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राजनीति

बदलती धाराएँ:अंतर्राज्यीय नदियाँ और संबंध

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07/10/2013
श्रीनिवास चोक्ककुला

हाल ही में जल संसाधन मंत्रालय ने सन्2012 की जल नीति के राष्ट्रीय प्रारूप से संबंधित प्रस्ताव के अनुसरण में अंतर्राज्यीय नदियों के जल संबंधी विवादों के लिए एक स्थायी अधिकरण बनाने के लिए एक कैबिनेट नोट तैयार किया है.जहाँ तक रिपोर्ट का संबंध है, विवादों के निवारण में होने वाले विलंब और बार-बार होने वाले इन विवादों के निपटारे के लिए उच्चतम न्यायालय जाने की राज्यों की प्रवृत्ति से सरकार बहुत चिंतित है. न्यायनिर्णयन के लिए स्थायी गुंजाइश रखने का लाभ तो होगा, लेकिन यह काफ़ी नहीं होगा. यह एप्रोच गलत सूचनाओं पर आधारित है.

बाँध की राजनीतिः भारत, चीन और सीमा-पार नदी

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04/11/2013
रोहन डिसूज़ा

हाल ही के वर्षों में जब भी भारत और चीन के बीच शिखर-वार्ताएँ हुई हैं, जल-विवाद का मुद्दा मुखर होकर समझौता-वार्ताओं में छाया रहा है. सबसे अधिक उलझन वाला मुद्दा रहा है, भीषण और क्रोधी स्वभाव वाली सीमा-पार की नदी, येलुज़ंगबु-ब्रह्मपुत्र-जमुना (वाईबीजे) प्रणाली, जिसका अपना पूरा जलमार्ग तीन प्रभुता-संपन्न देशों (चीन, भारत और बांगला देश) से होकर गुज़रने के बाद ही खत्म होता है.

भारत में बाँटने वाली राजनीति और गुप्त मतदानः किसका क्या परिणाम होगा?

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13/01/2014
मार्क श्नाइडर

क्या राजनैतिक दलों और उनके स्थानीय एजेंटों की पहुँच सरकारी सेवाओं और सरकारी कल्याण योजनाओं से मिलने वाले लाभ तक हो पाती है और क्या वे जान पाते हैं कि मतदाता कैसे वोट डालते हैं और किसको वोट डाल सकते हैं ? यह राजनैतिक रणनीति, जिसे सामाजिक वैज्ञानिक ग्राहकवाद कहते हैं उन स्थानीय नेताओं पर किये गये भारी निवेश पर निर्भर करती है जो मतदाताओं के बारे में यह जानकारी जुटाते हैं कि दल विशेष के प्रति उनकी पसंद क्या है, उनके वोटों के और विकल्प क्या हो सकते हैं, उनके इरादे क्या हैं और साथ ही यह भी कि चुनाव के दौरान वे अपने दल के पक्ष में मतदाताओं को रिझाने के लिए कौन-से लोक-लुभावने काम कर सकते हैं?

भारत में आनुवंशिक राजनीति फल-फूल रही है, लेकिन असली नेता दूसरे मार्गों से शीर्ष पर पहुँच रहे हैं

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27/01/2014
पैट्रिक फ्रैंच

जो लोग यह मानते हैं कि भारतीय समाज आम तौर पर गुणतंत्र पर अधिकाधिक ज़ोर देने लगा है, उन्हें यह बात रास नहीं आती कि वंशवाद अभी-भी चुनावी राजनीति पर हावी है- लेकिन अब उनका प्रभाव इतना नहीं रह गया है, जितना कि पहली नज़र में दिखायी देता है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञों ने शीर्ष पर पहुँचने का दूसरा रास्ता ढूँढ लिया हैः कई दलों के ऊपरी पायदान के प्रमुख नेताओं को वंशवाद का कोई लाभ नहीं मिलता और जल्द ही इस व्यवस्था में किसी प्रकार के परिवर्तन की भी कोई संभावना नहीं है. 

