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भारत-प्रशांत ढाँचे को समरूप बनाने को उन्मुख भारत के साथ सहयोग?

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20/01/2020
पारस रत्न

2018 के IISS शांगरी-ला संवाद में, भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर अमरीका के तटों तक भौगोलिक विस्तार के रूप में भारत-प्रशांत क्षेत्र से जुड़ी भारत की अवधारणा को स्पष्ट किया था. यहां गौर करने वाली बात है की भारत ने अमरीका के कहने पर भारत-प्रशांत क्षेत्र को नहीं अपनाया; बल्कि इसका जिक्र इतिहासकार  कालिदास नाग के लेखों में मिलता है , जिन्होंने चालीस के दशक में अपने लेखों (भारत-प्रशांत विश्व) में इस अवधारणा को स्पष्ट किया था. इंडो – पैसिफिक की अमरीकी सामरिक चर्चों में तूल पकड़ने से पहले ही सी. राजमोहन और कैप्टन गुरप्रीत खुराना जैसे विशेषज्ञों  ने इसके बारे में बहुत-कुछ लिखा है. इसलिए दोनों  देश (शों) की कल्पना के अनुरूप इसके भौगोलिक विस्तार के संबंध में परस्पर प्रतिस्पर्धी अवधारणाएँ भी हैं.

भारत की परिभाषा के अनुरूप पश्चिमी हिंद महासागर (विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार और “कुछ के लिए, लेकिन किसी के विरोध में नहीं) भी इसमें शामिल है, जबकि अमरीका भारत-प्रशांत क्षेत्र को एक नियंत्रण रणनीतिक क्षेत्र मानता है और यह क्षेत्र अमरीकी तट से लेकर भारत के पश्चिमी समुद्र तट तक फैला हुआ है. हालांकि हाल ही में सम्पन्न हुए राइसेना संवाद में अमरीका के उप राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार श्री पोट्टिंगर ने बढ़ती समरूपता की तरफ संकेत करते हुए कहा की अमरीका के लिए इंडो पैसिफिक क्षेत्र का विस्तार हॉलीवुड से बॉलीवुड की जगह अब कैलिफोर्निया से किलिमंजारो है.

विदेश संबंध परिषद के वरिष्ठ फ़ैलो एलिसा आइरस के अनुसार, “अमरीकी भारत-प्रशांत रणनीति को और अधिक हिंद महासागर के क्षेत्र की आवश्यकता है.” अमरीका का राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतिक प्रलेख (NSS) पश्चिमी हिंद महासागर के समुद्री स्थान के साथ-साथ अफ्रीका के पूर्वी तट और अरब सागर के बारे में मौन है, लेकिन इसमें भारत के रणनीतिक हितों को प्राथमिकता दी गई है. मोदी ने शांगरी-ला के अपने भाषण में भारत और दक्षिण अफ्रीका द्वारा सन् 1967 में संयुक्त रूप में स्थापित हिंद महासागर रिम संघ (IORA) के भौगोलिक स्वरूप की मोटे तौर पर चर्चा की थी.

समुद्री व्यापार और नौवहन मार्ग (WIOR) का अधिकांश भाग पश्चिमी हिंद महासागर के क्षेत्र से होकर गुज़रता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक चोक पॉइंट मध्य पूर्व से एशिया, यूरोप व उत्तरी अमेरिका तक के क्षेत्र में तेल बाज़ारों के लिए एक निकासी के रूप में कार्य करते हैं. यह अनुमान लगाया गया है कि दुनिया में कुल तेल के लगभग पाँचवें हिस्से के तेल (लगभग 20.7 मिलियन BPD) की ढुलाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर ही की जाती है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हाल के तनाव से वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा बहुत बड़े पैमाने पर खतरे में पड़ सकती है. वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस व्यापार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए भारत-प्रशांत क्षेत्र के उभरते भू-राजनीतिक ढांचे में  इस क्षेत्र को न शामिल करने से संचार की मुक्त और खुली समुद्री लाइनों (SLOC) को सुनिश्चित करने का उद्देश्य खतरे में पड़ सकता है.

ऊर्जा की सुरक्षा के अलावा, बहरीन, सउदी अरेबिया, यूएई और कतर जैसे मध्य एशिया के देशों में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी लोग रहते हैं, जिनके राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हितों का संरक्षण आवश्यक है. इसलिए, भारत जिसका उद्देश्य वैश्विक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना है, भारत-प्रशांत रणनीतिक गणना में मध्य-पूर्व/पश्चिमी एशिया में अपने हितों की अनदेखी नहीं कर सकता. अमरीका के लिए इस क्षेत्र में भारत-प्रशांत ढाँचे के विस्तार से मध्य एशिया में उसके घटते प्रभाव को रोका जा सकता है. यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मध्य पूर्व के देश अपनी अर्थव्यवस्था को फैलाने के लिए प्रयत्नशील हैं और अमरीका, भारत, जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी विशेषज्ञता के आधार पर इस संबंध में अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं.

