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राजनीति

मुल्ला मंसूर के मारे जाने के कारण अफ़गानिस्तान में पाकिस्तान के कम होते विकल्प

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20/06/2016
अजय शुक्ला
क्या पाकिस्तान ने मुल्ला मुहम्मद मंसूर की मौत का मार्ग सिर्फ़ इसलिए ही प्रशस्त किया था, क्योंकि तालिबान के मुखिया ने काबुल में शांति-वार्ता में भाग लेने से इंकार कर दिया था? आखिरकार मंसूर की ज़िद के कारण ही इस्लामाबाद तालिबान को चतुष्कोणीय समन्वय दल (QCG) के साथ बातचीत के मंच पर लाने के अपने वायदे उत्तराधिकारी मुल्ला हैब्तुल्ला अखुंदज़ा भी उसकी तरह लड़ाई के मैदान में पाई गई कामयाबी को राजनीतिक समझौते में इस तरह से खोने के लिए तैयार नहीं है कि अधिकांश सत्ता काबुल की “कठपुतली सरकार” को मिल जाए? तालिबान की

नागरिक, पंचायत और सरकार: ग्राम पंचायतें दोराहे पर

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06/06/2016
गैब्रिएल क्रक्स-विसनर

उस बात को लगभग पच्चीस साल हो गए जब विकेंद्रीकरण पर विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग भारत में शुरू हुआ था. संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार 200,000से अधिक ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई, उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं का दायित्व सौंपा गया और ऐतिहासिक रूप से वंचितमहिलाओं और अनुसूचित जाति व जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गईं. बहुत से लोग मानते हैं कि ये पंचायतें लोकतांत्रिक और नौकरशाही के जाल में फँसे कागज़ी शेर हैं. यही कारण है कि नागरिकों से भी उनकी यहीअपेक्षा है कि इन पंचायतों की अनदेखी की जाए.

भारत के नये बिट मॉडल की उपलब्धियाँ और कमियाँ

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23/05/2016
सुमति चंद्रशेखरन और स्मृति परशीरा

दिसंबर, 2015 में भारत सरकार ने अपने नये मॉडल द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) को सार्वजनिक कर दिया. यह व्यक्तिगत स्तर पर किये गये समझौते के करार का एक टैम्पलेट है, जिसके माध्यम से किसी एक देश की किसी फ़र्म द्वारा दूसरे देश की फ़र्म में किये गये निजी निवेश को शासित किया जाता है.

बहिष्कार और भेदभाव से लड़ने का उपाय है, चुनावी कोटा

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11/04/2016
फ्रांसेस्का आर.जेन्सेनियस

संसद में आरक्षित कोटे या प्रत्याशी कोटे जैसे चुनावी कोटे का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और इसके दीर्घकालीन विभिन्न प्रभावों को देखते हुए आम तौर पर इसका बचाव भी  होने लगा है. लेकिन अधिकांश देशों में इसके प्रभावों का आकलन बहुत मुश्किल रहा है. इसका एक आंशिक कारण तो यही है कि ये नीतियाँ लंबे समय तक लागू नहीं रह पाईं.

भारत के शहरों में ग्राहकवाद की दिक्कतें

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28/03/2016
साइमन चॉचर्ड
भारत में राज्यों के विधायकों की सबसे बड़ी दिक्कत है, विधायक के रूप में उनकी पदधारिता का कार्यकाल. एक बार विधायक होने पर दुबारा से विधायक चुना जाना मुश्किल हो जाता है. यह इस हद तक भ्रामक होता है कि इन पदधारियों को अपने इस राजनीतिक पद पर बने रहने का पर्याप्त लाभ उठाते हुए ही अगले चुनावों के दौरान भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देनी होती है. उदाहरण के तौर पर उनकी यह अपेक्षा तो रहती ही है कि व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं की मदद करने के कारण

स्टेरॉइड्स पर मध्यम वर्गः शहरी भारत में डिजिटल मीडिया की राजनीति

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14/03/2016
सहाना उडुपा

सारे विश्व में और निश्चित रूप से भारत में भी इंटरनैट से संबद्ध मीडिया के कारण राजनीतिक भागीदारी के क्षेत्र में नई आशा का संचार हुआ है और सार्वजनिक बहस और राजनीतिक सक्रियता के नये अखाड़े खुल गए हैं. हाल ही के अनुमान दर्शाते हैं कि भारत में लगभग 350 मिलियन इंटरनैट के उपयोक्ता हैं और पहुँच और संख्याबल की दृष्टि से देखें तो हम केवल चीन और अमरीका के ही आसपास हैं. 

काम करने के अधिकार को सबल बनाने के लिएः भारत का दसवर्षीय राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम

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29/02/2016
रॉब जेकिन्स
फ़रवरी,2016 में भारत के राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम को लागू हुए दस साल पूरे हो गए. नरेगा क्रांतिकारी होने के साथ-साथ सीमित भी है. जहाँ इससे एक ओर प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सार्वजनिक निर्माण की परियोजनाओं पर साल में सौ दिन का रोज़गार मिलता है, वहीं दूसरी ओर श्रम भी बहुत ज़्यादा करना पड़ता है और मज़दूरी भी बहुत कम

बिहार से सीखः बिहार 2015 के चुनाव भारत की राजनीति के बारे में क्या कहते हैं

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04/01/2016
नीलांजन सरकार
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार को 2015 के बिहार चुनाव में भारी पराजय का सामना करना पड़ा. 2014 के राष्ट्रीय चुनाव में एनडीए ने 243 विधानसभा-क्षेत्रों में से 172 क्षेत्रों में जीत हासिल की थी, लेकिन सिर्फ़ 18 महीने के बाद हुए 2015 के बिहार के चुनाव में केवल 58 विधानसभा-क्षेत्रों में ही जीत हासिल हुई. रस्मी तौर पर किसी भी चुनाव की अंतिम शल्य-परीक्षा तो होगी ही, लेकिन इस चुनाव के माध्यम से भारत के निर्वाचक मंडल को

क्या स्थानीय नेता गरीबों को प्राथमिकता देते हैं ? भारत की वितरण-परक प्राथमिकताएँ

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14/12/2015
मार्क शेंदर
सन् 1985 में भारत में गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपने प्रसिद्ध उद्गार प्रकट करते हुए कहा था: “सरकार द्वारा आम आदमी के कल्याण पर खर्च किये गये एक रुपये में से सिर्फ़ सत्रह पैसे ही आम आदमी तक पहुँचते हैं.” इस तरह के मूल्यांकन से प्रेरित होकर सन् 1993 में 73 वाँ संशोधन पारित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय स्तर पर सीमित रूप में ही

अधिक और बेहतर भीः भारत के कोयले के उपयोग में अकुशलताएँ

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30/11/2015
रोहित चंद्र
UNFCCC अर्थात् जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के पक्षकार सम्मेलन (COP) में अपने देश के कोयले के उपयोग की गहन समीक्षा लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में पक्षकारों के सम्मेलनों में बढ़ा-चढ़ाकर और शब्दाडंबर से पूर्ण और उम्मीद से कहीं कम नतीजे रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि नतीजे ज़मीनी हकीकत से कितने जुड़े होंगे. भारत के ऊर्जा-मिश्रण का निर्धारण मुख्यतः घरेलू कारणों से ही होता है, लेकिन इस प्रकार के वार्षिक बहुपक्षीय सम्मेलनों से