत में महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का एक तरह का अकारादि सूप तैयार होते देखा गया हैः ग्रामीण संपर्क योजना (PMGSY), सार्वभौमिक प्राथमिक स्कूलिंग पहल (SSA), ग्रामीण स्वास्थ्य पहल (NRHM), ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (RGGVY), ग्रामीण रोज़गार गारंटी अर्थात् नरेगा (NREGA),खाद्य सहायता के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम और गरीबों को सीधे लाभ पहुँचाने के लिए एक नया डिजिटल बुनियादी ढाँचा (UID). बिना किसी शोर-शराबे के इन कार्यक्रमों से ज़मीन पर लोगों को असली लाभ मिल रहा है और भारत की गरीबी-विरोधी नीतियों को क्रांतिकारी स्वरूप मिलने लगा है.

पाइप की राजनीतिः विश्व स्तर की ढाँचागत सुविधाएँ और शहरी विकास

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21/04/2014
लीज़ा ब्यॉर्कमैन

सन् 1991 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बंबई को सिंगापुर की तरह “विश्व स्तर का शहर” बनाने की योजना का श्रीगणेश किया था, तब से बंबई (अब मुंबई) शहर की सूरत में नाटकीय परिवर्तन होता रहा है.

भारत में मध्य पूर्व की नीतियों की निरंतरता और परिवर्तन

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19/05/2014
निकोलस ब्लेरल

फ़रवरी, 2014 में भारत ने एक ही सप्ताह में सउदी अरब के युवराज अब्दुल्ला अज़ीज़ अल सउद और ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़रीफ़ की मेज़बानी करके एक अनूठा जबर्दस्त राजनयिक दुस्साहस किया है. इन दौरों के समय को मात्र संयोग नहीं माना जा सकता; पिछले दो दशकों से भारत इज़राइल, फिलिस्तीन, ईरान और सउदी अरब जैसे मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों के साथ बड़ी ही कुशलता से संबंधों का निर्वाह करता रहा है. कुछ लोग इस संतुलनकारी कदम को इस क्षेत्र के लिए एक नये और व्यापक दृष्टिकोण के संकेत की तरह भारत की “ मध्य पूर्व की ओर देखने” की नीति के तहत देखते हैं.

आँकड़ों का खेलः 2014 के आम चुनाव का एक विश्लेषण

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16/06/2014
नीलांजन सरकार

 

2014 के आम चुनाव का अगर शव-परीक्षण किया जाए तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि भाजपा ने इस चुनावी मुकाबले में 282 (अर्थात् 52 प्रतिशत) सीटें जीती हैं और उनका वोट शेयर मात्र 31 प्रतिशत रहा है. यदि इस चुनाव से सन् 2009 के चुनाव की तुलना की जाए हो हम पाएँगे कि उस समय कांग्रेस ने उस चुनावी मुकाबले में  206 अर्थात् 38 प्रतिशत सीटें जीती थीं और उनका वोट शेयर मात्र 29 प्रतिशत रहा था. समान वोट शेयर के बावजूद जीती गई सीटों की संख्या में इतना अधिक अंतर क्यों है? इससे क्या अर्थ निकलता है?

नक्सली चुनौती के विरुद्ध भारत की जवाबी कार्रवाई को समझना

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14/07/2014
समीर लालवानी

अपने चुनावी अभियान के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ़ खूब जुबानी जंग की थी और नक्सलवाद को कतई बर्दाश्त न करने की रणनीति का ऐलान भी किया था और कुछ लोग तो प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से यह उम्मीद लगाये बैठे थे कि वर्तमान रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इस समस्या को सतही तरीके से हल करने की कोशिश की है उससे इन लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

नकदी, उम्मीदवार और चुनावी अभियान

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28/07/2014
माइकल कोलिन्स

दो माह पूर्व भारत में इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक घटना संपन्न हुई थी. 2014 का आम चुनाव पाँच सप्ताह की अवधि में नौ चरणों में संपन्न हुआ था, जिसमें 16 वीं लोकसभा के लिए 553.8 मिलियन मतदाताओं ने वोट डाले थे. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड विजय सुर्खियों में बनी रही और चुनाव पर हुए भारी खर्च के मामले से लोगों का ध्यान हट गया. एक अनुमान के अनुसार इस चुनाव में $5 बिलियन डॉलर का खर्च आया, जिसमें से $600 मिलियन डॉलर का खर्च तो सरकारी राजकोष से ही हुआ. हाल का यह चुनाव लोकतंत्र के इतिहास में सबसे महँगा चुनाव साबित हुआ. 

अफ्रीका पर केंद्रितः भारत की गतिविधियों का उभरता केंद्र उप-सहारा अफ्रीका

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11/08/2014
अर्न्ट मिचाएल

पिछले कुछ वर्षों में जिस परिमाण में उप-सहारा अफ्रीका के साथ भारत के व्यापार में भारी वृद्धि हुई है वह अपने-आप में ही इस बात का प्रमाण है कि उप-सहारा अफ्रीका भारत की नई धुरी है; भारत और उप-सहारा अफ्रीका के बीच सन् 2012 में व्यापार $60 बिलियन डॉलर का हो गया. उसी वर्ष अन्य देशों (योरोपीय संघ ($567.2 बिलियन डॉलर), अमरीका ($446.7 बिलियन डॉलर) और चीन ($220 बिलियन डॉलर) के साथ व्यापार में उल्लेखनीय कमी हुई.

राजनैतिक मृग-मरीचिकाः मेवात के चश्मे से

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08/09/2014
प्रीति मान

भारत में हाल ही में हुए चुनाव पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वैकल्पिक राजनीति के बीज बोये जा चुके हैं, लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि मीडिया के जबर्दस्त समर्थन और दिल्ली में अपनी ऐतिहासिक जीत दर्ज कराने के बावजूद आम आदमी पार्टी के खाते में लोकसभा की केवल चार सीटें ही आईं? मेवात के चश्मे से चुनावों के समाजशास्त्र को समझने की इस कोशिश में इसका एक पहलू उजागर हुआ है.  मेवात पर केंद्रित होते हुए भी ज़रूरी नहीं है कि ये निष्कर्ष इसी क्षेत्र तक ही सीमित हों.