पूर्वी अफ्रीका के समुद्रतटीय देशों ने वैश्विक मैट्रिक्स में अपनी खास जगह बना ली है और अफ्रीका भावी विकास की ओर उन्मुख है. मैकिन्से ऐंड कंपनी ने अपनी रिपोर्ट “Lions on the Move ” में यह अनुमान लगाया है कि इस क्षेत्र में 2020 तक $2.6 ट्रिलियन राजस्व पैदा होगा. अगर हम अर्थनीति की बात छोड़ भी दें तो भी यह उभरती हुई आर्थिक शक्ति का बड़ा केंद्र बन गया है, और सभी कंपनियाँ अपना प्रभाव बढ़ाने में लगी हैं. अमरीका को पीछे छोड़ चीन 2009 तक अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया था. इस समय यह राशि $200 बिलियन डॉलर से अधिक है. पिछले साल चीन के राष्ट्रपति झी जिनपिंग ने चीन- अफ्रीका सहयोग मंच (FOCAC) को $60 बिलियन डॉलर की मदद का वचन दिया था और सैन्य दृष्टि से अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंडेब की अनदेखी करते हुए जिबूटी के नौसैनिक अड्डे का निर्माण किया था. यह  तेल और प्राकृतिक गैस का चौथा सबसे बड़ा चोकपॉइंट है. हाल के दिनों में हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका मध्य-एशिया के देशों के शक्ति  संघर्ष का अड्डा बनता जा रहा है. इस क्षेत्र में अरब-धुरी (सउदी अरब और यूएई), ईरान-धुरी और कतर- टर्की धुरी के अधिकार का संघर्ष चल रहा है. मध्य-पूर्वेशिया के बीच चलने वाली होड़ की हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में विस्तार से इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो सकता है. इसका दुष्प्रभाव लाल सागर के समुद्री तट और अदन की खाड़ी के साथ-साथ चलने वाले जहाजरानी के मार्ग पर पड़ सकता है. इसलिए भारत-प्रशांत ढाँचे के अंतर्गत कानून व्यवस्था बनाये रखना इस क्षेत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है.

इन विश्लेषणों का उद्देश्य पश्चिमी हिंद महासागर के क्षेत्र को भारत-प्रशांत ढाँचे में शामिल करने की जरूरत को दर्शाना है .हाल ही में स्थापित अमरीका- भारत भारत-प्रशांत कमान (USIPACOM) से इस बात का संकेत मिल रहा है कि विश्व राजनीति के विशेष राजनीतिक-सैन्य मंच पर भारत का उदय हो रहा है और उसके साथ होने वाली चर्चा में  “चीन का विकेंद्रीकरण” सुनिश्चित होने लगा है. इसके साथ-साथ ही अमरीका की नियोजित विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका के संकेत मिलने लगे हैं. इसलिए प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं के समन्वय की चर्चा तो आसान है, लेकिन उसे लागू करना आसान नहीं होगा. यह कहने के बाद यह भी आवश्यक हो जाता है कि उन तमाम अंतरों को समाप्त किया जाए जिनसे भारत-प्रशांत निर्मिति में तालमेल बनाये रखने में बाधाएँ उत्पन्न होती हों. जहाँ तक पाकिस्तान और ईरान जैसे पश्चिमी हिंद महासागर के तटीय देशों की समस्याओं का संबंध है, अमरीका और भारत के वैश्विक दृष्टिकोण में अंतर है. जहाँ एक ओर भारत पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों के समर्थन का खुलकर विरोध करता है, वहीं अमरीका पाकिस्तान को अफ़गानिस्तान के झरोखे से देखता है. इसी प्रकार ट्रंप प्रशासन के P5 परमाणु समझौते से अलग हटने का प्रभाव न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ा है, बल्कि भारत की  चहाबार परियोजना पर भी पड़ा है. यही वह स्थल है जो भारत के लिए अफ़गानिस्तान और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरीडोर  (INSTC) का प्रवेश द्वार बन सकता है. इससे ही भारत-प्रशांत ढाँचे की ओर बढ़ने का मार्ग बहुत हद तक प्रशस्त हो सकता है.

