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शिक्षा असमानता का गढ़: शिक्षा की पहुँच से लेकर समान शिक्षा तक

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17/07/2023
अरुण कुमार

भारत के मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर इस तरह की सुर्खियाँ आम बात हो गई हैं कि एक रिक्शा वाले के बेटे ने इंजीनियरिंग में दाखिले की कठिनतम परीक्षा उत्तीर्ण की या फिर वह कुलीन वर्ग के नौकरशाहों की जमात में शामिल हो गया. इस तरह के समाचार भारत के गतिशील शिक्षा के क्षेत्र में समानता और असमानता दोनों ही बातों को दर्शाते हैं. समानता तो इसलिए क्योंकि ऐसे प्रत्याशियों ने कठोर परिश्रम करके यह रुतबा हासिल किया है और शिक्षा ने उनका और उनके परिवार का सशक्तीकरण किया है. असमानता इसलिए क्योंकि वे अपने समुदायों, जातियों और वर्गों में अपवाद स्वरूप ही हैं. उनकी कामयाबी की सनसनीखेज रिपोर्टिंग न केवल यह दर्शाती है कि कैसे एक अत्यधिक निजीकृत शिक्षा और कोचिंग प्रणाली द्वारा नए भारत के सपने बेचे जा रहे हैं, बल्कि अच्छे वेतन वाली, सम्मानजनक नौकरियों की एक ऐसी विचित्र अभिजात्य दुनिया को भी दर्शाती है जिसमें एक गरीब मजदूर का बेटा भी प्रवेश कर सकता है, लेकिन यह बात मात्र एक समाचार है, आम बात नहीं है. इस तरह की सनसनीखेज शिक्षा एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की परिकल्पना करती है जिसमें विभिन्न वर्गों और सामाजिक प्रोफ़ाइल के छात्रों के बीच सीखने में भारी अंतर होता है. भारत की मौजूदा शिक्षा प्रणाली में दो प्रकार की बातें दिखाई दे रही हैं, सार्वजनिक शिक्षा तक भारत की सामाजिक रूप से उपेक्षित जातियों और वर्गों की अधिकाधिक पहुँच हो रही है और नीचे से ऊपर तक शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण का बोलबाला है.

जैसे-जैसे किफ़ायती शिक्षा का दायरा सीमित होता जाता है और नौकरियों और रोज़गार के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जाती है, भारत की सामाजिक और आर्थिक विषमताएँ शिक्षा-स्थलों पर हावी होती चली जाती हैं. इस प्रकार की विषमता का विस्तारित प्रतिबिंब तब भी दिखाई देता है जब सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित पृष्ठभूमि से आने वाले सफल छात्रों को शैक्षिक सशक्तीकरण का कानूनी तौर पर दावेदार नहीं माना जाता, क्योंकि उन्हें सामाजिक दृष्टि से संपन्न पृष्ठभूमि वाले साथियों की तुलना में अंदर ही अंदर कम “योग्य” माना जाता है. उनकी कामयाबी का श्रेय उनकी अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण प्राप्त विशेष लाभ को दिया जाता है. इस दृष्टि से भारत की शिक्षा प्रणाली उपेक्षित वर्ग के लिए मुक्त भी है और मुक्त नहीं भी है.

