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हिमालय में बसा एक देश और शहर

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11/09/2023
साराह बेस्की

“आज खेती वैसी नहीं है जैसी पहले हुआ करती थी.” यह बात मुझे कलिम्पोंग के लोगों ने उस समय बतायी थी जब मैं कोविड के फ़ील्डवर्क के अंतराल के बाद सन् 2022 की गर्मियों में वहाँ गई थी. कुछ बदलाव आ गया था. पहले के समय में, लोग हिमालय की तलहटी में पश्चिम बंगाल के एक जिले कलिम्पोंग में एक खास वस्तु के रूप में खेती को महत्व देने में आगे रहते थे. खेती और भूमि पर स्वामित्व के अधिकार ने नेपालियों और स्वदेशी लेपचा और भूटिया लोगों को, जो कलिम्पोंग को अपना घर कहते हैं, एक अलग राजनीतिक चेतना प्रदान की. उन्होंने मुझे बताया कि कलिम्पोंग में साक्षरता दर भी ज़्यादा है और यहाँ के निवासी तीस्ता नदी के उस पार चाय बागान वाले दार्जिलिंग ज़िले के निवासियों की तुलना में अधिक तंदुरुस्त होते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि कलिम्पोंग में खेती और आम तौर पर उससे जुड़े काम हमेशा नीचे दर्जे के नहीं रहे हैं. बल्कि उससे कुछ अलग ही लगते हैं. कुछ ही वर्षों में, इस क्षेत्र में विशेषकर गाँवों में आजीविका संदिग्ध होने लगी.

कलिम्पोंग के कई किसानों ने अपनी ज़मीन जोतना ही छोड़ दिया है. उपज की लागत, खास तौर पर धान की लागत बाज़ार-मूल्य से अधिक बढ़ गई है. उन्होंने बताया कि न केवल बेचने के लिए कोई मंडी रह गई थी,बल्कि खेती के लिए पानी भी नहीं बचा था. अधिक से अधिक गाँव के लोग, खास तौर पर युवक सर्विस इंडस्ट्री में काम की तलाश में भारत के अन्य शहरों में या फिर विदेशों में प्रवास करने लगे थे. क्या महामारी के दौरान कुछ बदलाव आ गया था?  पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता. यह संकट तो बहुत समय से चल रहा था.

दार्जिलिंग और डुआर्स के क्षेत्रों में तो भरपूर वृक्षारोपण किया गया था, लेकिन औपनिवेशिक अधिकारियों ने वृक्षारोपण के लिए कलिम्पोंग को विकसित नहीं किया था. इसका मतलब यह नहीं है कि कलिम्पोंग पर औपनिवेशिक या पूँजीवादी नियंत्रण नहीं था. इसके ठीक विपरीत कलिम्पोंग को ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने ही “सरकारी संपदा” के रूप में बसाया था. निस्संदेह, औपनिवेशिक बंगाल में सरकारी संपदाएँ अस्तित्व में ही नहीं होतीं, अगर ब्रिटेन में भू-संपदाएँ पहले से मौजूद न होतीं. भू-संपदा वहीं पर थी, जहाँ बाड़ेबंदी, भू-राजस्व निकास और सामाजिक स्तरीकरण की तकनीकों को निखारा जाता था. इन तकनीकों को उस समय औपनिवेशिक भारत में कलिम्पोंग सहित औपनिवेशिक व्यवसायों के व्यापक क्षेत्र में लागू किया गया था.

1870 के दशक में बंगाल और बिहार सहित पूरे भारत में अकाल पड़ने के कारण सरकारी संपदा का विस्तार भी प्रभावित हुआ. इसके जवाब में, औपनिवेशिक सरकार ने कई अकाल आयोगों में से पहला आयोग स्थापित किया. आयोग की कई सिफ़ारिशों के अनुसरण में सन् 1886 में नये बंगाल कृषि विभाग की स्थापना की गई थी. उसी साल नये नियुक्त निदेशक ने स्पष्ट किया कि अकाल का तकनीकी समाधान हो सकता था. उनका विभाग खेती के बेहतर तरीकों, उन तरीकों और उनसे जुड़े उपकरणों के प्रसार और कृषि आँकड़ों और "आर्थिक तथ्यों" के संग्रह पर ध्यान केंद्रित करेगा.