मौजूदा अमरीकी भारत-प्रशांत कमान (USIPACOM) के प्रभाव-क्षेत्र में पाकिस्तान जैसे पश्चिमी हिंद महासागर के तटीय देश शामिल नहीं हैं. यह भारत के लिए चिंता का विषय है. एक समन्वित भारत-प्रशांत ढाँचे के निर्माण के लिए आवश्यक है कि अमरीका की केंद्रीय कमान का विलय नव-निर्मित भारत-प्रशांत कमान में हो जाए ताकि उसकी ऑपरेशन-क्षमता में वृदधि हो सके. दूसरी ओर यह भी आवश्यक है कि भारत अपनी रणनीतिक गणनाओं में पश्चिमी प्रशांत (विशेषकर चीन सागर) के क्षेत्र को भी समायोजित करे. हाल ही की दक्षिण लाल सागर की वेनगार्ड रीफ़ की घटना के संबंध में भारत की प्रतिक्रिया इस तथ्य के बावजूद बहुत सतही थी कि इस क्षेत्र में भारत के व्यापारिक हित हैं; ओएनजीसी (ONGC) विदेश निगम, दक्षिण लाल सागर में ऑयल ब्लॉक्स को ऑपरेट करता है. इसलिए दक्षिण चीन सागर के सैन्यीकरण के किसी भी प्रयास से भारत के वास्तविक हितों के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. उचित ढंग से प्रतिक्रिया न देने से भारत-प्रशांत क्षेत्र में उसकी अग्रणी भूमिका को नुक्सान पहुँच सकता है

जहाँ तक भारत का संबंध है, विदेश मंत्रालय के अंतर्गत मात्र भारत-प्रशांत प्रभाग बना देने से और हाल ही में क्वाड देशों (भारत, अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया) की बैठक से नई दिल्ली पर जो गंभीर न होने का आरोप को विराम लगा है. अमरीका और फ्रांस के बीच लॉजिस्टिक्स विनिमय करार पर हस्ताक्षर होने से अमरीकी और फ्रैंच नौसैनिक अड्डों पर उसकी पहुँच से भारत के अंतर-परिचालन में निश्चय ही बहुत वृद्धि हुई है और इसीप्रकार भारत के नौसैनिक अड्डों पर अमरीकी और फ्रैंच नौसेनिकों की पहुँच भी होने लगी है. इसी तरह जब यह सुविधा जापान और ऑस्ट्रेलिया (दोनों के साथ समझौता-वार्ताएँ चल रही हैं) को भी मिल जाएगी तो दोनों महासागरों को जोड़ने वाली समुद्री सुरक्षा भागीदारी का जालक्रम पूरा हो जाएगा. भारत-जापान-एशिया-अफ्रीका कॉरीडोर में अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस के जुड़ जाने की संभावना की कल्पना की जा सकती है. इससे भारत-प्रशांत ढाँचे की बुनियाद बहुत ठोस और मज़बूत हो जाएगी और इस क्षेत्र के सभी देशों की सुरक्षा और विकास भी सुनिश्चित हो जाएगा. 

भारत-प्रशांत क्षेत्र से संबंधित भारत की अवधारणा मान्य नियंत्रण (कंटेनमेंट ) के प्रतिमान से अलग हटकर है. बहुध्रुवीय नज़रिये से यह निरंतर भारत-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति की ओर उन्मुख हो रही है. हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय प्रणालियों के स्वरूप को लेकर भारत में वाद-विवाद हो रहा है; लेकिन भारत की प्राथमिकताओं में भारत-प्रशांत की प्रासंगिकता पूरी तरह झलकती है. यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले दो दशकों में हुई स्थायी आर्थिक वृद्धि और शस्त्र प्रणाली में निवेश के कारण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के पदानुक्रम में भारत ने काफ़ी प्रगति की है. यही कारण है कि आज रणनीतिक क्षेत्र में भारत के पास अपने विचारों को फैलाने के लिए काफ़ी गुंजाइश है. इसलिए आवश्यक है कि भारत-प्रशांत ढाँचे को समरूप बनाने के लिए प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं को अनुकूल बनाया जाए. 

पारस रत्न ने टाटा समाज विज्ञान संस्थान, मुंबई से स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है. इस समय वह नई दिल्ली स्थित विज़न इंडिया प्रतिष्ठान के रणनीतिक व विदेशी संबंध केंद्र में रिसर्च एसोशियेट के रूप में कार्य कर रहे हैं.

 

हिंदी अनुवादः विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय, भारत सरकार <malhotravk@gmail.com> / मोबाइल : 91+9910029919