ऐतिहासिक दृष्टि से भारत साम्राज्यवादी दौर से बहुत आगे निकल गया है; वस्तुतः भारत  शिक्षा के क्षेत्र में एक धीमी क्रांति के दौर से गुज़रा है. आज भारत गर्व कर सकता है कि उसकी साक्षरता की दर 77 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जबकि 1947 में स्वाधीनता के समय यह दर 18.3 प्रतिशत थी. उन्नीसवीं सदी में भारत को अनपढ़ों का देश माना जाता था. और अब यह गतिशील शिक्षा प्रणाली का केंद्र बन गया है. फिर भी यह एक ऐसा समाज है, जिसमें सामाजिक और आर्थिक दोनों ही प्रकार की विषमताएँ बड़े परिमाण में हैं और इनका प्रभाव शिक्षा की उपलब्धियों पर भी पड़ रहा है. भारत ने अनेक बेहद प्रतिभाशाली और विश्व-विख्यात सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, डॉक्टरों और विद्वानों को जन्म दिया है. साथ ही साथ भारत में ऐसे लोग भी हैं जो कभी स्कूल नहीं गए, उन्होंने एक किताब भी नहीं पढ़ी और वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जूझते रहते हैं. आधुनिक भारत में शिक्षा का भव्य विमर्श, चाहे उसे राष्ट्रवादी या जाति संघर्ष के नजरिए से देखा जाए, शिक्षा की प्रकृति पर सवाल उठाने की कीमत पर शिक्षा प्रणाली के व्यापक लोकतंत्रीकरण के रूप में तैयार किया गया है. परंतु जब सामाजिक और आर्थिक रूप से उपेक्षित छात्र शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो ज़रूरी नहीं है कि उनका संघर्ष मात्र शिक्षा की समान पहुँच तक ही सीमित रहे बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न छात्रों के समान अवसरों और ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी रहता है. इस बाद वाले मुद्दे को एक शैक्षिक समस्या और नीतिगत सरोकार दोनों रूपों में समझना और पहचानना, मौजूदा शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए आवश्यक है.

भाषा के प्रशिक्षण, सांस्कृतिक पूँजी, पाठ्यचर्या सीखने की उपलब्धियाँ, शिक्षा जारी रखने के लिए शैक्षिक संसाधनों को खरीदने की क्षमता, वर्ग और जातिगत भिन्नता के कारण छात्र जीवन के असमान अनुभव और कैम्पस में महिलाओं के लिए मानदंड और सुरक्षा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो समान अवसर और ज्ञान का दावे करते समय उभर कर सामने आते हैं. शिक्षा की समानता को प्रभावित करने वाले ये मुद्दे शिक्षा को एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में रखते हैं जिससे हम शिक्षा को अलग नहीं कर सकते. शिक्षा समाज और अर्थव्यवस्था को ठीक उसी तरह स्वरूप प्रदान करती है जैसे समाज और अर्थव्यवस्था शिक्षा प्रणाली को अंदर से बदल देते हैं. मैं ज्ञान के अनुभव की पहुँच बनाम समानता की समस्या को उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में श्रमिक उपवर्गों की उस शिक्षा के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहूँगा जब सरकार के साथ-साथ नियोक्ताओं, धार्मिक निकायों और समाज सुधारकों द्वारा कुछ हद तक सीमित शिक्षा की परिकल्पना की गई थी.

कौन काम करता है? कौन अध्ययन करता है? साहित्यिक शिक्षा के लिए श्रमिक निकायों का दावा
भारत के शिक्षाविद और श्रमिक इतिहासकार गरीब श्रमिकों की शिक्षा तक उनकी पहुँच और अनुभव का इतिहास लिखना भूल गए हैं. यह मान लिया गया है कि गरीब श्रमिकों के लिए साम्राज्यवादी सरकार और कुलीन वर्ग के विमर्श के संदर्भ में यह मान लिया गया है कि कामगार तो निरक्षर वर्ग के लोग हैं. उन्हें शिक्षा की परियोजनाओं से कुछ लेना-देना नहीं है. इस तरह का चित्रण पढ़ने-लिखने, दस्तावेज़ बनाने और स्कूल के अनुभवों से जुड़ी किताबों की दुनिया में श्रम की निम्नता और उपेक्षा को भी प्रतिबिंबित करता है. किताबों की यह दुनिया पारंपरिक रूप से सांस्कृतिक अभिजात वर्ग, साक्षर उच्च जातियों और उच्च वर्गों की दुनिया से भी जुड़ी हुई है. मानसिक कार्य और श्रमिकों द्वारा हाथ से किये जाने वाले काम के बीच के बुनियादी अंतर के चित्रण को इतिहास और शैक्षणिक अध्ययन के रूप में देखा जाता है. साम्राज्यवादी अधिकारियों, कर्मचारियों और समाज के आभिजात्य वर्ग के लेखन-कार्य के अंतर्गत कामकाजी उपनगरों की निरक्षरता को आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज में पूरी तरह से भाग लेने में इन समूहों की विफलता के रूप में चित्रित किया गया है. इसे पचास और साठ के दशक के आधुनिकीकरण संबंधी सिद्धांतों के अंतर्गत भारत के अधूरे/असंगत आधुनिकीकरण के रूप में भी समझाया गया है. आधिकारिक दस्तावेज़ों में, निरक्षरता और अज्ञान को भारतीय श्रमिकों की गरीबी और पिछड़ेपन के औचित्य के रूप में चित्रित किया गया था.