अकाल के बाद लोगों को जीवित रखने की कलिम्पोंग जैसी सरकारी संपदा से जुड़ी नौकरशाही परियोजना यह सुनिश्चित करने की आर्थिक परियोजना से जुड़ी थी कि वे कारगर हों. कलिम्पोंग की परिकल्पना इस क्षेत्र के अलावा दार्जिलिंग जैसे विकसित होते हुए हिल स्टेशन और कोलकाता के लिए अनाज के उत्पादक क्षेत्र के रूप में की गई थी. इस परियोजना का आरंभ 1880 के दशक में हुआ था और नेपालियों, लेपचा और भूटिया को अलग-अलग प्लॉट पर बसाया गया था और उन्हें संपदा के असामी-काश्तकारों के रूप में नामांकित किया गया था. लगता तो यही था कि इसका उद्देश्य अकाल को रोकना था, लेकिन अधिक स्पष्ट रूप से इसका उद्देश्य लगान वसूली के माध्यम से गैर-वृक्षारोपण भूमि को लाभदायक बनाना भी था. ब्रिटिश साम्राज्य में उभरे जैव-राजनीतिक तर्क को प्रतिबिंबित करने के लिए किसान उत्पादकता में सक्रिय निवेश के साथ खाद्य आपूर्ति का एक करीबी मानदंड जुड़ा हुआ था.

मौजूदा दौर की ओर फ्लैश-फॉरवर्ड करें. इन छोटे खेतों में से किसी एक पर जीवन यापन करना अब व्यावहारिक नहीं है. लोग जमीन छोड़ रहे हैं. आखिर क्यों? कारण अनेक हैं और जटिल भी हैं. हिमालय की ढलानों पर खेती करना आसान नहीं है. यांत्रिक तरीके बहुत महँगे पड़ते हैं और इस तरह के इलाके के लिए उपयुक्त भी नहीं होते. अन्य साधनों के उपयोग से कलिम्पोंग की पहाड़ियों पर भूस्खलन की आशंका बनी रहती है. खाने-पीने की चीज़ें मैदान से पहाड़ियों तक पहुँचाई जाती हैं. और फिर तीस्ता नदी पर पनबिजली प्रतिष्ठानों के कारण अनिश्चितता भी बनी रहती है. कलिम्पोंग के किसानों के मन में यह बात बैठ गई थी कि बाँधों के कारण पानी की कमी होती जा रही थी और मौसम की अनिश्चितता भी बनी रहती थी.

इसके अलावा, हाशिए पर जाने, नस्लीकरण और श्रम के इतिहास पर भी विचार करना होगा. श्रम के औपनिवेशिक ब्रिटिश वर्गीकरण में, नेपालियों को "मार्शल जाति" के रूप में रखा गया था. यही कारण है कि उन्हें सैन्य सेवा के लिए उपयुक्त माना जाता था. "वफ़ादारी" और "बहादुरी" के खास गुणों के कारण वे सेवा कार्य के लिए उपयुक्त पाये गए. आज भी, भारत के शहरों में प्रचलित नस्लीय और लैंगिक किस्सों में पहाड़ी लोगों को स्वाभाविक रूप से अच्छे नौकरों के रूप में पेश किया जाता है – जैसे सैनिक, आयाएँ, नौकरानियाँ, रसोइया.

