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बात अक्षय ऊर्जा की, लेकिन प्रयोग कोयले का : भारत के ऊर्जा संक्रमण का अंतर्विरोध

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04/01/2021
ब्रोतोती रॉय

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी देशों, क्षेत्रों और समुदायों पर अलग-अलग अनुपात में पड़ता है. जो स्थान और आबादी पहले से ही सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर है, उन पर वैश्विक तापन जगत् का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है. भारतीय संदर्भ में हाल ही के शोध कार्यों से पता चलता है कि भारत के 75 प्रतिशत ज़िले जलवायु के हादसों के सबसे अधिक शिकार होते हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की जलवायु संबंधी वार्ताओं से पता चलता है कि भारत जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से अच्छी तरह परिचित है. 2015 में पेरिस में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा आयोजित जलवायु परिवर्तन के सम्मेलन (COP21) में भारत सरकार ने संकल्प किया था कि वह 2030 तक गैर जीवाश्म स्रोतों से 40 प्रतिशत बिजली पैदा करेगी, लेकिन अक्षय ऊर्जा पर चलने वाली वार्ताओं और ऊर्जा के संक्रमण के बावजूद भारत में कोयले का उपयोग बढ़ रहा है और हमारा देश इस प्रकार की ऊर्जा के उपयोग को कम करने के बजाय जीवाश्म ऊर्जा वाहकों के साथ संबंधों को और भी प्रगाढ़ बनाने में जुटा है.

भारत 2023-24 तक हर साल एक बिलियन टन कोयला निकालने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है. भारत में पहले ही निजी कंपनियों को रियायत पर नीलामी की प्रक्रिया देश के 41 कोयला ब्लॉकों में शुरू की जा चुकी है. इनमें वे क्षेत्र भी शामिल हैं, जहाँ समृद्ध जैव-विविधता के साथ-साथ वे पुराने जंगल भी हैं, जहाँ देशी समुदाय बसे हुए हैं. इसके अलावा इनमें वे योजनाएँ भी हैं जिनके अंतर्गत नई कोयला खानों के लिए 55 और रियायतें देने के लिए नीलामी की योजनाएँ बनाई गई हैं और अगले पाँच वर्षों में कम से कम 193 मौजूदा खानों का विस्तार किया जाएगा. 2017 में भारत दुनिया में कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और आयातक देश बन गया था.

विकास के लिए कोयले की ज़रूरत पड़ती है: आर्थिक विकास और रोज़गार के लिए आवश्यक उद्योग और सेवाओं के विस्तार के लिए कोयले की ज़रूरत पड़ती है, बिजली की उपलब्धता के लिए कोयले की ज़रूरत पड़ती है और ऊर्जा के लिहाज़ से विपन्न लोगों को रसोई के लिए स्वच्छ ईंधन की ज़रूरत पड़ती है, भले ही भारत की बिजली का सबसे बड़ा और तेज़ी से बढ़ता उपभोक्ता वह उद्योग है, जहाँ इस बिजली की लगभग 40 प्रतिशत खपत होती है, जबकि इसकी तुलना में घर-परिवार के लोगों पर यह खपत केवल 25 प्रतिशत होती है (घर-परिवार के लोगों के बीच भी खपत में भारी असमानता है).

यही वह तर्क था, जिसके आधार पर साल की शुरुआत में 41 ब्लॉकों में कोयले के खनन के लिए व्यावसायिक नीलामी का निर्णय किया गया था. लोकार्पण के दौरान 2.8 लाख रोज़गारों के सृजन और राजस्व में 20,000- करोड़ रुपये की वृद्धि जैसे लाभ गिनाये गए थे, लेकिन सूचना के अधिकार के अनुसार लेखक और ऊर्जा शोधकर्मी संदीप पै द्वारा निकाले गए आँकड़ों पर आधारित उन तमाम रिपोर्टों और गणनाओं को तलब किया गया था, जिनके साथ आरंभ में इस दावे की पुष्टि के लिए कोई आँकड़े नहीं दिए गए थे. बाद में सवाल उठाने पर पूरक सूचनाएँ उन्हें किसी सरकारी संचार माध्यम से नहीं, बल्कि ट्विटर के माध्यम से प्राप्त हुईं. इससे पता चलता है कि रोज़गार और राजस्व में वृद्धि के दावे बिना किसी ठोस प्रविधि के किये गए थे. यही कारण है कि वे आसानी से विवादों में फँस सकते थे.

