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राजनीति

कट्टरपंथी बनाम समझौतावादी : अफ़गानिस्तान के प्रति भारत की नीति संबंधी राजनीति के मूल तत्व

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21/09/2015
अविनाश पालिवाल
जैसे-जैसे काबुल रावलपिंडी के साथ मेल-मिलाप की कोशिश कर रहा है, भारत की अफ़गानिस्तान-नीति में बदलाव दिखाई देने लगा है. अफ़गानी अधिकारियों के कई बार निवेदन करने पर भी दिल्ली अक्तूबर, 2011 में दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित और बहुचर्चित द्विपक्षीय रणनीतिक करार पर चर्चा करने और उसकी समीक्षा करने के लिए द्विपक्षीय रणनीतिक भागीदारी परिषद की बैठक आयोजित करने से हिचक रहा है.

भारत में पुलिस महिलाकर्मीः अभी मंज़िल दूर है

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02/01/2013
अंजना सिन्हा

इतिहास के प्रवाह में स्वाधीन भारत की महिलाएँ आगे तो आयी हैं, लेकिन पिछले पैंतीस वर्षों में ही उन्होंने वैश्वीकरण की उत्तर-औद्योगिक क्रांति और उसके बाद आयी सकारात्मक गतिविधियों को महसूस किया है. इन गतिविधियों के कारण घर में,कार्यस्थलों पर, अपने सहकर्मियों के साथ और आम तौर पर पूरे समाज में भी बुनियादी तौर पर बदलाव आया है. यह ठीक वैसा ही सामाजिक बदलाव था,जैसा कि साठ के दशकों में अमरीकी महिलाओं ने महसूस किया था.

मोर्चेबंद संप्रभुताः भारत,संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवतावादी हस्तक्षेप

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11/02/2013
रोहन मुखर्जी

31 दिसंबर, 2012 को भारत ने अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाये रखने के लिए विश्व की प्रमुखतम बहुपक्षीय संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपना सातवाँ दोवर्षीय अस्थायी सदस्यता  का कार्यकाल पूरा किया है. आरंभ में कई विश्लेषकों ने इस अवधि को दिल्ली द्वारा वांछित और संभावित स्थायी सीट के लिए एक “प्रयोग” माना था.

जापान-भारत संबंधों में प्रत्यक्ष अंतराल

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25/03/2013
विक्टोरिया टुके

चीन की बढ़ती ताकत के चिंताजनक स्वरूप के मद्देनज़र अनुकूल भूराजनैतिक परिस्थितियों के बावजूद भारत और जापान के आपसी संबंध अभी तक बहुत प्रगाढ़ नहीं हो पाये हैं. दोनों के बीच “प्रत्यक्ष अंतराल" बने रहने के कारण संबंध बहुत प्रगाढ़ नहीं हो पाये हैं.

स्वतंत्र न्यायपालिका,हितधारक समूह और नियमों का औचित्य

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22/04/2013
श्रुति राजगोपालन

आज भारत में सार्वजनिक हित के मामलों को तभी महत्व मिलता है जब उच्चतम न्यायालय इस पर ज़ोर डालता है. सामान्य और विशेष दोनों ही प्रकार के हितधारकों के प्रतिनिधि न्यायपालिका में सक्रिय होकर याचिका दाखिल करते हैं. किसी भी विषय पर होने वाले वाद-विवाद से भारतीय न्यायपालिका को महत्व मिलता है और वह सक्रिय भी बनी रहती है. एक ऐसे युग में जहाँ अधिकांश संस्थाओं पर राजनीति हावी होने लगी है, न्यायपालिका ही एकमात्र संस्था बची है जिस पर नागरिकों का विश्वास अभी भी कायम है और उन्हें लगता है कि वहाँ उनकी सुनवाई ठीक तरह से हो सकती है.