हम यह नहीं जानते थे कि सभी जातियों के गरीब श्रमिकों और सर्विस क्लास द्वारा शिक्षा के लिए नीचे से ऊपर की माँग और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के तहत प्रशिक्षित, अनुशासित और कुशल श्रमिक बल की अधिक माँग के परिणामस्वरूप ही उन्नीसवीं सदी के मध्य से विभिन्न प्रकार के औद्योगिक और तकनीकी स्कूलों की स्थापना होने लगी. चूँकि कुशल शिक्षित श्रमिकों की माँग के अनुरूप ही विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में उन्हें नियोजित किया गया था और विभिन्न हितधारकों (कारखाने के मालिकों, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में रुचि रखने वाले औपनिवेशिक राज्यों, शहरों में बसे गरीब लोगों को अनुशासित करने वाले समाज सेवा सुधारकों और उपेक्षित वर्ग के लोगों को शिक्षित करने वाले धार्मिक निकाय) को शामिल किया गया था, इसलिए ये स्कूल असमान रूप से विभिन्न आकारों और स्थानों में उभरने लगे. इसके कुछ उदाहरण हैं, औद्योगिक कामगारों को प्रशिक्षित करने वाले औद्योगिक और तकनीकी स्कूल, कारखानों में काम करने वाले कामगारों के बच्चों को शिक्षित करने वाले कारखानों के स्कूल, शहरों में बसे गरीब वर्गों को प्रशिक्षित करने वाले रात्रिकालीन स्कूल, दलितों को शिक्षित करने वाले वंचित वर्गों के स्कूल,आनुवंशिक कारीगरों को पुनः दक्षता का प्रशिक्षण देने वाले शिल्प और कारोबार से जुड़े वर्गों के स्कूल, गरीब पृष्ठभूमि वाले सामाजिक एवं आर्थिक वर्ग के धर्मांतरण करके ईसाई मिशन के औद्योगिक स्कूल. अब तक इन स्कूलों में आम तौर पर श्रमिक वर्ग के बच्चों को ही पढ़ाया जाता था. शिक्षित और पारंपरिक रूप से साक्षर जातियों के लिए, साहित्यिक स्कूल और कॉलेज के साथ-साथ इंजीनियरिंग कॉलेज और व्यावसायिक संस्थान जैसे कुछ उच्च तकनीकी संस्थान स्थापित किए गए.

एक ओर तो उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन, अमरीका, अफ़्रीकी और भारतीय उपनिवेशों सहित विभिन्न औद्योगिक समाजों और उपनिवेशों में आधुनिक शिक्षा का विकास हुआ, जो पेशेवर और साक्षर वर्ग तैयार करने के लिए विभिन्न प्रकार को पाठ्यक्रमों पर आधारित थी, वहीं दूसरी ओर, ब्लू-कॉलर कामगार वर्ग के लिए अलग प्रकार के पाठ्यक्रम पर आधारित शिक्षा प्रणाली विकसित हुई. भारत में, जातिगत असमानताओं और जातिगत पूर्वाग्रहों के माध्यम से पहले से ही पवित्रता और प्रदूषण की धारणाओं के ज़रिये काम और शिक्षा का एक (सैद्धांतिक) ढाँचा बन गया है. उसके अनुसार ही यह तय होता है कि किन जातियों को शारीरिक श्रम करना चाहिए और किसे नहीं करना चाहिए, कौन साक्षर जाति थी और कौन नहीं. उद्योग और समाज में मानसिक और शारीरिक श्रम का पूँजीवादी सीमांकन इस स्तर तक जुड़ गया है, जहाँ जाति और पूँजीपतियों के काम और प्रबंधन/विशेषज्ञता का विभाजन भी पता नहीं चलता. इस प्रकार, या तो पूँजीवाद की समग्रता या पूर्व-पूंजीवादी पहचानों की समग्रता (पूँजीवाद से इतर) से भारत में उभरे हुए मानसिक और शारीरिक श्रम विभाजन की अंतर्निहित जाति-पूँजीवादी प्रकृति की व्याख्या नहीं की जा सकती है. चूँकि गरीबों और उपेक्षित लोगों के लिए शिक्षा को एक कुशल और प्रशिक्षित श्रम शक्ति तैयार करने के एक शक्तिशाली साधन के रूप में बनाया गया था, इसलिए श्रमिक उपवर्गों के लिए शिक्षा की प्रकृति को मुख्य रूप से व्यावहारिक, तकनीकी, यांत्रिक और औद्योगिक बनाकर रखा गया था - दोनों उन्हें उत्पादक श्रमिक निकाय बनाने के लिए और किसी भी उच्च आकांक्षाओं पर नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करते हैं.