कोयले की सामाजिक और पर्यावरणीय लागत
निश्चय ही कोयले की जो पूरी सप्लाई चेन बनेगी, उस पर भारी सामाजिक और पर्यावरणीय लागत आएगी. निष्कासन से लेकर ढुलाई और ज्वलन तक कोयला एक ऐसा विवादास्पद संसाधन और वस्तु है, जिससे भारत की गरीबी (आर्थिक और ऊर्जा संबंधी) और बेरोज़गारी, पर्यावरणीय गिरावट और जलवायु संकट की परस्पर संबद्ध सामाजिक-पारिस्थितिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता.

समग्र रूप में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए उत्पादित कोयला पर्यावरणीय अन्याय को जन्म देता है और स्वाभाविक रूप से ज़मीन से बेदखली, आजीविका के विनियोजन और जल और वायु प्रदूषण से जुड़ा हुआ है. कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के आसपास रहने वाली आबादी में 80,000 से 115,000 तक लोगों की हर साल समय-पूर्व मौत हो जाती है. कोयले की खानों में काम करने वाले कामगार और समुदाय अनेक प्रकार की घातक बीमारियाँ झेलते हैं. इन बीमारियों में प्रमुख है, निमोनिया (जिसे आम तौर पर काले फेफड़े की बीमारी कहा जाता है). यह बीमारी कोयले की धूल में साँस लेने और दूषित पीने की पानी पीने के कारण होती हैं.

यही कारण है कि कोयला सबसे अधिक विवादास्पद संसाधन बन गया है और सारे देश में इसकी वजह से विरोध प्रदर्शन और संघर्ष होते हैं. ये संघर्ष भारत में होने वाले व्यापक पर्यावरणीय न्याय आंदोलन के एक भाग के रूप में होते हैं. इन आंदोलनों में लोगों और भूमंडल के सरोकारों पर अच्छी तरह से ध्यान दिये बिना ही देश के विकास-मार्ग के अनुरूप स्वायत्तता और सामाजिक-आर्थिक पारिस्थितिकीय कल्याण के लिए दावा किया जाता है. 

पिछले कई दशकों से ऐसे अनेक विरोध प्रदर्शन हुए हैं. ऐसा ही एक संघर्ष भारत के पूर्वी राज्य झारखंड में स्थित हज़ारीबाग ज़िले में हुआ था. न केवल जैव-विविधता से संपन्न जंगलों और खेती-बाड़ी की ज़मीन पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव के कारण, बल्कि इस क्षेत्र में पाये गए  प्रागैतिहासिक महापाषाणों के कारण भी यह संघर्ष 2004 से चल रहा है. कुछ स्थानीय ग्रामीणों ने (जिनमें से अनेक लोग आदिवासी थे), खनन के लिए ली जाने वाली ज़मीन के विनियोजन के विरोध में प्रदर्शन शुरू कर दिया. 2004 से करनपुरा को बचाने के लिए गठित संघर्ष समिति भारत की सबसे बड़ी कोयला कंपनी (NTPC लिमिटेड) की कोयले की खनन की महत्वाकांक्षा के विरोध में खेती-बाड़ी की ज़मीन को बचाये रखने के लिए संघर्ष में जुटी है. अब तक वे अनेक मोर्चे और प्रदर्शन कर चुके हैं. इन विरोध-प्रदर्शनों के बीच भारी सुरक्षा के पहरे में इस क्षेत्र में 17 मई, 2016 से खनन का काम आरंभ हुआ. हाल ही में जो विरोध प्रदर्शन हुए हैं, उनमें एक है, गोआ कोयला हब बनने की ओर. इस पर मीडिया में भी काफ़ी चर्चा हुई थी. इस साल के आरंभ में आसाम में डेहिंग पटकई नामक वन्य अभयारण्य में कोयले के खनन को रोकने के लिए कोविड-संकट के दौरान सक्रिय ऑन लाइन आंदोलन किया गया था.