भारतीय मतदाता के बचाव में

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10/02/2014
नीलांजन सरकार

जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, हमारा ध्यान फिर से भारतीय मतदाता की ओर खिंचने लगा है. मीडिया, विद्वज्जन और नीति-निर्माता अक्सर यह गलत धारणा पालने लगते हैं कि भारतीय मतदाता अपेक्षाकृत नासमझ है और केवल अल्पकालीन लक्ष्यों को ही देखता है और उसे बहुत आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है.

भारतीय संघवाद के लिए तेलंगाना के क्या मतलब हैं?

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24/02/2014
अरुण सागर

आखिरी क्षणों में हुई राजनीतिक धमाचौकड़ी को अगर छोड़ दिया जाए तो 2014 की शुरुआत में तेलंगाना भारत का 29 वाँ राज्य बन जाएगा. इससे उस कहानी का अंत हो गया जिसकी शुरुआत स्वतंत्र भारत में राज्यों के पुनर्गठन के पहले चरण के रूप में हुई थी. तेलंगाना उस आंध्र प्रदेश को विभाजित करके बनाया जाएगा, जिसका निर्माण सन् 1953 में तत्कालीन हैदराबाद और मद्रास राज्यों के तेलुगुभाषी क्षेत्रों को मिलाकर किया गया था. तेलंगाना उस क्षेत्र का नाम है जो पहले हैदराबाद राज्य का हिस्सा था. आंध्र प्रदेश  के निर्माण के बाद ही भाषाई आधार पर अन्य राज्यों के निर्माण के लिए आंदोलनों की शुरुआत हुई थी.

संवैधानिक दृष्टि से गैर कानूनीः भारत में अध्यादेश राज

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10/03/2014
शुभंकर धाम

गनीमत है मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी पूर्व निर्धारित योजना के बावजूद एक साथ अनेक अध्यादेश ज़ारी करने का निर्णय वापस ले लिया, वर्ना संविधान का भारी उल्लंघन हो जाता. रिपोर्ट के मुताबिक छह अध्यादेशों पर विचार किया जा रहा था. इनमें से कुछ अध्यादेश ऐसे थे, जिनसे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने की संभावना थी, ताकि श्री राहुल गाँधी को चुनावी सफलता मिल सके. दूसरे अध्यादेशों में विकलांग विधेयक और अनुसूचित जनजाति / अनुसूचित जाति (अत्याचार निवारण) विधेयक भी थे, जिनसे कदाचित् मरणासन्न मंत्रिमंडल को सामाजिक और लोकतांत्रिक चमक मिल सकती थी.

कच्चे तेल का भारत का राजा अफ्रीका में तेल के क्षेत्र में निवेश करके फँसा

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24/03/2014
ल्यूक पैटे

पिछले दिसंबर में दक्षिणी सूडान में संघर्ष शुरू हो जाने के कारण हाल ही में नवोदित देश में भारत के मल्टी-बिलियन डॉलर की तेल परियोजना बंद हो गयी. अस्थिरता के कारण भारतीय राजनयिकों ने नुक्सान से बचने की कोशिशें शुरू कर दीं, क्योंकि भारत की राष्ट्रीय तेल कंपनी की अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) के लिए आवश्यक था कि वह उस क्षेत्र से अपने कर्मचारियों को बाहर निकाले. वैश्विक तेल संसाधनों को हासिल करने में चीन को अक्सर भारत का सबसे बड़ा प्रतियोगी माना जाता है.

मौन क्रांतिः भारत के गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का राजनैतिक तर्क

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07/04/2014
आदित्य दासगुप्ता

पिछले पंद्रह वर्षों में भारत में महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों का एक तरह का अकारादि सूप तैयार होते देखा गया हैः ग्रामीण संपर्क योजना (PMGSY), सार्वभौमिक प्राथमिक स्कूलिंग पहल (SSA), ग्रामीण स्वास्थ्य पहल (NRHM), ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (RGGVY), ग्रामीण रोज़गार गारंटी अर्थात् नरेगा (NREGA),खाद्य सहायता के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम और गरीबों को सीधे लाभ पहुँचाने के लिए एक नया डिजिटल बुनियादी ढाँचा (UID). बिना किसी शोर-शराबे के इन कार्यक्रमों से ज़मीन पर लोगों को असली लाभ मिल रहा है और भारत की गरीबी-विरोधी नीतियों को क्रांतिकारी स्वरूप मिलने लगा है.