इसी प्रकार उत्तर भारत के स्थानीय अखबार आज़ाद में प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया था, “यदि निम्न जाति के लोगों को शिक्षित करना है तो उन्हें खेतीबाड़ी और विनिर्माण का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और इसके लिए विशेष स्कूल खोले जाने चाहिए ताकि वे अपने धंधों में अपने नये अर्जित ज्ञान का भरपूर उपयोग कर सकें.

इसी तरह, 1915 में, एक ईसाई मिशनरी पत्रिका, Harvest Field में 'बहिष्कृत' की पारंपरिक स्थिति में पैदा हुए, सभी वर्गों से बने सामाजिक सोपान में निचले स्तर पर अपना आवंटित स्थान लेने वाले धर्मांतरण द्वारा दलित ईसाई बने लोगों के "ऊँचे" शैक्षिक स्वप्नों पर टिप्पणी की गई है. ये 'बहिष्कृत' श्रमिक (जो ‘शिक्षा के ज़रिये बिना किसी की मदद से नीचे से शीर्ष पर पहुँच जाते हैं. शीर्ष के लोगों में दो मुख्य अंतर ये हैं कि वे 'शिक्षित' हैं और वे श्रम नहीं करते हैं, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारतीय ईसाई, यहाँ तक कि अमरीकी नीग्रो से भी अधिक यह महसूस करने लगे हैं कि 'शिक्षा' अशिक्षितों को श्रम से मुक्त कर देगी.

आज के भारत में, समाज के सभी वर्गों की बढ़ती शैक्षिक माँगों की कीमत पर शिक्षा क्षेत्र का निजीकरण बढ़ रहा है, इसके अंतर्गत शिक्षा क्षेत्र का विस्तार करने की क्षमता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह निजीकरण शिक्षा-स्थल पर उत्पन्न होने वाली असमानताओं को बढ़ा सकता है. प्रमुख शहरी केंद्रों में, जहाँ ये वांछनीय शैक्षणिक संस्थान स्थित हैं, भारी ट्यूशन फ़ीस और वहाँ रहने की बढ़ती लागत के कारण छात्र निकायों में  जाति और वर्ग के आधार पर भारी अंतर पैदा कर रहे हैं. जब तक हम यह नहीं समझ लेते कि शिक्षा एक ऐसा स्थल है जो असमानता के नए रूप पैदा कर रही है, हम उससे उत्पन्न चुनौतियों से नहीं निपट सकते. भारतीय शिक्षा प्रणाली पर होने वाली बहस पहुँच से आगे बढ़कर अनुभव की समानता तक होनी चाहिए.

अरुण कुमार नॉटिंघम विश्वविद्यालय में इतिहासवेत्ता के रूप में काम करते हैं और आजकल श्रमिक उपवर्गों के शैक्षिक अनुभवों पर अपनी पहली पुस्तक लिख रहे हैं. उन्हें @arunk_patel पर ट्वीट किया जा सकता है.

 

 

हिंदी अनुवादः डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक (हिंदी), रेल मंत्रालय, भारत सरकार

Hindi translation: Dr. Vijay K Malhotra, Director (Hindi), Ministry of Railways, Govt. of India

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