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राजनीति

शहरी मध्यम वर्ग की राजनीतिः भारत की तीसरी लोकतांत्रिक लहर ?

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26/09/2016
पौलोमी चक्रबर्ती
पिछले दशक में शहरी मध्यम वर्ग की सक्रियता में निरंतर वृद्धि होती रही है. भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ऐतिहासिक आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है. इसी आंदोलन से आम आदमी पार्टी (‘आप’ पार्टी ) का जन्म हुआ था. इसलिए इसे भारत की पहली श्रेणी-आधारित महत्वपूर्ण शहरी राजनैतिक पार्टी माना जा सकता है. हाल ही के इतिहास पर अगर हम नज़र दौड़ाएँ तो पाएँगे कि 2014 के आम चुनाव में बड़े शहरों के अलावा अन्य शहरों में भी मध्यम वर्ग का मतदान पहली बार गरीब वर्ग से कहीं अधिक हुआ था.

लड़कियों द्वारा गँवाये गये स्कूली पढ़ाई के साल: असम विद्रोह का मामला

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29/08/2016
प्रकाश सिंह
भारतीय लड़कियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. गर्भ में आते ही लड़कों के मुकाबले उनके जन्म लेने की संभावनाएँ भी बहुत कम हो जाती हैं. “खोई हुई लड़कियों” की उपस्थिति अल्ट्रासाउंड टैक्नोलॉजी की पहुँच की ज़द में आ जाती है. साथ ही लड़कियों को स्तनपान भी बहुत कम समय के लिए कराया जाता है और उन पर शिशुपालन संबंधी निवेश भी बहुत कम होता है. उम्र के साथ बढ़ते हुए लड़कों के मुकाबले उन्हें शिक्षा के अवसर भी कम ही मिलते हैं. सूखे या युद्ध के समय भारी आर्थिक आघात के बाद तो इसका दुष्प्रभाव और भी भयानक

अंतर्वर्गीय असमानता और मतदान का व्यवहारः भारत के साक्ष्य

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15/08/2016
पवित्र सूर्यनारायण

भारतीय राजनीति के अंतर्गत राजनैतिक व्यवहार में वर्गीय पहचान पर बहुत जोर दिया गया है. फिर भी भारत एक ऐसा देश है जिसमें व्यक्तियों की भाषा, धर्म और (सवर्ण जाति, पिछड़ी जाति और अनुसूचित जातियों के नाम से) राजनैतिक छत्र के अंतर्गत समाहित जातियों और ‘बिरादरी’ या ‘जाति’ के रूप में बेहद स्थानीकृत उप-जातियों/ रिश्तेदारों के वर्गों के अंतर्गत भी अनेक वर्गीय पहचानें हैं. यदि व्यक्तियों की इतनी अधिक पहचानें हैं तो चुनाव के समय मतदाताओं के लिए किस पहचान का सबसे अधिक महत्व है और क्यों ?   

भारत के शहरी मध्यम वर्ग में जाति और विवाह

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18/07/2016
अमित आहुजा

आँकड़ों के अनुसार केवल 5 प्रतिशत भारतीय ही अंतर्जातीय विवाह करते हैं. इससे अक्सर मोटे तौर पर यही निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि वैवाहिक संबंधों का आधार जातिगत है. परंपरागत रूप में जाति से बाहर की जाने वाली शादी को अब तक सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली है. यही कारण है कि ऑनर किलिंग अर्थात् अपने सम्मान की खातिर हत्याओं का दौर आज भी देश-भर में जारी है, लेकिन भारत के शहरी मध्यम वर्ग में युवा लोग शादी के लिए अपने जीवन साथी की तलाश अपनी जाति तक ही सीमित नहीं रखते.

भारत में चुनाव-पूर्व गठबंधन की राजनीति

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01/08/2016
ऐडम ज़िएगफ़ैल्ड
2015 के उत्तरार्ध में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य बिहार में एक विचित्र बात हुई. राज्य के विधान सभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को किसी अन्य पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक वोट मिले. इसके बावजूद भाजपा विधान सभा में तीसरी सबसे पार्टी के रूप में ही उभरकर सामने आई. भारत जैसे देश में, जहाँ प्रथम-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली का लाभ आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को ही मिलता है, तो फिर यह कैसे संभव हुआ कि सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी चुनाव हार गई ? इसका उत्तर चुनाव-पूर्व गठबंधन में निहित है, जब दो या अधिक राजनैतिक पार्टियाँ एक दूसरे के खिलाफ़ अपने

राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) क्या है ?

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05/07/2016
मेखला कृष्णमूर्ति

इसी साल के आरंभ में अप्रैल के मध्य में प्रधान मंत्री ने राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का उद्घाटन किया था, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों  (e-nam.gov.in) के लिए एकीकृत राष्ट्रीय मंडी का निर्माण करना था, ताकि मौजूदा कृषि उपज बाज़ार समिति (APMC) की मंडियों के नैटवर्क के लिए एकीकृत अखिल भारतीय इलैक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल को डिज़ाइन किया जा सके. सबसे पहले राष्ट्रीय कृषि मंडी (NAM) का प्रस्ताव 2014-15 के केंद्रीय बजट में किया गया था. इस समय यह अपने प्रायोगिक चरण में है और इसके अंतर्गत 8 राज्यों में फैली 21 मंडियाँ और 11 कृषि उत्पादन आते हैं.

मुल्ला मंसूर के मारे जाने के कारण अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान के कम होते विकल्प

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20/06/2016
अजय शुक्ला
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की

नागरिक, पंचायत और सरकार: ग्राम पंचायतें दोराहे पर

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06/06/2016
गैब्रिएल क्रक्स-विसनर

उस बात को लगभग पच्चीस साल हो गए जब विकेंद्रीकरण पर विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग भारत में शुरू हुआ था. संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार 200,000से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई, उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं का दायित्व सौंपा गया और ऐतिहासिक रूप से वंचितमहिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. बहुत से लोग मानते हैं कि ये पंचायतें लोकतांत्रिक और नौकरशाही के जाल में फँसे कागज़ी शेर हैं. यही कारण है कि नागरिकों से भी उनकी यहीअपेक्षा है कि इन पंचायतों की अनदेखी की जाए.

भारत के नये बिट मॉडल की उपलब्धियाँ और कमियाँ

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23/05/2016
सुमति चंद्रशेखरन और स्मृति परशीरा

दिसंबर, 2015 में भारत सरकार ने अपने नये मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को सार्वजनिक कर दिया. यह व्यक्तिगत स्तर पर किये गये समझौते के करार का एक टैम्पलेट है, जिसके माध्यम से किसी एक देश की किसी फ़र्म द्वारा दूसरे देश की फ़र्म में किये गये निजी निवेश को शासित किया जाता है.

बहिष्कार और भेदभाव से लड़ने का उपाय है, चुनावी कोटा

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11/04/2016
फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.