कोयला युग का अंत
अगर भारत को सच्चे अर्थों में जलवायु के अपने लक्ष्य को हासिल करना है और देश में जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करना है तो ज़रूरी है कि कोयला युग का तुरंत ही अंत कर दिया जाए, लेकिन कोयले के अंत के इस चरण में दो चीज़ें करनी होंगी. भारत सरकार की मौजूदा योजना में ये दोनों चीज़ें गायब हैं.

सबसे पहले तो सरकार को चाहिए कि “कोयले को उसकी खान में ही रहने दिया जाए” और कोयले के निष्कासन पर रोक लगा दी जाए, भले ही वह इसे कितना भी “आर्थिक दृष्टि से उपयोगी” समझती हो और कोयले के युग को भारत में समाप्त कर दिया जाए.

दूसरी चीज़ यह है कि ऊर्जा प्रणाली के कायाकल्प के लिए लोगों, सरकार और कारोबारियों को साथ मिलकर प्रयास करना चाहिए. यह ऊर्जा प्रणाली केवल जीवाश्म ईंधन और नाभिकीय ऊर्जा जैसी अक्षय ऊर्जा पर ही आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि भारी रूप में पूँजीकृत केंद्रीय प्रणाली से हटकर इसे स्थानीय रूप में नियंत्रण करने योग्य और विकेंद्रित ऊर्जा प्रावधान के रूप में विकसित करना चाहिए.

जलवायु-संकट को बढ़ावा देने की संभावना बढ़ने की आशंका के कारण भारतीय कोयला प्रणाली का विस्तार अब कठिन होता जा रहा है. लोगों की आजीविका और मानव जीवन पर भयानक संकट आ सकता है. यही कारण है कि स्थानीय लोग इसके विस्तार के विरोध में भारी प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन जिस तरह से हिंसात्मक रूप में कार्रवाई की जा रही है, उससे यही लगता है कि इसे लागू करने में जिनका भारी हित निहित है, वे लोग स्थानीय लोगों पर हावी होने में जुटे हैं. 

जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, गर्म हवा के थपेड़ों और वायु प्रदूषण से भारत के नागरिक आक्रांत होने लगे हैं. भारत में यह क्षमता है कि वह जीवाश्म प्रणाली से बाहर निकलकर ऊर्जा के स्थायी स्वरूप को अपनाए, क्योंकि जीवाश्म प्रणाली न तो टिकाऊ है और न ही न्यायसंगत.

ब्रोतोती रॉय स्वायत्त बर्सिलोना विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान EnvJustice (www.envjustice.org) में टीम की सदस्या हैं. उनकी पीएचडी का केंद्रबिंदु है, पारिस्थितिकीय अर्थशास्त्र एवं राजनैतिक पारिस्थितिकी के ढाँचों का उपयोग करते हुए भारत में कोयले के विरुद्ध चलने वाला पारिस्थिकीय न्याय आंदोलन. वह पारिस्थितिकीय अर्थशास्त्र के लिए भारतीय समाज की कार्यकारिणी समिति की निर्वाचित सदस्य भी हैं.

Anke Schaffartzik के साथ मिलकर लिखा गया यह लेख Ecological Economics के फ़रवरी 2021 में अंक में प्रकाशित हुआ है और इसे

यहाँ पढ़ा जा सकता है.

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार <malhotravk@gmail.com> / मोबाइल : 91+9910029919