जब मैं कलिम्पोंग के निवासियों से इस बारे में बात करती हूँ कि पर्यावरण के विनाश के हालात में पहाड़ियों में अपना घर बनाने का क्या मतलब है, तो वे इन सभी कारकों को सामने लाते हैं. परंतु, इन सभी कारणों के संयुक्त प्रभाव के कारण ही शायद इन पहाड़ियों के सबसे पुराने उद्योगों में से एक उद्योग पर्यटन का पुनरुद्धार साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है. पश्चिम बंगाल में हिमालय की तलहटी का उपयोग लंबे समय से शरणस्थली के रूप में किया जाता रहा है. मैदानी इलाकों की तुलना में यह शांत पहाड़ी स्थान बहुत आरामदेह है. दार्जिलिंग जैसे "हिल स्टेशन" यूरोपीय और संपन्न भारतीयों के लिए सैनिटोरियम, स्वास्थ्य लाभ और सामाजिक प्रजनन के स्थल रहे हैं. भारत के शहरों में तापमान बढ़ने के साथ-साथ आरामगाह के रूप में हिल स्टेशनों की भूमिका अब और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है. शहरी मध्यम वर्ग के विकास के साथ-साथ पहाड़ों तक उनकी पहुँच का विस्तार हो गया है.

"देश और शहर" का मिश्रण, जिसका विश्लेषण रेमंड विलियम्स ने, आंशिक रूप से, ब्रिटिश भूमि सम्पदा के गुण-दोषों और विवरणों को पढ़कर किया था. यह विवरण बंगाल की पहाड़ियों की उसके शहरी केंद्र से तुलना करते हुए समझने के लिए उपयुक्त है. विलियम्स ने बताया कि ग्रामीण इलाकों को चरागाह, स्थिर और अपरिवर्तनीय मानने से निष्कर्षण और संचय की हिंसा अस्पष्ट हो जाती है.

जहाँ एक ओर कलिम्पोंग सरकारी संपदा पर खेत लगातार खराब होते रहे, वहीं पूँजी की कमी नहीं हुई. इसके बजाय, विशेष रूप से प्रजनन कार्य के लिए संचय और भी अधिक अंतरंग स्थानों में स्थानांतरित हो गया है. पश्चिम बंगाल सरकार अब छोटे किसानों के पलायन को रोकने (और, यकीनन, उपराष्ट्रीय माँगों को पूरा करने) के तरीके के रूप में जोर-शोर से होमस्टे पर्यटन को बढ़ावा दे रही है. लगता है अब ग्रामीण इलाकों को कृषि अर्थव्यवस्था की अपेक्षा नहीं रह गई है. किसान परिवार, राज्य विकास प्राधिकरणों और रियल एस्टेट सट्टेबाजों की मदद से तेज़ी से बदलते हुए जलवायु से परेशान रहने वाले भारतीय मध्यम वर्ग के लिए सरकारी संपदा को पैकेज करना सीख रहे हैं. जहाँ एक ओर चाय बागान का कारोबार तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, वहीं कलिम्पोंग  में परिमाण के हिसाब से पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक होमस्टे हैं और यह संख्या केवल उनकी है जो पंजीकृत हैं.

जैसे-जैसे खेती चौपट हो रही है, ऐसा लगता है कि पहाड़ी समुदायों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से भूमि सुधारों को लागू करने की तुलना में पहाड़ियों के "स्थानीय" और "पारंपरिक" अनुभवों को मध्यवर्गीय भारतीय शहरी लोगों को बेचना आसान है. निस्संदेह, ट्रिकल-डाउन विकास यहाँ कोई नई बात नहीं है. वृक्षारोपण जैसे संसाधन वाले और साथ ही बर्बादी के स्रोत वाले सीमाक्षेत्र का यही तर्क होता है.

ठंडी हवा और पहाड़ी परिदृश्य लंबे समय से लोगों को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करते रहे हैं. लेकिन 2023 तक, कारों ने नियमित रूप से पहाड़ी सड़कों को जाम कर दिया, जिससे दस मिनट की ड्राइव घंटों लंबी रेंगने वाली ड्राइव में बदल गई क्योंकि सैलानी भारी मात्रा में पहाड़ों पर आने लगे. हर मानसून में इन सड़कों पर अक्सर भू-स्खलन के दृश्य दिखाई देने लगे. ऐसा लगता है कि भारतीय सैलानी पहाड़ों की ओर बढ़ रहे हैं जबकि कलिम्पोंग के लोग उनसे भाग रहे हैं.