चीनी-भारतीय संबंधः दिल्ली की रोलर कोस्टर राइड

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20/05/2013
सी. मोहन राजा

यदि चीनी-भारतीय संबंधों का यही ऐतिहासिक क्रम बना रहता है तो जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में हाल ही में भारत-चीन के सैन्य संबंधों में आये गतिरोध के बाद भी द्विपक्षीय संबंधों में आसन्न कायाकल्प को लेकर जल्द ही भारी प्रचार होगा और यह भी चर्चा होगी कि इससे विश्व में कैसे बदलाव आएगा. भारत ने जब चीन को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि यथास्थिति बनाये रखने में असफल होने के परिणामस्वरूप द्विपक्षीय संबंधों पर भारी असर पड़ सकता है तो भारत के दावित क्षेत्र में चीनी सुरक्षा बलों द्वारा तीन सप्ताह तक जारी घुसपैठ मई के आरंभ में समाप्त हो गयी.

रणनीतिक संस्कृति के रूप में सरकारियत

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03/06/2013
अनित मुखर्जी

सन् 1992 में प्रायः उद्धृत किये जाने वाले एक निबंध में जॉर्ज टनहम ने निरंतर प्रचारित किंतु सत्य से परे एक भूराजनीतिक विचार को सामने रखा था कि भारतीयों में रणनीतिक संस्कृति का अभाव है. टनहम द्वारा आधुनिक भारत के सभी कूटनीतिज्ञों को एक साथ नकार देने से कुछ भारतीय विचारक बेहद नाराज़ हो गए थे जबकि कुछ लोगों ने उनके इस विचार को अविलंब स्वीकार कर लिया था. हाल ही की  एक कवर स्टोरी में ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ने महाशक्ति बनने की भारत की इच्छा के मार्ग में आने वाली अनेक चुनौतियों का विश्लेषण तो अच्छा किया है, लेकिन रणनीतिक संस्कृति की उसकी परिभाषा बौद्धिक रूप से लचर है.

भारत में चुनावः मतदाताओं की गलतियाँ

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17/06/2013
मिलन वैष्णव

पहचान की राजनीति करना भारत के मानवीय संवाद के अधिकांश विश्लेषण का सबसे अधिक उपयोगी काम रह गया है. कई दशकों तक तो जाति और समुदाय की खाई को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा जाता था, क्योंकि इसीसे सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिशीलता के  स्वरूप को आकार मिलता था. जिस हद तक लोग व्यक्तिगत स्तर पर हिंसक गतिविधियों में संलग्न  होते हैं, सामूहिक तौर पर हिंसक हो जाते हैं, सार्वजनिक हितकारी कामों को सफलता से पूरा करते हैं या चुनाव के दिन निर्णय लेते हैं – सभी कुछ जातीय पहचान के दायरे में देखा जाता है.

परमाणु संरक्षकों का संरक्षण

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15/07/2013
क्रिस्टोफ़र क्लैरी

सन् 1998 के परमाणु परीक्षण की पंद्रहवीं वर्षगाँठ को कुछ सप्ताह ही हुए हैं. सन् 1974 के भारत के “शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण” की चालीसवीं वर्षगाँठ को पूरा होने में साल भर से कम समय बचा है. भारत अपने परमाणु वैज्ञानिकों की उपलब्धियों पर गर्व का अनुभव करता है. अंतर्राष्ट्रीय  हुकूमत द्वारा प्रगति को धीमा करने के लिए किये गये प्रयासों को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और यहाँ तक कि नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने एकजुट होकर परमाणु ऊर्जा की भिन्न-भिन्न प्रकार की अवसंरचनाओं को निर्मित करने और परमाणु हथियारों को बनाने की क्षमता विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास किये हैं.

भारत के लोकतंत्र का कानून

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29/07/2013
माधव खोसला

सूक्ष्म लोकतांत्रिक आदर्शों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए, इसका निर्णय बहुत आसान नहीं है. कुछ व्यापक निर्णय संस्थागत होते हैं, जैसे कि देश को संसद की प्रणाली अपनानी चाहिए या नहीं; और कुछ निर्णय बहुत सूक्ष्म होते हैं- जैसे चुनावी ज़िलों को किस आधार पर गठित किया जाए, चुनावी भाषणों का नियमन कैसे किया जाए, आदि..आदि. लोकतांत्रिक आदर्श को विशिष्ट संस्थागत स्वरूप प्रदान करने से उसका प्रभाव मूलतः उसकी कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है और उस आदर्श को अपने-आपमें चुनौती भी दे सकता है.