लेकिन खेती के चौपट होने से न तो होमस्टे का विकास हुआ और न ही होमस्टे के कारण खेती चौपट हुई. जब कलिम्पोंग में लोग इन बदलावों के बारे में बात करते हैं, तो वे कारों, सड़कों और भूस्खलन के बारे में बात करते हैं जो पहले भी होते थे और आगे भी होते रहेंगे. पानी की जितनी कमी होगी बुनियादी चीज़ों की सप्लाई के लिए शहरी व्यापारियों पर निर्भरता बढ़ती जाएगी और निश्चय ही ऐसे भविष्य के लिए अधिकाधिक होमस्टे की ज़रूरत होगी. होमस्टे के माध्यम से सामाजिक प्रजनन और घर बनाने, रसोई और पर्यटकों की देखभाल के लिए अधिक से अधिक मज़दूरों की ज़रूरत होगी और गैर-आनुपातिक रूप में यह बोझा महिलाओं पर ही पड़ेगा और इस प्रकार पूँजी संचय के नये स्रोत पैदा हो जाएँगे.

जलवायु संकट से जुड़े अनुभवों की बिक्री पहाड़ों पर कोई विलक्षण बात नहीं मानी जाती. कलिम्पोंग में होमस्टे आर्थिक और पारिस्थितिकी से जुड़े सम्मिलित संकटों के संदर्भ में आवेगपूर्ण श्रम में आये अन्य बदलावों का एक भाग है. होमस्टे सीमावर्ती क्षेत्रों में कमाई का कोई नया साधन नहीं है..बस..इसमें अब तेज़ी आ गई है.

और फिर होमस्टे पर्यटन, संसाधन जुटाने का कोई वैकल्पिक विकल्प नहीं है. इसके बजाय यह अधिनायकवादी विकास के दुष्प्रभावों में संचित लंबे और सँकरे मार्ग का एक सूत्र है. जलवायु परिवर्तन और खेतीबाड़ी में आए तीव्र संक्रमण का मतलब है खास तौर पर हाशिये पर पड़े उन लोगों के लिए जो पर्यावरण के संकट और दुष्प्रभावों से जूझते हैं और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं और खास तौर पर महिलाओं के लिए अधिक काम. 

बुनियादी ढाँचे के विशेषज्ञ हमें याद दिलाते हैं कि मेगा-परियोजनाएँ अपने मूल स्वरूप में बहुत नाजुक होती हैं और उनमें से कई परियोजनाएँ तो अक्सर स्पष्ट रूप से ढह भी जाती हैं. कलिम्पोंग और अन्य सरकारी संपदाएँ अधिकनायकवादी मेगा-परियोजनाएँ ही हैं. उनका अस्तित्व बनाये रखने और उन्हें साथ जोड़े रखने के लिए बहुत काम करना पड़ता है. इस तरह के काम खेतों में और नई दिल्ली के रेस्तराँ के किचन में किये जाते हैं और इज़राइल में आप्रवास करने वाली भावी नर्सों के लिए सिलगुड़ी में हिब्रू भाषा सीखने के पाठ्यक्रम चलाये जाते हैं. ऐसे पाठ्यक्रम उन भारी तादाद में आने वाले मध्यमवर्गीय पर्यटकों के लिए घरों पर भी चलाये जाते हैं जो चाहते हैं कि नेपाली, भूटिया और लेपचा लोग उन्हें पहाड़ी अनुभवों के बारे में बताएँ. जैसे-जैसे वैश्विक पूँजी संचय उत्पादन से प्रजनन की ओर बढ़ रहा है, हर पर्यटक के साथ हर भूस्खलन पर और खेतीबाड़ी से अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ हर खेतिहर परिवार के साथ इन पहाड़ों पर भावी पीढ़ी के लिए आजीविका कमाना कठिन होता जा रहा है.

साराह बेस्की कॉरनेल विश्वविद्यालय के ILR स्कूल में सह प्रोफ़ेसर हैं.

                             

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (हिंदी), रेल मंत्रालय, भारत सरकार

Hindi translation: Dr. Vijay K Malhotra, Director (Hindi), Ministry of Railways, Govt. of India

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